बच्चों-किशोरों को लुभा रही अंतरिक्ष की अनोखी दुनिया, जुटे क्षुद्र ग्रहों की खोज में


आज वे निरंतर नये-नये एस्टेरायड्स (क्षुद्रग्रहों) की खोज कर रहे हैं।

अनंत अंतरिक्ष में सितारों ग्रहों क्षुद्र ग्रहों की दुनिया को जानने की जिज्ञासा किसे नहीं होती। बच्चे तो बच्चे ही हैं। जैसे ही उन्हें मौका मिला उन्होंने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में गहरी रुचि दिखाने से जरा भी संकोच नहीं किया।

नई दिल्‍ली। दोस्तो, घर की बालकनी, घर की छत से खुले आकाश में तारों को आप सबने कभी न कभी निहारा होगा…। मन में सवाल उठे होंगे कि कुछ तारे चमकते हैं, कुछ नहीं। तब माता-पिता या अध्‍यापकों ने आपकी इस जिज्ञासा को शांत किया होगा। कर्नाटक के बागलकोट के अमोघ देशपांडे भी बचपन में अपने माता-पिता से इसी तरह के प्रश्न किया करते थे। विज्ञान के शिक्षक और पैरेंट्स उनकी इस उत्सुकता को शांत करने में पीछे नहीं रहते थे। इसी से कम उम्र में उनकी एस्ट्रोफिजिक्स एवं एस्ट्रोनोमी में गहरी रुचि उत्पन्न हो गई। टेलीस्कोप से सितारों को निहारना, स्काईगेजिंग करना उन्हें खूब पसंद है। समय-समय पर छोटे-मोटे प्रयोग भी करते रहते हैं। इस समय हालांकि वह बीटेक की पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन खगोल विज्ञान में दिलचस्पी कम नहीं हुई है।

कोरोना काल में जब प्रदेश में पहली बार लाकडाउन हुआ,तो उन्होंने स्थानीय विज्ञान प्रेमियों के साथ मिलकर एक ‘एस्ट्रोनामी क्लब’ गठित किया। उसी दौरान उनका संपर्क विज्ञान प्रसार नेटवर्क आफ साइंस क्लब (विपनेट) से जुड़े अमृतांशु से हुआ और अमोघ ने एस्टेरायड सर्च कैंपेन में शामिल होने का निर्णय लिया। वह बताते हैं,‘साल 2020 के अक्टूबर एवं इस वर्ष मई महीने में ‘सप्तऋषि इंडिया’ ने इंटरनेशनल एस्ट्रोनामिकल सर्च कोलैबोरेशन (आइएएससी) के साथ मिलकर दो कार्यक्रम आयोजित किए थे। करीब एक महीने तक चलने वाले इस इवेंट में देश भर की टीमें शामिल हुईं। हमारी टीम ने प्रिलिमिनरी डिस्कवरी के तहत अक्टूबर (2020) में कुल चार एवं मई (2021) में तीन एस्टेरायड्स खोजे।’ अमोघ बताते हैं कि डिस्कवरी की प्रक्रिया तीन चरणों की होती है। तीन स्टेज पूरा करने के बाद एस्टेरायड को एक नंबर दिया जाता है। अगर वह अपने स्थान पर टिका रहता है, तो खोजकर्ता उसका नामकरण कर सकता है। उसे उसका श्रेय मिलता है।

क्यों मनाते हैं अंतरराष्ट्रीय क्षुद्रग्रह दिवस?

संयुक्त राष्ट्र ने क्षुद्रग्रह के खतरे को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में अंतरराष्ट्रीय क्षुद्रग्रह दिवस मनाने की घोषणा की थी। दरअसल, 30 जून, 1908 को रूस की तुंगुस्का नदी के पास बड़ा विस्फोट हुआ था, जिसे क्षुद्रग्रह द्वारा धरती पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा नुकसान बताया जाता है। एक क्षुद्रग्रह कंकड़ के दाने से लेकर सैकड़ों किलोमीटर की लंबाई-चौड़ाई तक का हो सकता है। क्षुद्रग्रह भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। ये आमतौर पर क्षुद्रग्रह बेल्ट में पाए जाते हैं, जो सौरमंडल में मंगल एवं बृहस्पति ग्रह के बीच पाया जाता है। पहले क्षुद्रग्रह की खोज वर्ष 1801 में हुई थी।

पिता ने कराया एस्ट्रोनामी से परिचय: अंतरिक्ष में न जाने कितने ही क्षुद्रग्रह (एस्टेरायड्स),उल्का पिंड (मीटिओराइट्स) एवं अन्य खगोलीय पिंड (सेलेस्टियल बाडीज) हैं। ऐसे में एस्टेरायड खोजने में कभी सफलता मिलती है और कभी नहीं भी मिलती है। एस्टेरायड सर्च कैंपेन में हिस्सा ले चुके और एस्ट्रोनामी का गहरा शौक रखने वाले 12वीं के स्टूडेंट योगन बताते हैं, ‘तस्वीरों के विश्‍लेषण के दौरान कई बार हम अंतरिक्ष में खगोलीय पिंडों को घूमते हुए देखते हैं, लेकिन अध्ययन के बाद पता चलता है कि वे एस्टेरायड नहीं हैं। जैसे एक तस्‍वीर में मुझे छह आब्जेक्ट्स घूमते हुए दिखाई दिए, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं था। इसलिए धैर्य रखना जरूरी होता है। इसमें मेंटर्स हमें काफी प्रेरित करते हैं। हमें गाइड करते हैं।’ दिलचस्प बात यह है कि दसवीं तक योगन की खगोल विज्ञान में खास रुचि नहीं थी। एक दिन पिता ने उनका इससे परिचय कराया। उन्हें एस्टेरायड्स, मीटिओराइट्स, एस्ट्रोफोटोग्राफी आदि के बारे में विस्तार से बताया। इसके बाद उनका पीछे मुड़कर देखना नहीं हुआ। वे दोनों पड़ोस में रहने वाले साथी के साथ स्टारगेजिंग किया करते हैं। एस्ट्रोनामी से जुड़े इवेंट्स एवं वेबिनार में हिस्सा लेते हैं। योगन कहते हैं, ‘मेरे ज्ञान को बढ़ाने एवं मुझे प्रोत्साहित करने के लिए पापा खुद भी काफी स्टडी करते हैं। उनका जुनून देखकर मैंने भी मेहनत की। मेरा मानना है कि हमें अपने आपको हमेशा ऐसे कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए, जिसमें हमारी रुचि हो। एस्टेरायड सर्च कैंपेन एक ऐसा ही इवेंट था, जिसने मुझे नया एक्सप्लोर करने का अवसर दिया। मुझे टीम के साथ काम करना सिखाया। जहां दिक्कत हुई, सदस्यों ने पूरा सपोर्ट किया। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।‘

आदिवासी समुदाय की पहली सिटीजन साइंटिस्ट: आज अच्छी बात यह है कि देश के निजी एवं सरकारी स्कूलों व संस्थानों द्वारा इस तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। स्टूडेंट्स भी इसमें खास दिलचस्पी ले रहे हैं, क्योंकि इसके लिए सिर्फ एक लैपटाप एवं इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत पड़ती है। जैसे मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्र से आने वाली 12वीं की छात्रा जानवाई भिलाला को ही लें। वह राज्य की पहली आदिवासी लड़की हैं, जिन्‍होंने एस्ट्रोनामी के क्षेत्र में कदम रखा। दो एस्टेरायड सर्च कैंपेन में हिस्सा लिया और प्रिलिमिनरी खोज करने में भी कामयाब रही। राज्य के गुना स्थित गवर्नमेंट माडल हाईस्कूल में जीव विज्ञान के शिक्षक, स्टेट रिसोर्स पर्सन एवं जानवाई के गुरु डा. प्रदीप सोलंकी बताते हैं,‘यह नासा की सिटीजन साइंटिस्ट बनने वाली पहली लड़की है। खगोल विज्ञान के प्रति उसकी लगन देखते ही बनती है। वह न सिर्फ हमारे मेघना एन साहा साइंस क्लब की सचिव है, बल्कि अलग-अलग प्रोजेक्ट्स में सक्रिय रहती है। घर में लैपटाप एवं अन्य संसाधन न होने के बावजूद उसने कैंपेन में शामिल होने की दृढ़ता दिखाई। 24 किलोमीटर दूर गांव से स्कूल आकर तैयारी की। उसकी मेहनत अब रंग लाती दिख रही है। उसे देखकर अन्य लड़कियों को भी निश्चित तौर पर प्रेरणा मिल रही है।’ रसायन विज्ञान के शिक्षक एवं एस्टेरायड सर्च कैंपेन में अपनी टीम का नेतृत्व करने वाले प्रदीप मिश्रा की मानें, तो देश में प्रतिभा की कमी नहीं। सिर्फ उन्हें मंच देने की जरूरत है। इस समय एस्टेरायड सर्च कैंपेन के अलावा नासा (नेशनल एयरोनाटिक्‍स एंड स्‍पेस एडमिनिस्‍ट्रेशन, अमेरिका) की ओर से कई अन्य साइंस प्रोजेक्ट्स (अतिरिक्त खगोलिय पिंड यानी ईसीबी, आकाशगंगा अर्थात मिल्की वे से जुड़े खोज अभियान) भी चलाए जा रहे हैं, जिनमें स्टूडेंट्स अपनी पसंद के अनुसार स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा ले सकते हैं। इस तरह के एक्सपोजर से बच्चों में खोज की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। उनमें वैज्ञानिक अभिरुचि का विकास होता है।

खगोल विज्ञान में बढ़ी रुचि: उत्तराखंड के उधमसिंह नगर के एक छोटे से गांव की नेहा शर्मा को अपने स्कूल से ‘सप्तऋषि इंडिया एस्टेरायड सर्च कैंपेन’ की जानकारी मिली। वह स्कूल के उस साइंस क्लब का हिस्सा थीं,जो विपनेट से जुड़ा है। दसवीं की स्टूडेंट नेहा बताती हैं,‘खगोल विज्ञान मुझे काफी लुभाता है। मैं खुद से बिग बैंग थ्योरी, यूनिवर्स के बारे में पढ़ती रहती हूं। सूर्य ग्रहण, जीरो शैडो डे से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लेती रही हूं। इस क्रम में दिसंबर 2020 में मुझे पहली बार एस्टेरायड सर्च कैंपेन में हिस्सा लेने का अवसर मिला। उससे पहले हमारी टीम की करीब तीन महीने की विशेष ट्रेनिंग हुई। हमें साफ्टवेयर आदि चलाना सिखाया गया। बहुत अच्छा अनुभव रहा।’ कमाल की बात यह रही कि पहले ही प्रयास में नेहा प्रिलिमिनरी डिस्कवरी करने में सफल रहीं, जिससे उनका हौसला काफी बढ़ा है। वहीं, एमएससी की स्टूडेंट आकांक्षा मिश्रा को वैसे तो अभी किसी खोज में सफलता नहीं मिली है, लेकिन वह निराश नहीं हैं। अपना प्रयास जारी रखा है। कहती हैं आकांक्षा, ‘कभी सोचा नहीं था कि खगोल विज्ञान को एक्सप्लोर करेंगी। परिवार में विज्ञान का माहौल था। काफी चर्चाएं होती रहती थीं। एस्ट्रोनामी को जानने की इच्छा भी पिता एवं भाई के कारण हुई। वे दोनों ही एस्टेरायड सर्च अभियान का हिस्सा रहे हैं। उन्‍होंने अब तक चार प्रिलिमिनरी डिस्कवरी की हैं। उनसे प्रेरणा लेकर मैंने बीते वर्ष ‘सप्तऋषि इंडिया एस्टेरायड सर्च कैंपेन’ में भाग लिया था।

भविष्य में हो सकती है बड़ी भूमिका: अमोघ कहते हैं कि ब्रह्मांड का निरंतर विस्तार हो रहा है। हर मिली सेकंड में वहां कुछ नया घटित, विघटित होता रहता है,जिसका अध्ययन करना जरूरी है, क्योंकि इससे मानव जाति का हित जुड़ा हो सकता है। खगोलीय पिंडों, क्षुद्रग्रहों,ग्रहों के अध्ययन से हमें ब्रह्मांड में मौजूद खनिजों,रसायनों आदि की जानकारी मिल सकती है। अच्छी बात है कि आज स्कूल से लेकर कालेज तक के स्टूडेंट्स एस्ट्रोनामी में रुचि दिखा रहे हैं। अमृतांशु मानते हैं कि धरती के संसाधन सीमित हैं। ऐसे में आने वाले समय में हमें अंतरिक्ष की ओर देखना होगा, जिसमें खगोल विज्ञान की अहम भूमिका होगी। इस विज्ञान को किताबों से बाहर निकाल कर अपने दैनिक जीवन में उपयोग करना होगा। बच्चों की जिज्ञासा को जगाना-बढ़ाना होगा।

एस्ट्रोनामी के प्रति बढ़ाएं उत्कंठा: नैनीताल के एआरआइओएस साइंटिस्ट ई, डा. शशिभूषण पांडे ने बताया कि मानव सभ्यता की शुरुआत से ही अंतरिक्ष के प्रति जिज्ञासा रही है, लेकिन इंटरनेट क्रांति एवं इंटरनेट मीडिया के आने से बच्चों को बहुतायत में सूर्यग्रहण, चंद्रग्र्रहण, स्ट्राबेरी मून व अन्य खगोलीय घटनाओं की जानकारी मिल रही है,जो उनके अंदर जिज्ञासा पैदा कर रही है। एस्ट्रोनामी के जरिये वे विज्ञान के अन्य पहलुओं को भी आसानी से समझ सकते हैं। इसके लिए किसी विशेष प्रयोगशाला अथवा प्रयोजन की जरूरत नहीं है। सिर्फ सामान्य विज्ञान एवं इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री की मदद से बच्चों में वैज्ञानिक उत्कंठा पैदा की जा सकती है। विज्ञान समागम के माध्यम से टेलीस्कोप व अन्य लैब्स की जानकारी दी जा रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी एस्ट्रोनामी पर बल दिया गया है।

तस्वीरों के विश्‍लेषण से निकलते हैं निष्कर्ष: विपनेट के नेशनल को-आर्डिनेटर अमृतांशु वाजपेयी ने बताया कि केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्य करने वाले विपनेट से मान्यता प्राप्त ‘सप्तऋषि इंडिया एस्टेरायड सर्च कैंपेन’ में शामिल होने वाले प्रतिभागी देश के किसी भी हिस्से से हो सकते हैं। उनकी स्क्रीनिंग के बाद सक्षम कैंडिडेट्स को लेकर अलग-अलग टीम बनाई जाती है। हम उन्हें इंटरनेशनल एस्ट्रोनोमिकल सर्च कोलैबोरेशन (आइएएससी) से मिली अंतरिक्ष की तस्वीरें (फिट्स फार्मेट में) उपलब्ध कराते हैं। ये तस्वीरें अमेरिका के हवाई द्वीप स्थित पैन स्टार आब्जर्वेटरी में स्थित टेलीस्कोप द्वारा ली जाती हैं।

इसके बाद हार्डिन सिमंस यूनिवर्सिटी उन तस्वीरों को वहां पहुंचाती है, जहां पर कैंपेन लिस्टेड होता (आइएएससी) है। टीम को ‘एस्ट्रोमेट्रिका’ साफ्टवेयर चलाने की 45 दिन की ट्रेनिंग दी जाती है। दरअसल, एस्ट्रोमेट्री ही एस्ट्रोनोमी की वह ब्रांच है जिसमें खगोलीय पिंडों, क्षुद्र ग्रहों और उनकी गति आदि का पता लगाया जाता है। तस्वीरों की एनालिसिस कर प्रतिभागी इसी की जानकारी इकट्ठा करते हैं और एक रिपोर्ट (माइनर प्लैनेट सेंटर) तैयार कर आब्जर्वेटरी को भेजी जाती है, जो उसे क्रास वेरिफाई करती है। क्योंकि दावा करने वाले ने तो दावा कर दिया, लेकिन वह कितना प्रामाणिक है, इसकी जांच आब्जर्वेटरी करती है। दावे की पुष्टि होने पर ही खोजकर्ता को प्रिलिमिनरी डिस्कवरी का एक सर्टिफिकेट दिया जाता है।

सिटीजन साइंस प्रोजेक्ट्स ने बढ़ाई उम्मीदें: मौलाना आजाद नेशनल ऊर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद एवं एस्ट्रोनामी एक्सपर्ट के असिस्टेंट प्रोफेसर (फिजिक्स) के डा. प्रिया हसन ने बताया कि एस्ट्रोनोमी को लेकर एक आम भ्रांति है कि यह काफी जटिल विषय है। लेकिन नासा, इंटरनेशनल एस्ट्रोनोमिकल सर्च कोलैबोरेशन (आइएएससी),जैसे अन्य संगठन जिस प्रकार से ‘सिटीजन साइंस प्रोजेक्ट्स’ को प्रोत्साहित कर रहे हैं,उससे साइंस के अलावा दूसरे ब्रांचेज के स्टूडेंट्स भी एस्ट्रोनोमी या कहें एस्टेरायड सर्च कैंपेन का हिस्सा बन सकते हैं। कैंपेन पूरा करने वाले बच्चों-किशोरों-युवाओं को जब सर्टिफिकेट आदि मिलते हैं,तो उससे उनमें एक अलग आत्मविश्वास आता है कि वे भी पेशेवर खगोल विज्ञानी बने बगैर किसी वैज्ञानिक खोज का हिस्सा बन सकते हैं, कोई एस्टेरायड अपने नाम कर सकते हैं। इससे विज्ञान के प्रसार में भी मदद मिलती है, क्योंकि साइंस को साझा करना, उस पर चर्चा या विचार करना जरूरी है। हम ‘सृष्टि’ के माध्यम से विज्ञान को किताबों की दुनिया से बाहर लाने की कोशिश करते हैं। विभिन्न टाक शोज, स्टारगेजिंग इवेंट्स, टेलीस्कोप मेकिंग वर्कशाप्स, राकेट लांचिंग प्रोजेक्ट्स, क्विज आदि के जरिये बच्चों-किशोरों-युवाओं को खगोल विज्ञान में खोज करने में मदद करते हैं।