औषधिय पौधों की खेती से बदली किसानों की किस्मत, जानें- कैसे शुरू हुई उन्नति यात्रा


35 साल का युवा किसान बना उदाहरण, लीज की जमीन पर लहलहा रही उम्मीदों की फसल

मात्र 12वीं पास 35 वर्षीय किशोर की प्रेरणा से आसपास के गावों के 100 से अधिक किसान औषधीय खेती से जुड़ चुके हैं। हिम्मत और जज्बे से दूसरों के लिए उत्प्रेरक बने किशोर का वार्षिक शुद्ध मुनाफा 10 से 12 लाख रुपये तक पहुंच गया है।

 रायपुर। छत्तीसगढ़ में बेमेतरा जिले के नवागढ़ गांव के प्रगतिशील किसान किशोर राजपूत की जड़ी-बूटियों की खेती की खुशबू दिल्ली और कोलकाता की मंडियों में बढ़ती जा रही है। छह साल पहले मात्र दो एकड़ पुश्तैनी जमीन पर 300 रुपये के तुलसी के बीज से शुरू हुई उन्नति गाथा अब 70 एकड़ में फैल चुकी है। मात्र 12वीं पास 35 वर्षीय किशोर की प्रेरणा से आसपास के गावों के 100 से अधिक किसान औषधीय खेती से जुड़ चुके हैं। हिम्मत और जज्बे से दूसरों के लिए उत्प्रेरक बने किशोर का वार्षिक शुद्ध मुनाफा 10 से 12 लाख रुपये तक पहुंच गया है।

ऐसे शुरू हुई उन्नति यात्रा

किशोर की पुश्तैनी दो एकड़ जमीन से परिवार का पालन नहीं हो पा रहा था। आर्थिक तंगी थी। चिंता रहती थी कि दो एकड़ जमीन में वर्ष में एक बार धान उत्पादन से क्या होगा। माता-पिता, पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी कैसे पूरी होगी। इन्हीं चिंताओं के बीच किशोर ने रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में औषधीय खेती की प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सा लिया। संभावनाएं जगीं। खुद के प्रति भरोसा पैदा हुआ। इसी के साथ शुरू हो गई उन्नति की यात्रा।

दोस्त की मदद से लीज पर ली जमीन

किशोर का गांव छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर है। उन्होंने अपने दोस्त राकेश साहू की मदद से गांव से 30 किमी दूर 70 एकड़ जमीन लीज पर ली है। इनमें 25 एकड़ में तुलसी, अश्वगंधा, कालमेघ (चिरैता), गिलोय, पाषाणभेद, केवाच, काली हल्दी, सर्पगंधा, सतावर, नींबूघास, स्टीविया आदि की खेती कर रहे हैं। इसके अलावा 35 एकड़ में काला धान (ब्लैक राइस), पांच एकड़ में सामान्य धान, पांच एकड़ में गन्ने की खेती कर रहे हैं। दो साल से करीब 30 क्विंटल औषधीय उत्पाद दिल्ली, गुजरात और बंगाल की कंपनियों को बेच रहे हैं। अपनी कंपनी, औषधीय खेती शोध संस्थान में वह गांव के 30 युवकों व महिलाओं को रोजगार भी दे रहे हैं।

इस साल 100 एकड़ तक लक्ष्य

किशोर राजपूत बताते हैं कि कोरोना काल में औषधीय खेती की मांग बढ़ गई है। साल 2021-22 में एक करोड़ रुपये के टर्न ओवर का लक्ष्य रखा है। इस बार कंपनियों ने खस, पामारोज, जीरेनियम, विष्णुकांता, वच, पिपली की खेती करने के लिए आग्रह किया है। ऐसे में खेता का रकबा बढ़ाकर 100 एकड़ करने की तैयारी कर रहे हैं।

सुबह पांच बजे से शुरू हो जाता है काम

किशोर ने किसानी के साथ अपनी दिनचर्या बदल ली है। सुबह पांच बजे से उठकर नित्यकर्म करने के बाद आठ बजे तक खेत पहुंच जाते हैं। उनके साथ अन्य सहयोगी भी समय से खेत पहुंचते हैं। 70 एकड़ के रकबे में प्रतिदिन निगरानी संभव नहीं है, इसलिए कार्यक्रम तय करके कुछ जगह मोटरसाइकिल से तो कुछ जगह पैदल जाते हैं और शाम पांच बजे घर लौटते हैं।

100 किसान परिवार भी जुड़े

किशोर राजपूत से करीब 100 किसान परिवार जुड़ चुके हैं। किसान अपनी उपज को बेचने और तकनीकी मदद के लिए उनके पास पहुंचते हैं। औषधीय खेती करने वाले किसानों से किशोर का बेहतर संपर्क कायम हो चुका है। खासकर तुलसी का उत्पादन करने वाले किसान इनसे सीधे जुड़े हैं। राज्य में ही कुछ कंपनियां तुलसी का अर्क बनाती हैं। इसके लिए सीधे किशोर से संपर्क करती हैं।

महिला किसान ने शुरू की औषधिय खेती

राजनांदगांव की पदुमतरा निवासी आयुर्वेदिक महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता इंदू महोबिया ने नौकरी से इस्तीफा देकर औषधिय खेती शुरू की है। इंदू ने बताया कि किशेार से मुलाकात हुई थी। उनसे नींबूघास के बारे में जानकारी ली। प्रेरित होकर उन्हीं से नींबूघास का बीज भी लिया और एक एकड़ में खेती शुरू की है।

उन्नति देखकर शुरू की तुलसी की खेती

गांव नेउर नवागढ़ के किसान देवी प्रसाद वर्मा ने बताया कि किशोर की मेहनत और उन्नति देखकर उन्हाेंने भी आधा एकड़ के खेत में तुलसी की खेती शुरू की है। इसमें आमदनी 20 फीसद तक बढ़ी है। अभी इसके रकबे को और बढ़ाना है।

खेतीबाड़ी में काम आई यारी

किशोर के मित्र राकेश साहू बताते हैं कि किशोर के भीतर कुछ करने का जुनून था। जमीन दो एकड़ ही थी, इसलिए मैंने उन्हें लीज पर जमीन दिलवाने में मदद की। खेती के लिए उपकरण भी दिए। उन्नति की फसल लहलहाने से दिल को सुकून मिल रहा है।

परिवर्तन देखने को मिलेगा

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डा. एसके पाटिल गर्व के साथ कहते हैं कि ऐसे मेहनती युवा प्रशिक्षण प्राप्त कर समाज में बदलाव के अग्रदूत बन रहे हैं। आने वाले समय में खेती के क्षेत्र में आमूलचूक परिवर्तन देखने को मिलेगा।

औषधीय खेती में मुनाफा भी ज्यादा

परंपरागत खेती में मौसम की मार झेलनी पड़ती थी। कभी पानी की कमी तो कभी बाढ़ से नुकसान हो जाता था। पशु भी नुकसान पहुंचाते थे। औषधीय खेती में मुनाफा भी ज्यादा है और परेशानियां कम हैैं,

- किशोर राजपूत, प्रगतिशील किसान