देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा है आकाशीय बिजली, ऐसे करें बचाव

 

 

जितना हो सके वज्रपात की स्थिति में मोबाइल का प्रयोग नहीं करें

मौसम विभाग के साथ मिलकर काम करने वाली क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल (सीआरओपीसी) के मुताबिक 2020-21 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में आकाशीय बिजली गिरने में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2019- 20 में 13800000 के मुकाबले 2020-21 में 18544367 बार बिजली गिरी।

नई दिल्‍ली। मानसून के आते ही देश के अलग-अलग हिस्सों में आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं सामने आने लगी हैं। रविवार को विभिन्न राज्यों में इस प्राकृतिक आपदा से जहां लगभग 80 लोगों की मौत हो गई वहीं 30 से अधिक लोग घायल हुए हैं। प्रदेश सरकारों की तरफ से मुआवजे के एलान के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएम राहत कोष से मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की मदद की घोषणा की है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे आकाशीय बिजली इतनी बड़ी आपदा साबित हो रही है।

उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ज्यादा गिरती है बिजली : पनामा के स्मिथसोनियन ट्रॉपिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं के मुताबिक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सामान्य क्षेत्रों के मुकाबले 10 करोड़ गुना ज्यादा बिजली गिरती है। चूंकि इन क्षेत्रों में रिहायश बहुत कम है, इसलिए जनहानि का पता नहीं चलता है। क्षेत्रवार बिजली गिरने की घटनाओं की बात करें तो अफ्रीका अव्वल है। उसके बाद एशिया, दक्षिण अमेरिका, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का नंबर आता है। जलवायु परिवर्तन के चलते आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में 25 से 50 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

इस तरह पैदा होती है आकाशीय बिजली : जब ठंडी हवा संघनित होकर बादल बनती है, तब बादलों के अंदर गर्म हवा की गति और नीचे ठंडी हवा के होने से बादलों में धनावेश (पॉजिटिव चार्ज) ऊपर की ओर एवं ऋणावेश (निगेटिव चार्ज) नीचे की ओर होता है। बादलों में इन विपरीत आवेशों की अपनी क्रिया से विद्युत आवेश उत्पन्न होता है। इस तरह आकाशीय बिजली पैदा होती है। धरती पर पहुंचने पर आकाशीय बिजली बेहतर कंडक्टर (संचालक) तलाशती है, जिससे वह गुजर सके। इसके लिए धातु और पेड़ उपयुक्त होते हैं। बिजली अक्सर इन्हीं माध्यमों से पृथ्वी में जाने का रास्ता चुनती है।

इससे बचने के उपाय

  • बिजली के खंभों और पेड़ों से दूर रहें
  • धातुओं से दूर रहें, बिजली के उपकरणों का प्रयोग नहीं करें
  • जितना हो सके वज्रपात की स्थिति में मोबाइल का प्रयोग नहीं करें

बड़ी संख्या में होती हैं मौतें : बिजली गिरने से प्रत्येक वर्ष सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। अकेले 2001 से 2018 के बीच प्राकृतिक आपदा से होने वाली कुल मौतों में से 40 फीसद जानें बिजली गिरने से गई हैं। 2005 के बाद से प्रत्येक साल बिजली गिरने से दो हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई। 2018 में प्राकृतिक आपदा से कुल 6,891 लोगों की मौत हुई। इनमें से 2,357 (34 फीसद) लोगों की जान आकाशीय बिजली के कारण गई। एक अप्रैल 2020 से 31 मार्च 2021 तक आकाशीय बिजली गिरने से 1,619 लोगों की मौत हुई है।

अध्ययन ने बताई भविष्य की तस्वीर : बर्कले विश्वविद्यालय के 2014 के एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक तापमान में हर एक डिग्री के इजाफे के साथ आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में 12 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। अनुमान है कि इस सदी के आखिरी तक बिजली गिरने की घटनाओं में करीब 50 फीसद का इजाफा हो जाएगा।

खास बातें

  • आकाशीय बिजली की एक बार की चमक 30 करोड़ वोल्ट और लगभग 30 हजार एंपीयर के बराबर होती है। आकाशीय बिजली की एक चमक 100 वाट के बल्ब को तीन महीने तक जला सकती है
  • पिछले एक साल के दौरान बिजली गिरने से भारत में 70 फीसद मौतें पेड़ के नीचे खड़े होने से हुई हैं। करीब 25 फीसद मौतें खुले मैदान में रहने से हुई हैं

बिजली गिरने में हुई 34 फीसद की वृद्धि : मौसम विभाग के साथ मिलकर काम करने वाली क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल (सीआरओपीसी) के मुताबिक 2020-21 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में आकाशीय बिजली गिरने में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2019- 20 में 138,00,000 के मुकाबले 2020-21 में 185,44,367 बार बिजली गिरी। ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा प्रभावित रहे।

आपदा नीति में मान्यता नहीं : हर साल हजारों मौत के लिए जिम्मेदार इस आपदा को आपदा राहत नीति में मान्यता नहीं मिली है। इसका अर्थ यह है कि पीड़ित परिवारों को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मुआवजा संभव नहीं है। हालांकि कुछ राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने इसे आपदा घोषित कर रखा है। यह केंद्र द्वारा राज्य सरकारों को अपने आपदा राहत कोष का 10 फीसद विशिष्ट आपदाओं के लिए आवंटित करने के निर्देश के बाद किया गया है।