ये तो कब का समझ चुके थे पानी का मोल, देश के इस प्रसिद्ध मंदिर में 183 साल से हो रहा पानी का संचय

 


वृंदावन में रामानुज संप्रदाय के प्रसिद्ध रंगजी मंदिर परिसर में स्थित पुष्करणी।

वृंदावन के रंगजी मंदिर में बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए ही 100 मीटर लंबा और इतना ही चौड़ा पुष्करणी। 1838 में बना था विशाल पुष्करणी सरोवर तीन कुओं से होता है पानी का संरक्षण। बारिश के दिनों में पूरे मंदिर परिसर का पानी पुष्करणी में ही जाता है।

आगरा। जमीन की कोख से पानी का बेहिसाब दोहन करने से हालात बिगड़े हैं। भविष्य की चिंता में वर्तमान समय में बारिश की बूंदों का संचयन करने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन वृंदावन का रंग जी मंदिर प्रबंधन काफी पहले ही जल संकट को लेकर सचेत हो गया था। यहां 183 साल पहले ही बारिश की बूंदों को सहेजने का काम शुरू हो गया था। मंदिर के विशाल पुष्करणी सरोवर (तालाब) में बारिश का पानी एकत्र किया जाता है।

दक्षिण भारतीय संस्कृति के रंगजी मंदिर का वर्ष 1833 में निर्माण शुरू हुआ था, करीब पांच साल में विशाल मंदिर बनकर तैयार हुआ। खास बात यह है कि मंदिर निर्माण के साथ यहां बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए ही 100 मीटर लंबा और इतना ही चौड़ा पुष्करणी का निर्माण भी हुआ था। बारिश के दिनों में पूरे मंदिर परिसर का पानी पुष्करणी में ही जाता है।

25 बीघा में छोटे-बड़े 13 मंदिर

25 बीघा क्षेत्रफल में बने रंग जी मंदिर परिसर में छोटे-बड़े 13 मंदिर हैं। पूजन के दौरान मंदिर में इस्तेमाल होने वाला पानी भी पुष्करणी में ही जाता है। पुष्करणी में तीन कुएं हैं, प्रत्येक की गहराई सौ मीटर बताई जाती है। बारिश का पानी पुष्करणी से इन कुंओं के जरिए भूगर्भ में जाता है। समय-समय पर पुष्करणी की सफाई होती है, ताकि गंदा पानी भूगर्भ में न जाए।

इसलिए मंदिर को कहा जाता है दिव्यदेश

पुराणों में भगवान नारायण के लोक को दिव्यदेश की संज्ञा दी गई है। दिव्यदेश की पहचान पांच प्रमुख स्तंभों से होती है, ये रंगजी मंदिर में स्थापित हैं। इनमें गरुण स्तंभ, गोपुरम, पुष्करणी, पुष्प उद्यान और गोशाला होना अनिवार्य है। उत्तर भारत का ये पहला दिव्यदेश है।

25 तिरुमाली, हर मकान में कुआं

मंदिर परिसर में 25 तिरुमाली (मकान) बने हैं। एक मकान में मंदिर प्रबंधन से जुड़े पुजारियों आदि के चार परिवार रहते हैं। प्रत्येक मकान में एक कुआं भी है, जिसके पानी का इस्तेमाल परिवार करता है।

183 साल पहले ही रंग जी मंदिर में बारिश के पानी को सहेजने का काम शुरू हुआ था। नियमित देखरेख के चलते पुष्करणी का जल इतना साफ है कि उसे दैनिक उपयोग में भी ला सकते हैैं। बारिश का पानी पुष्करणी के जरिए कुंओं में जाता है।

अनघा श्रीनिवास, सीईओ, रंग जी मंदिर प्रबंधन।