राजीव गांधी को कहना पड़ा था- 'मम्मी को इस हालत में लाने के लिए संजय को माफ नहीं करूंगा'

 


राजीव गांधी को कहना पड़ा था- 'मम्मी को इस हालत में लाने के लिए संजय को माफ नहीं करूंगा'

15 जून से संजय गांधी भी फुल फार्म में थे इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी में कुलदीप नैयर लिखते हैं सबसे पहले उन्होंने अपने इसी घर के कमरे में दो सेक्रोफोन लगाने का आदेश दिया केवल मंत्रियों और आला अफसरों को इसका अधिकार था।

नई दिल्ली । 'मम्मी को इस हालत में लाने के लिए मैं संजय को कभी माफ नहीं करूंगा, मैंने कई बार उन्हेंं कहा कि लोग संजय के बारे में क्या कहते हैं, लेकिन उन्हें यकीन नहीं आया। चर्चा थी कि जीत हुई तो संजय होम मिनिस्टर बनेगा, और इसी वजह से लोग भयभीत थे।' राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी की दोस्त पुपुल जयकर को ये बात 20 मार्च 1977 को कही, जब चुनावी नतीजे आ रहे थे और वह पीएम आवास एक, सफदरजंग रोड से बाहर आ रही थीं। पुपुल 'इंदिरा गांधी ए बायोग्राफी' में लिखती हैं कि जब वहां पहुंची तो कोई भी कार बाहर पार्क नहीं थी, इंदिरा के सेक्रेट्री का चेहरा उतरा हुआ था, इंदिरा खुद अपने कमरे में अकेले शांत बैठी थीं। मुझे देखते ही बोलीं कि, 'पुपुल, आई हैव लास्ट' पूछा तो बताया कि संजय अमेठी में है, सोनिया मिलीं तो रो रही थीं, राजीव उदास थे। आज इंदिरा गांधी का ये घर उनका मेमोरियल बन चुका है, आप वो हर कौना अब देख सकते हैं जहां इमरजेंसी के दौरान सभी बड़े फैसले लिए गए थे, बड़ी-बड़ी घटनाएं हुई थीं।

12 जून 1975 को इसी घर में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की भारी भीड़ जमा हो गई थी, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट का उनका चुनाव रद करने का फैसला आया था। तब से ही कांग्रेसी दिग्गजों को लगने लगा था कि अब किसी और को पीएम बनना है, ऐसे में कई गुटों की मीटिंग्स होने लगी थी, नाम उछाले जाने लगे थे, लेकिन जब हाई कोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला लागू करने के लिए समय दे दिया तो इंदिरा और उनके समर्थकों को सोचने का समय मिल गया। फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी। केंद्रीय मंत्री से बंगाल के सीएम बने सिद्धार्थ शंकर रे ने भी समझाया।15 जून से संजय गांधी भी फुल फार्म में थे, 'इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी' में कुलदीप नैयर लिखते हैं, 'सबसे पहले उन्होंने अपने इसी घर के कमरे में दो सेक्रोफोन लगाने का आदेश दिया, केवल मंत्रियों और आला अफसरों को इसका अधिकार था'। संजय गांधी मारुति फैक्ट्री की आलोचनाओं के चलते पहले ही अखबारों से नाराज थे, लगाम लगाने का सही मौका उन्हेंं मिला था। बंशीलाल और आरके धवन ने उन्हेंं सूचना प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल के खिलाफ भड़काया। इधर संजय के दोस्त कुलदीप नारंग ने उन्हेंं सेंसरशिप के नियमों की कापी और फिलीपींस में लागू सेंसरशिप तंत्र की जानकारी दी।

गुजराल को इसी घर में पीएम के नाम पर कॉल करके बुलाया गया, जबकि इंदिरा वहां नहीं थीं और संजय ने उनको इंदिरा की एक रैली की स्पीच को आल इंडिया रेडियो के बुलेटिन में ना चलाने को लेकर कहा कि 'ऐसा नहीं चलेगा', गुजराल ने ऐतराज किया तो संजय ने वीसी शुक्ल को सूचना प्रसारण मंत्रालय दिलवा दिया था। फैसले के बाद 20 जून को इंदिरा गांधी की ये पहली बड़ी रैली थी, जिसमें मंच पर संजय, राजीव और सोनिया भी मौजूद थे। विपक्ष और मीडिया लगातार हमलावर हो रहा था, कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने भी 18 जून को दिल्ली में मीटिंग की योजना बना ली थी। लेकिन बंशी लाल और सिद्धार्थ शंकर रे का अभियान काम आया, इस रैली के बाद 13 सीएम राष्ट्रपति से मिलकर इंदिरा गांधी में अपनी आस्था जताई।सुप्रीम कोर्ट से बिना वोटिंग अधिकार से पीएम पद पर बने रहने की इजाजत तो मिल गई, लेकिन जेपी की 25 जून की रैली का ऐलान हो चुका था और उससे पहले ही इंदिरा इसी घर पर 24 जून को कलकत्ता (कोलकाता) से सिद्धार्थ शंकर रे को बुलाकर मीटिंग कर रही थीं, जो ना सिर्फ उनके दोस्त थे बल्कि एक सफल वकील भी। कुलदीप नैयर लिखते हैं, 'सिद्धार्थ ने फोन पर उन्हेंं आंतरिक इमरजेंसी लगाने का सुझाव दिया था, तो इंदिरा ने उन्हेंं फौरन दिल्ली आने को कहा' फिर पीएम आवास में विस्तार से दोनों ने इमरजेंसी पर चर्चा की, किसी को संसद की लाइब्रेरी से संविधान की एक कापी लाने के लिए भेजा गया।

पीएम आवास में राज्यों के सीएम के फोन अब आरके धवन उठा रहे थे और निर्देश दे रहे थे। इकलौते सीएम सिद्धार्थ शंकर रे दिल्ली में थे, दो मीटिंग्स के बाद सिद्धार्थ से इंदिरा ने कहा, कि आप राष्ट्रपति के पास चले जाओ, अपनी किताब 'इंदिरा' में कैथरीन फ्रेंक लिखती हैं कि 'सिद्धार्थ ने कहा सीएम हूं पीएम नहीं', तब साढ़े पांच बजे इंदिरा गांधी उन्हेंं लेकर राष्ट्रपति भवन पहुंचीं। सिद्धार्थ ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को 45 मिनट समझाने के लिए कि इमरजेंसी का मतलब क्या होगा। दोनों फिर वापस आए, फिर पीएन धर को बोलकर इमरजेंसी की घोषणा को टाइप करवाया, कागज लेकर आरके धवन राष्ट्रपति भवन गए। देर रात राष्ट्रपति ने आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।उससे पहले रामलीला मैदान की रैली में जेपी ने आर्मी और पुलिस के जवानों को ये आव्हान कर डाला कि 'उन सरकारी आदेशों को ना मानें जो गैरकानूनी हैं'। इंदिरा गांधी ने देश के नाम संदेश में इसे मुद्दा बना डाला। दिलचस्प बात ये थी कि इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद रात दो बजे तक पीएम आवास पर थे, सुबह फिर पहुंच गए, वहीं जेपी उनके ही रिश्तेदार राधाकृष्ण जो गांधी पीस फाउंडेशन के सचिव थे, के आवास पर रुके थे, वहीं से उनकी गिरफ्तारी हुई।

इधर देर रात बड़े विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी हो रही थी, मीडिया हाउस पर शिकंजा कसा जा रहा था, उनकी लाइट काटी जा रही थी। उधर पीएम आवास पर रतजगा था, इंदिरा गांधी ने सुबह छह बजे ही यहीं कैबिनेट मीटिंग बुला ली थी। दिल्ली में जितने मंत्री थे, वो सुबह पीएम आवास पर पहुंच चुके थे, जगजीवन राम, वाई वी चाह्वाण, ब्रह्मानंद रेड्डी आदि नौ मंत्री नहीं थे। इंदिरा ने सीधे बता दिया कि वो इमरजेंसी लगाने जा रही हैं, किसी ने कोई ऐतराज नहीं किया। कुलदीप नैयर लिखते हैं कि 'केवल स्वर्ण सिंह ने पूछा कि क्या इमरजेंसी जरूरी थी'।

कुलदीप नैयर ने लिखा है कि, 'कैबिनेट की बैठकों में वे स्कूल टीचर जैसा सलूक करती थीं और ज्यादातर मंत्री उनके नाराज होने के डर से मुंह तक नहीं खोलते थे'। 1977 के चुनाव परिणामों ने उन्हेंं फिर से जमीन पर ला दिया था। गद्दी तो गई ही, उनको अपना ये आवास भी खोना पड़ा, उनको नया घर मिला था 12, विलिंगडन क्रीसेंट, जिसके बगल वाले घर में हरिवंश राय बच्चन रहते थे, जिसमें कभी सोनिया गांधी बच्चन परिवार के साथ इटली से आकर रुकी थीं।