स्कूलों में बदलेगा पढ़ाई का तरीका, दीवारें बनेंगी ज्ञान का खजाना; फूल-पत्ते सिखाएंगे मुस्कुराना

 



Jharkhand Ranchi News झारखंड के सरकारी स्कूलों में भी महर्षि पाणिनि की शिक्षण पद्धति से पढ़ाई होगी।

 झारखंड के सरकारी स्कूलों में भी महर्षि पाणिनि की शिक्षण पद्धति से पढ़ाई होगी। झारखंड सरकार की सराहनीय पहल के तहत खेल-खेल में बच्चे सीखेंगे। प्रयोग के तौर पर रांची के 10 स्कूलों में पढ़ाई का तरीका बदलेगा।

रांची,। स्कूल की दीवारों पर बने ब्लैक बोर्ड में तरह-तरह के चित्र बनाकर सवाल हल करते बच्चे। पास में बने रंग-बिरंगे चित्रों को देखकर उनके बारे में एक-दूसरे से हो रही चर्चा। कुछ कदम दूर पेड़-पौधों के बीच जाकर तने, फूल, पत्तियों के रंग, गुण, सुगंध और विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करता विद्यार्थियों का एक और समूह। वहीं, ओक और माचिस की तीलियों और कुछ कंकड़ के माध्यम से छात्रों के एक अन्य ग्रुप को गणित के सवाल चुटकियों में हल करना सिखा रही शिक्षिका। यह माहौल रांची के एक स्कूल का है, जहां पाणिनि शिक्षण पद्धति से पढ़ाई हो रही है।

खेल-खेल में बच्चों को विभिन्न विषयों की जानकारी देना इस पद्धति की सबसे खास बात है। यहां बच्चे जो भी पढ़ते हैं, उसे व्यावहारिक तौर पर देखकर और छूकर भी महसूस करते हैं। तनावमुक्त वातावरण उनकी सृजनशीलता और कल्पना शक्ति का विकास कर उन्हें बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न बनाती है। झारखंड सरकार सरकारी स्कूलों में भी इस पद्धति को अपनाने के पक्ष में है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत इसी सत्र से रांची के अनगड़ा प्रखंड की नवागढ़ पंचायत के 10 स्कूलों में इसे लागू किया गया है। लाॅकडाउन के बाद इन स्कूलों के खुलते ही बच्चे यहां नए माहौल में पढ़ाई करेंगे

बच्चों के संपूर्ण विकास में सहायक

संस्कृत के अष्टाध्यायी व्याकरण के रचयिता आचार्य पाणिनि ने शिक्षा की भी एक खास पद्धति विकसित की थी, जो वैदिक गुरुकुल पद्धति के अनुरूप देखो, सीखो, समझो, महसूस करो और जानो के सिद्धांत पर आधारित थी। लगभग ढाई हजार वर्ष पुरानी महर्षि पाणिनि की यह पद्धति आज भी बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध हो रही है।

मस्ती के बीच पढ़ाई

रट्टामार पढ़ाई से उलट पाणिनीय पद्धति बच्चों को प्रयोग और व्यवहार के माध्यम से पाठ के तथ्यों को समझने का अवसर देती है। सैद्धांतिक से ज्यादा यह व्यावहारिकता पर भरोसा करती है। बच्चों का सर्वांगीण विकास कराना इस शिक्षण पद्धति की खासियत है।

किसलय विद्यालय से मिली प्रेरणा

रांची स्थित बीआइटी मेसरा के किसलय विद्या मंदिर में तीन दशक से इस खास पद्धति से बच्चों की पढ़ाई कराई जा रही है। सरकारी स्कूलों में यह व्यवस्था लागू करने की जिम्मेदारी भी इसी स्कूल को दी गई है। रांची के बीआइटी मेसरा में न्यूक्लियर साइंटिस्ट प्रोफेसर रहे डॉ. राकेश पोपली ने 35 साल पहले रांची में इस विधि से पढ़ाई शुरू कराने की परिकल्पना की थी।

कौन थे पाणिनि

अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण की रचना करने वाले महर्षि पाणिनि के समय में शिक्षा का बहुत विस्तार था। ईसा पूर्व चौथी से छठी शताब्दी के बीच के समय को उनका काल माना जाता है। उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ समाज के विभिन्न विषयों में अध्ययन कर कई सूत्र बनाए। पाणिनीय शिक्षा पद्धति भी इन्हीं में एक है। ग्रंथ रचना के साथ उन्होंने अध्यापन कार्य भी किया था।

शिक्षा के तीन चरण

पाणिनीय पद्धति से शिक्षा देने के तीन चरणों में से एक है आधारभूत संरचना। इसमें पूरे स्कूल भवन की दीवारों को ऐसा बनाया गया है जिसे देखकर बच्चों में सीखने की प्रक्रिया विकसित होती है। इस स्कूल में शिक्षक की बजाय बच्चे ही दीवारों व ब्लैक बोर्ड पर सवालों को हल करते नजर आते हैं। शिक्षकों के साथ मिलकर वह पढ़ाई के व्यावहारिक पक्ष को समझते हैं। स्कूल परिसर में बच्चे पेड़-पौधों, फसलों की उत्पत्ति से विकास तक का सारा क्रम करीब से देखते-समझते व महसूस करते हैं। इसके अलावा बच्चे अपने आसपास की वस्तुओं का प्रयोग कर विज्ञान के सिद्धांत सीखते हैं। जादू के नाम से विज्ञान सीखते हुए नए-नए खिलौने और दूसरी चीजें बनाते हैं।

'पाणिनि शिक्षा पद्धति से हम अपने स्कूल के बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत ही उत्सुक हैं। इससे बच्चों में वैज्ञानिक सोच तो विकसित होगी ही, उनके सोचने और समझने का दायरा भी विशाल होगा।' -सुशील महतो, प्रधानाचार्य, प्राथमिक विद्यालय रांगामाटी।

'किसलय विद्या मंदिर के भ्रमण के दौरान ही हमने यह देखा और समझा कि पाणिनीय शिक्षा पद्धति वर्तमान समय के लिए सर्वोत्तम शिक्षा पद्धति है। इससे बच्चों को सीखने, समझने और चीजों को जानने का अनूठा अवसर मिलेगा।' -हरेकृष्ण चौधरी, प्रधानाचार्य, राजकीयकृत मध्य विद्यालय, नवागढ़।