बच्चों के जीवन की सुरक्षा को लेकर सार्थक है परीक्षाओं को रद करने का फैसला, समझें इसका महत्व

 


सार्थक है परीक्षाओं को रद करने का फैसला।(फोटो: दैनिक जागरण)

महामारी के इस दौर में बच्चों के जीवन की सुरक्षा को सबसे अधिक महत्व देते हुए परीक्षाओं को रद करने का जो निर्णय लिया गया है वह वर्तमान परिस्थितियों में सबसे व्यावहारिक सार्थक और स्वीकार्य है। बच्चों को पहले भी परीक्षा का अनुभव है आगे भी परीक्षा का मौका मिलेगा।

 बोर्ड की परीक्षाओं पर राष्ट्रीय स्तर का निर्णय आ गया है,अब देश के 2.60 करोड़ बच्चों को बोर्ड परीक्षा नहीं देनी होगी। स्कूलों में उपलब्ध आतंरिक मूल्यांकन तथा अन्य जानकारियों के आधार पर परीक्षा परिणाम घोषित होंगे। उचित समय आने पर सामान्य बोर्ड परीक्षा में बैठने का स्वैच्छिकविकल्प बना

रहेगा। इस निर्णय के बाद नई चिंता सामने आ गई है। बिना बोर्ड परीक्षा के अंक/ग्रेड कैसे दिए जायेंगे? उनकी स्वीकार्यता कितनी होगी, और इसकी स्वीकार्यता को कैसे सुनिश्चित किया जा साकेगा!

कक्षा बारह उत्तीर्ण करने के पश्चात बच्चे/किशोर जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव पार करते हैं। उनके समक्ष नए क्षितिज उद्घाटित होते हैं, वे अपने कार्यकारी जीवन का मार्ग अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफल होने के लिए स्वत: ही कठिन परिश्रम करते हैं। जीवन का यह इतना संवेदनशील पड़ाव होता है जिसमें कोई भी व्यवधान सामान्य समय के मुकाबले अधिक तनाव, आशंकाएं और अनिश्चितता पैदा करता है। ऐसे में बच्चों के जीवन की सुरक्षा को सबसे अधिक महत्व देते हुए जो निर्णय लिया गया है वह वर्तमान परिस्थितियों सबसे व्यावहारिक, सार्थक और स्वीकार्य निर्णय है।

इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय स्नातक स्तर पर प्रवेश के नियमों का सूक्ष्म विवेचन कर रहे हैं ताकि सारे प्रवेश पारदर्शी प्रक्रिया से हों, जो प्रवेश न पा सकें, वे भी उसकी पारदर्शिता से संतुष्ट रहें! यह कार्य कठिन है, मगर विद्यार्थियों और पालकों को देश कि संस्थाओं पर विश्वास करना चाहिए, मेरे जैसे लोग अनुभव से विश्वस्त हैं कि देश में वह विशेषज्ञता उपलब्ध है जो सभी को संतुष्ट करने वाले समाधान निकाल सकेगी। यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि कक्षा बारह के जिन विद्यार्थियों ने अत्यंत कठिन परिश्रम किया था, वहव्यर्थ हो गया!

मनोयोग से किया अध्ययन और ज्ञान-अर्जन कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। विद्यार्थियों के लिए यह अपने अध्ययन क्षेत्र की पाठ्य-पुस्तक और बोर्ड परीक्षा की परिधि से निकलकर ज्ञान के असीम विस्तार के वर्ण पट पर देखने का अवसर है। भाषा और दर्शन में रुचि रखने वाले युवक को विज्ञान के विकास की गाथा पढ़कर जो समझ

मिलेगी, वह विषयों के कृत्रिम विभाजन की निरर्थकता को समझने में सहायता करेगी।

यह समय है जिसमें माता-पिता अपने बच्चों को सार्थक सोच की ओर अग्रसर करें। बच्चे अपने माता-पिता को विश्वास दिलाएं कि वे वर्तमान असामान्य परिस्थितियो से विचलित नहीं हैं, वे अपने लिए अब तक निर्धारित और सीमित अध्ययन क्षेत्र को विस्तार दे हे हैं। वे जानते हैं कि ‘जीवन-पर्यंतसीखने’ का तात्पर्य क्या है, और वे

ऐसे कौशल सीख रहे हैं जो नए ज्ञान और कौशल ग्रहण करने में जीवन- पर्यंत सहायता करते रहेंगे। जो युवा इस समय कक्षा बारह के अपने परिणाम तथा अंकों की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे है, वे इस पर भी विचार करें कि अगले दस वर्षों में वे देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान कर रहे होंगें, बड़े-बड़े निर्णय ले रहे होंगे।

कोरोना महामारी के समय सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह की तस्वीरें ये छात्र देख रहे हैं। एक तरफ हमारे स्वास्थ्यकर्मी और नागरिक एक-एक जान बचाने के लिए रात दिन लगे हुए हैं तो दूसरी तरफ कालाबाजारियों के चेहरा भी सामने आया है। इस तस्वीर में बदलाव के लिए सिर्फ अध्ययन या जानकारी ही पर्याप्त नहीं है। जो सीखा है या सीखेंगें, उस पर मनन और चिंतन भी आवश्यक है। आप किसी भी क्षेत्र में जाएं, लेकिन समाज में व्याप्त इस तमाम विद्रूप से देश को मुक्त करने के प्रयास में आपके योगदान की देश की अपेक्षा आपको स्वीकार्य नहीं होगी?

अपने करियर बनाने पर ध्यान दीजिये, मगर आपके सामने बड़ा लक्ष्य अपना व्यक्तित्व बनाने का होना चाहिए। जीवन के मूल्य निर्धारित करने का होना चाहिए। अनेक प्रकार की परीक्षाएं तो जीवन पर्यंत आती रहेंगी, मगर वैचारिक स्तर पर सजग, सतर्क और सार्थक विमर्श का जो अवसर अनायास ही आपके सामने उपस्थित हो गया है, उसका भरपूर उपयोग कीजिए। ज्ञान आवश्यक है परंतु पथ-प्रदर्शक तो विवेक ही होता है।