अटकलों का बाजार गर्म, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दिल्ली में; झारखंड में बढ़ीं धड़कनें

 


हेमंत सोरेन: अटकलों का बाजार गर्म। फाइल

झारखंड प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव नहीं चाहते कि सुखदेव भगत पार्टी में वापस लौटें। दो कद्दावर नेताओं की नापसंद होने के कारण सुखदेव भगत की कांग्रेस में फिर से एंट्री पर सस्पेंस बना हुआ है।

रांची,  राज्य में आजकल राजनीतिक हलचल तेज है। गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के दिल्ली दौरे को लेकर राज्य के कुछ मंत्रियों समेत मंत्रिमंडल विस्तार में अपने लिए मंत्री पद की ख्वाहिश रखने वाले विधायकों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। रांची से लेकर दिल्ली तक इसको लेकर लाबिंग तेज हो गई है। वहीं, कांग्रेस में अंदरखाने कुछ घमासान की भी खबरें आ रही हैं। राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस में चल रही गुटबाजी की तरह यहां हालात अभी उतने बिगड़े तो नहीं हैं, लेकिन बहुत ठीक भी नहीं हैं। आशंका जताई जा रही है कि मंत्रिमंडल विस्तार में कांग्रेस कोटे के एक-दो मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा उनकी जगह नए विधायकों को मौका दिया जा सकता है। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व से लेकर केंद्रीय नेतृत्व स्तर पर इसे लेकर गंभीरता से चर्चा चल रही है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की दिल्ली में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात होनी है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह से भी उनकी लंबी चर्चा हुई है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश के वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव को भी दिल्ली बुलाया गया था। पार्टी नेताओं ने उनसे गठबंधन सरकार के कामकाज की जानकारी ली है। खासकर, कांग्रेस कोटे के मंत्रियों के बाबत उनसे विस्तार से रिपोर्ट ली गई है। इसके बाद से ही यह चर्चा राज्य की राजनीति में तारी हो गई है कि कांग्रेस कोटे के एक या दो मंत्रियों पर बदलाव की गाज गिर सकती है। उनकी जगह नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। कांग्रेस में चल रही चर्चा को अगर सही मानें तो केंद्रीय नेतृत्व थोड़ा असमंजस में है। उसे डर है कि कहीं कोई कड़ा फैसला लेने पर राज्य में पार्टी में दो-फाड़ की स्थिति पैदा न हो जाए।

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट, जबकि पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिद्धू के बीच पहले से ही तलवारें खिंची हुई हैं। दिल्ली में तैयार सुलह के तमाम फार्मूले राज्य में जाकर धराशायी हो जा रहे हैं। ऐसे में झारखंड में अगर कोई नया फ्रंट खुल जाता है तो पार्टी की मुसीबत बढ़ेगी ही। वैसे भी आंतरिक कलह और गुटबाजी से पार्टी कार्यकर्ताओं में बहुत गलत संदेश जा रहा है। कांग्रेस के अंदरखाने चल रही इस उठापटक से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) खुश ही है और मौका पाकर मंत्रिमंडल में खाली एक पद पर अपना दावा भी ठोक रहा है। इस पर कांग्रेस की भी नजरें जमी हुई थी। बेशक, कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने इसे खारिज करते हुए कहा है कि गठबंधन के दल बैठकर इसे तय करेंगे, लेकिन जो मौजूदा हालात हैं उसमें कांग्रेस हेमंत सोरेन पर बहुत ज्यादा दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है।

इधर, मंत्रिमंडल में स्थान पाने के लिए कांग्रेस विधायकों की लाबिंग भी पार्टी के लिए मुसीबत बन सकती है। चार से पांच विधायक रांची से लेकर दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं। इसमें कोलेबिरा के विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी और हाल के दिनों में संगठन स्तर पर काफी मजबूत बनकर उभरीं दीपिका पांडेय सिंह प्रमुख रूप से शामिल हैं। झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) का भाजपा में विलय हो जाने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए विधायक प्रदीप यादव भी गंभीर दावेदारों में शामिल हैं। हालांकि झाविमो के विलय को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के यहां चल रही सुनवाई उनकी दौड़ में बाधा डाल सकती है। कुछ और विधायक भी अपनी गोटियां बिछाने में मशगूल हैं।वर्ष 2019 में विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस को छोड़ने वाले नेताओं की वापसी और प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर भी जल्द ही फैसला हो सकता है। उस समय कद्दावर कांग्रेसियों में शुमार प्रदीप कुमार बलमुचू और सुखदेव भगत ने पार्टी से अलग राह पकड़ी थी। एकीकृत बिहार में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे सरफराज अहमद झामुमो में शामिल हो गए थे। वह चुनाव जीतकर विधानसभा भी पहुंच गए। बलमुचू आजसू पार्टी से जुड़े, लेकिन वह चुनाव हार गए। उधर सुखदेव भगत भाजपा में गए, लेकिन उन्हें भी मतदाताओं ने नकार दिया। अब दोनों फिर से पुराने दल कांग्रेस में शामिल होने की जुगत में हैं। बलमुचू की वापसी पर तो कोई विवाद नहीं है, लेकिन सुखदेव भगत को लेकर झारखंड प्रदेश कांग्रेस में संशय दिखता है।

वैसे प्रदेश कांग्रेस प्रभारी आरपीएन सिंह ने इसके लिए हरी झंडी दे रखी है, लेकिन झारखंड प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव नहीं चाहते कि सुखदेव भगत पार्टी में वापस लौटें। दो कद्दावर नेताओं की नापसंद होने के कारण सुखदेव भगत की कांग्रेस में फिर से एंट्री पर सस्पेंस बना हुआ है। इस बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव की जगह जल्द ही कोई नया अध्यक्ष भी मिल सकता है।