कैसे रखें वर्चस्व कायम, राकेश टिकैत और गुरनाम चढ़ूनी में चौधर की जंग शुरू

 

कैसे रखें वर्चस्व कायम: राकेश टिकैत। साख का सवाल: गुरनाम चढ़ूनी। फाइल

राकेश टिकैत इस वर्ग को चढ़ूनी से छीन ले गए। एक नजरिये से चढ़ूनी की चाहत गलत भी नहीं जब पांच-छह सौ किसान संगठनों के नेता चौधर की चाहत पाले हैं तो चढ़ूनी या टिकैत पाल रहे हैं तो क्या बुरा है।

हिसार। तीनों कृषि सुधार कानूनों के विरोध में बीते नवंबर से चल रहे आंदोलन में दो बड़े नेताओं राकेश टिकैत और गुरनाम चढ़ूनी में चौधर की जंग शुरू हो गई है। ताजा प्रकरण हिसार का है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल कोविड अस्पताल का लोकार्पण करने पहुंचे थे तो आंदोलनकारियों ने उनके जाने के बाद अस्पताल तक पहुंचने का प्रयत्न किया। हिंसा हुई। आंदोलनकारी घायल हुए। पुलिसकर्मी भी।

बाद में प्रशासन और आंदोलनकारी नेताओं में वार्ता हुई। टिकैत और चढ़ूनी दोनों मौजूद थे, लेकिन टिकैत आधे घंटे विलंब से भीतर गए। बाहर प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते रहे। उस दिन बात इतने पर खत्म हो गई। लेकिन दो दिन बाद चढ़ूनी ने कहा कि आंदोलन को उत्तर प्रदेश में भी धार देनी होगी।

यदि वहां के नेता (संकेत टिकैत बंधुओं, राकेश टिकैत और नरेश टिकैत की तरफ था) यदि इसके लिए आगे नहीं आते तो किसान स्वयं आंदोलन को धार दें। इसके बाद उन्होंने देश भर के कई संगठनों का एक फेडरेशन बनाने की घोषणा की। यद्यपि उन्होंने कहा कि उनका फेडरेशन आंदोलन चला रहे संयुक्त किसान मोर्चा का सहयोगी संगठन होगा, लेकिन यह स्थायी होगा। वर्तमान आंदोलन के खत्म होने बाद भी जब कहीं का किसान अपने हितों को लेकर आंदोलन करेगा, तो उनकी आवाज उठाएगा। उन्होंने टिकैत पर संकेतों में टिप्पणी की। कहा, हिसार में समझौता वार्ता के दौरान वहां कमिश्नर ने प्रश्न किया कि हिसार में ही आंदोलन क्यों, उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं? तो हमें शर्मिंदगी हुई। अब हिसार के कमिश्नर ने क्या कहा था, यह तो चढ़ूनी-टिकैत या वार्ता में शामिल अधिकारी-नेता जानें, लेकिन उसी दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राकेश टिकैत के गृह जनपद मुजफ्फरनगर में थे।

कमिश्नर के कहने का आशय था कि यहां मनोहर लाल का विरोध तो कर रहे हैं, अपने यहां योगी का क्यों नहीं कर रहे। चढ़ूनी के नए संगठन की बात पर टिकैत ने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा के साथ देश भर के 550 किसान संगठन जुड़े हुए हैं। इससे इन संगठनों के प्रभाव और क्षेत्र का अनुमान लगाया जा सकता है। यह प्रश्न भी उठता है कि जब ये सभी किसान हित के लिए काम करने का दावा करते हैं और सबका लक्ष्य एक है तो इतने संगठन क्यों? उत्तर है, सब को चौधर प्यारी है। कोई दूसरे को चौधरी मानने को तैयार ही नहीं। सरकार से वार्ता के लिए पहले जो 40 संगठन जाते थे, उनमें 31 पंजाब के होते थे। आंदोलन की कमान 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के पहले तक पंजाब के संगठनों के हाथ में थी, लेकिन हरियाणा के चौधरी चढ़ूनी ही थे। उन्हें दिक्कत 26 जनवरी के बाद हुई। दिल्ली में हुई हिंसा के कुछ दिन बाद ही हरियाणा में उनकी चौधर को चुनौती मिली। आंसू बहाकर आंदोलन को पुनर्जीवित करने का श्रेय बटोर लेने वाले राकेश टिकैत ने हरियाणा के उसी हिस्से में पंचायतें करनी शुरू कर दीं, जो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा था। तब चढ़ूनी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह टिकैत पर आक्षेप करते दिखे थे।

गुरनाम चढ़ूनी। फाइल

यद्यपि टिकैत ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। चढ़ूनी ने भी स्थिति की संवेदनशीलता को समझते हुए, वीडियो को फेक बता दिया, यद्यपि ऐसा था नहीं। उसके बाद कई मौके ऐसे आए जब दोनों के बीच मतभेद सतह पर उभर कर आए। राकेश टिकैत ने उसी कुरुक्षेत्र में रैली (महापंचायत) की, जो चढ़ूनी का गृह जनपद है। चढ़ूनी उसमें नहीं गए। कहा कि मेरे पहले से कार्यक्रम तय हैं, जबकि वह दिन भर सोनीपत के कुंडली बार्डर स्थित धरनास्थल पर रहे। चढ़ूनी की पीड़ा यह थी के पहले आंदोलन के नजरिये से हरियाणा के चौधरी वह थे। उन्होंने सितंबर में ही कृषि सुधार कानूनों को लेकर कुरुक्षेत्र में प्रदर्शन किया था। तब उसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। लेकिन उसका कारण चढ़ूनी का चौधरी होना नहीं था।

वास्तव में हरियाणा के जिस हिस्से (मध्य हरियाणा) के लोग उस प्रदर्शन में शामिल हुए थे, वहां के लोगों में चौधर की जबरदस्त आकांक्षा है। इसमें दो हिस्से हैं। एक बागड़ दूसरा देसवाल। दोनों चाहते हैं कि चौधर हमारी रहे। अभी दोनों की निगाह हरियाणा की चौधर पर है, जो उनके पास है नहीं, इसलिए फिलवक्त दोनों एक हैं। चौधर की चाहत में एक हुआ यही वर्ग गुरनाम चढ़ूनी के साथ था, लेकिन राकेश टिकैत इस वर्ग को चढ़ूनी से छीन ले गए। एक नजरिये से चढ़ूनी की चाहत गलत भी नहीं, जब पांच-छह सौ किसान संगठनों के नेता चौधर की चाहत पाले हैं तो चढ़ूनी या टिकैत पाल रहे हैं तो क्या बुरा है।