परीक्षा पर चर्चा, सालभर की प्री-बोर्ड परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन के मायने


बिहार और केरल: लिखित परीक्षाएं आयोजित कराई जा चुकी हैं।

सीबीएसई सीआइएससीई उत्तर प्रदेश राजस्थान गुजरात हरियाणा महाराष्ट्र मध्य प्रदेश और गोवा बोर्ड 10वीं और 12वीं दोनों कक्षाओं की परीक्षाएं रद हो गई हैं। मूल्यांकन का तरीका तय किया जा रहा है।

नई दिल्‍ली,  भारतीय मेधा की दुनिया कायल है। हमारी ये प्रतिभाएं शुरुआती कक्षाओं से आहिस्ताआहिस्ता तराशी और तलाशी जाती हैं। समय-समय पर छात्रों का परीक्षा के द्वारा मूल्यांकन इस पूरी प्रक्रिया की अहम कड़ी है। महामारी की इस विषम परिस्थिति में पठन-पाठन समेत जीवन के तमाम क्षेत्रों में जिंदगी के तौर-तरीके बदल चुके हैं। शिक्षा क्षेत्र में आए इस बदलाव के लिए न तो हमारे छात्र तैयार थे और न ही शिक्षक। संसाधन तो तीसरी बात है। जीवन चलने का नाम है।

लिहाजा छात्रों की आनलाइन पढ़ाई धीरे-धीरे रास्ता बनाने लगी। अब आया सवाल इनकी परीक्षाओं को लेकर। कैसे कराई जाएं? विचारों की लंबी शृंखला के बाद एक फार्मूला तैयार किया गया और छात्रों को बिना परीक्षा ही प्रोन्नत करने पर सहमति बनी। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड सहित करीब एक दर्जन प्रदेशों के शिक्षा बोर्ड ने 12वीं की परीक्षाएं रद कर दीं। अन्य शिक्षा बोर्ड फैसले की तैयारी में जुटे हैं। देश के अकादमिक जगत में इस फैसले को लेकर सवाल उभर रहे हैं। ये बात तो सभी मानते हैं कि महामारी के दौरान परीक्षा रद करना तो ठीक है, लेकिन आखिर कोई न कोई रास्ता तो खोजना ही होगा। खासकर तब, जब यह अनिश्चित है कि ये महामारी कब खत्म होगी। दरअसल लोगों की आशंकाएं कतई निर्मूल नहीं हैं। किसी छात्र के जीवन में 12वीं परीक्षा की बहुत अहमियत होती है। देश में दो करोड़ से अधिक छात्र हर साल इस परीक्षा में बैठते हैं। इन छात्रों के करियर का यह र्टंिनग प्वाइंट होता है। यहीं से उन्हें प्रोफेशनल कोर्सेज की तरफ रुख करना होता है। ऐसे में अगर प्रतिभावान और कमजोर छात्र को एक ही मूल्यांकन पद्धति से प्रोन्नत किया जाएगा तो हमारी जिस मेधा का दुनिया लोहा मानती है, उसकी साख का क्या होगा। इससे मेधा के पुष्पित-पल्लवित होने से ज्यादा उसके क्षरण की आशंका बलवती है। ऐसे में प्रतिकूल हालात में छात्रों की प्रतिभा के मूल्यांकन के कारगर कदम और प्रभावी तरीकों की पड़ताल आज हम लोगों के लिए बड़ा मुद्दा है।

कोरोना काल में सीबीएसई समेत ज्यादातर एजुकेशनल बोर्ड ने इस सत्र के लिए 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं रद कर दी हैं। इसका एलान होने के बाद से ही अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। फिलहाल बोर्ड इस बात का खाका तैयार कर रहे हैं कि बच्चों का मूल्यांकन किस तरह किया जाए। इसमें तीन साल के प्रदर्शन को औसत मानने या फिर सालभर की विभिन्न परीक्षाओं व प्री-बोर्ड परीक्षा में प्रदर्शन को औसत मानने जैसे विकल्प हैं।

क्या होगा असर?: परीक्षा रद होने के बाद सबसे पहली चिंता यह सामने आ रही है कि कहीं यह प्रतिभावान बच्चों के साथ अन्याय तो नहीं। बोर्ड परीक्षाओं की अहमियत को देखते हुए बच्चे इनकी खास तैयारी करते हैं। कई बार पिछले प्रदर्शन को सुधारने का मौका भी इन बोर्ड परीक्षाओं में मिलता है। ऐसे में सालभर के प्रदर्शन के औसत के आधार पर परिणाम उन बच्चों के लिए गलत हो सकता है, जो इन परीक्षाओं में अपने प्रदर्शन को सुधारने की तैयारी कर रहे थे। मूल्यांकन के इस तरीके से हो सकता है कि प्रतिभावान बच्चा पीछे रह जाए और कोई अन्य आगे निकल जाए।

प्रवेश के आधार को लेकर चिंता सबसे ज्यादा: मौजूदा हालात में सबसे ज्यादा चिंता इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि में प्रवेश के लिए होने वाली जेईई, नीट व अन्य संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के मन में है। बच्चों को डर है कि आंतरिक परीक्षाओं के मूल्यांकन के आधार पर आया नतीजा कहीं उनकी आगे की राह न बाधित कर दे। कई स्कूल 11वीं की परीक्षा में प्रश्न पत्र बहुत मुश्किल रखते हैं, जिससे बच्चे बोर्ड परीक्षाओं के लिए सतर्क रहें। वहीं बहुत से छात्र ऐसे भी होते हैं, जो बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले ही पढ़ाई पर जोर देते हैं। दोनों ही मामलों में पिछले प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन नुकसान पहुंचा सकता है। बहुत से अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश की अपनी अलग प्रक्रिया होती है, लेकिन वहां भी 12वीं के अंक मायने रखते हैं। मूल्यांकन से संतुष्ट नहीं होने पर छात्रों को बाद में लिखित परीक्षा में बैठने का विकल्प देने की बात भी चल रही है। हालांकि जानकार इसे बहुत फायदेमंद नहीं मान रहे। बच्चों की चिंता इस बात को लेकर है कि ज्यादातर कालेजों एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। ऐसे में कुछ महीने बाद लिखित परीक्षा देकर अंक सुधार लेने का उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाएगा।

पिछले प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन के मायने: पिछले तीन साल या सालभर के प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन के पक्ष में एक मजबूत दलील यह है कि इससे बच्चों में पढ़ाई को लेकर हमेशा गंभीरता का भाव आएगा। जानकारों का कहना है कि ऐसे मूल्यांकन से बच्चे के सालभर के प्रदर्शन का पता चलेगा और पढ़ाई को लेकर उसका असली स्वभाव सामने आएगा। केवल परीक्षा के समय पढ़कर अंक लाने वाले बच्चे ही आगे नहीं रहेंगे। कुछ अध्यापक इसे शिक्षा व्यवस्था में एक नए बदलाव की शुरुआत भी मान रहे हैं।

बोर्ड परीक्षा ही क्यों है अहम: शिक्षाविद् इस व्यवस्था पर भी विचार करने की बात कह रहे हैं कि आखिर किसी बच्चे के लिए बोर्ड की परीक्षाएं ही क्यों बहुत अहम बना दी गई हैं। तीन घंटे की परीक्षा से बच्चे का पूरा मूल्यांकन कैसे हो सकता है। मौजूदा महामारी ने मौका दिया है कि इस व्यवस्था में बदलाव आए और मूल्यांकन को सालभर होने वाली प्रक्रिया में ढाला जाए। किसी एक परीक्षा पर बच्चों का भविष्य निर्भर कर देने से बेहतर है कि उसकी रुचि और योग्यता का पूरा मूल्यांकन हो। व्यवस्था में बदलाव से कई और रास्ते खुलेंगे।

उठाए जा रहे कदम

  • सीबीएसई, सीआइएससीई, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गोवा बोर्ड : 10वीं और 12वीं दोनों कक्षाओं की परीक्षाएं रद हो गई हैं। मूल्यांकन का तरीका तय किया जा रहा है।
  • छत्तीसगढ़: 12वीं कक्षा के बच्चों को स्कूल से प्रश्नपत्र घर लाकर पांच दिन में उन्हें हल कर जमा कराने का विकल्प दिया गया है। (2.7 लाख छात्र)
  • बिहार और केरल: लिखित परीक्षाएं आयोजित कराई जा चुकी हैं।
  • असम : सीमित परीक्षाएं कराने का प्रस्ताव। 12वीं में तीन विषय और 10वीं में पांच विषय।
  • ओडिशा, तेलंगाना, तमिलनाडु: 10वीं की परीक्षाएं रद हो चुकी हैं और 12वीं कक्षा के लिए समीक्षा चल रही है।
  • कर्नाटक: अभी कोई परीक्षा रद नहीं हुई है। समीक्षा चल रही है।

कहीं खुशी

रद करना सही फैसला है मेरा बेटा बारहवीं में है। कोरोना के कारण बच्चे परेशान और डरे हुए हैं। बच्चों के रिजल्ट तैयार करने के लिए जो मूल्यांकन पद्धति अपनाई जा रही है, वह सही है। क्योंकि एक बार वे दसवीं की बोर्ड परीक्षा देकर खुद को साबित कर चुके हैं।

आशीष भवालकर, अभिभावक, सेंट पॉल स्कूल, भोपाल

जिंदगी अहम है, अंक नहीं मेरा बेटा हितेश्वर शर्मा 10वीं का टॉपर रहा है। 12वीं में भी उसके टॉप करने की उम्मीद थी। जिंदगी रहेगी, तो फिर आगे बढ़कर परीक्षाएं दे सकते हैं। यदि हितेश्वर अपने नंबरों से संतुष्ट नहीं होगा, तो जब परीक्षा होगी, तो दे भी सकता है।

आशुतोष राजन, अभिभावक, पंचकूला

मेरिट से ज्यादा स्वास्थ्य जरूरी बेटी शिवानी मिश्रा ने 96.2 फीसद अंक हासिल कर फर्रुखाबाद में हाईस्कूल की मेरिट लिस्ट में जगह बनाई थी। इस बार बेहतर करने की तैयारी में थी। हालांकि मेरिट से ज्यादा जिंदगी जरूरी है।

सीमा मिश्रा, अभिभावक, फर्रुखाबाद

कहीं गम

भविष्य की तैयारी में जुटें मेरी बेटी शुभांगी भोला ने दसवीं में 95.6 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। 12वीं की परीक्षा उच्च शिक्षा में जाने की पहली सीढ़ी है। इसके लिए बच्चे और अभिभावक साथ-साथ मेहनत करते हैं। नतीजों के नए पैटर्न से जो बच्चे संतुष्ट नहीं होंगे, उनके पास परीक्षा में बैठने का विकल्प है।

मीनू भोला, अभिभावक, देहरादून

बोर्ड परीक्षा भविष्य की नींव परिस्थितियां अनुकूल नहीं थी। लेकिन इसका विकल्प रद कर देना तो सही नहीं

है। मेरे बेटे ने साल भर बहुत मेहनत की है। अब बोर्ड अगर आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर परिणाम जारी

करता है तो ये मेधावी छात्रों के साथ अन्याय होगा।

सुनीता राव, अभिभावक, रोहिणी सेक्टर-11

विकल्प ढूंढना चाहिए था मेरी बेटी बारहवीं में है। परीक्षा रद नहीं होनी चाहिए थी। विकल्प ढूंढा जाना चाहिए था।

ऑनलाइन परीक्षा भी कराई जा सकती थी। यह बच्चों के भविष्य का सवाल है। इसका असर जरूर पड़ेगा।

डा. मनीषा बाजपेयी, अभिभावक, भोपाल

मानसिक स्वास्थ्य पर रखा गया फोकस: परीक्षा रद करने के फैसले में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य फोकस में दिखता है। कई छात्र परीक्षा होने या न होने के अनिर्णय की स्थिति में तनाव में थे। महामारी के कारण पहले की हर ओर बेचैनी की स्थिति है। इस सबके बीच परीक्षा को लेकर अनिश्चितता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही थी। ऐसे में कोई भी फैसला आना उन्हें सुकून दिलाएगा।