ड्रोन हमलों से निपटने के लिए अपनानी होगी इजरायल की रणनीति, एयर डिफेंस को करना होगा मजबूत

 


ड्रोन सुरक्षा के लिहाज बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहे हैं।

पाक की ओर से ड्रोन हमलों ने भारतीय सेना व सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। आतंकी इन ड्रोन का इस्तेमाल हथियार के तौर पर कर रहे हैं। ड्रोन के साथ दिक्कत यह है कि इसे रडार से नहीं पकड़ा जा सकता है।

नई दिल्ली। ड्रोन सभी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती हैं। अगर ड्रोन सीमावर्ती क्षेत्र की रेकी कर रहा है, तो बीएसएफ के लिए चुनौती है। हमारे समुद्री क्षेत्र में घुसा है, तो नौसेना के लिए चुनौती है। आसमान पर उड़े तो एयरफोर्स के लिए चुनौती है। इतना ही नहीं शहर के अंदर ड्रोन हमला हो तो पुलिस के लिए चुनौती है। अहम बात यह भी है कि ड्रोन बनाने में कोई बड़ा विज्ञान काम नहीं करता है। तकनीकी तौर पर मजूबत व्यक्ति 25 से 30 हजार रुपये खर्चकर छोटा ड्रोन बना सकता हैं। ऐसे में जरूरी है कि ड्रोन से निपटने के लिए सभी सुरक्षा एजेंसियां मिलकर प्रयास करें। सेना को सैनिकों की तकनीकी दक्षता बढ़ाने पर जोर देना होगा और वायुसेना को अपने रडार अधिक सक्षम बनाने होंगे। बीएसएफ को बॉर्डर पर अपनी निगरानी तेज करनी होगी। सैनिकों के पास बेहतर हथियार और नाइट विजन इक्विपमेंट भी होने चाहिए। इस तरह के हमलों को नाकाम करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को मिलकर सíवलांस, इंटेलीजेंस, इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस को मजबूत करने की जरूरत है।

हमें समझना होगा कि आतंकियों ने काफी पहले से ड्रोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। इससे पहले भी कई देशों की सीमाओं पर ड्रोन से इस तरह के हमले होते रहे हैं। पंजाब की सीमा पर नशा तस्कर काफी पहले से ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। सेना ने कई बार इन हमलों को नाकाम भी किया है। बावजूद इसके अभी हमारे पास ड्रोन हमलों से निपटने के लिए सक्षम तकनीकी नहीं है। इस तरह के हमलों से निपटने में इजरायल एक्सपर्ट है। उसे उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। हमें उसी की तरह ड्रोन हमलों से निपटने के लिए काम करना होगा। इतना ही नहीं, ऐसे हमले की कोशिश करने वालों पर भी इजरायल की तर्ज पर ही कार्रवाई की जरूरत है, ताकि दोषी संगठन या व्यक्ति दोबारा ऐसी हिमाकत न कर सकें। हमें ड्रोन हमलों से बचने के लिए अपनी रेडिया फ्रिक्वेंसी मजूबत करनी होगी, ताकि जहां से ड्रोन गाइड हो रहा हो, वहीं उसे रोका जा सके। ऑडियो फ्रिक्वेंसी मॉनिटरिंग के लिए रडार सिस्टम मजबूत करना होगा। हाइटेक नाइट विजन डिवाइस भी इस दिशा में अहम हैं।

ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए बचाव की दिशा में कुछ और कदम भी जरूरी है। हमें सीमावर्ती इलाकों में रेडियो फ्रिक्वेंसी जाम करने की नीति पर सोचना होगा। इसके अलावा सीमा पर तैनात सैनिकों के पास एंटी-एयरक्राफ्ट गन होनी चाहिए। इनसे निपटने के मामले में इजरायल का स्मैश सिस्टम भी बेहद कारगर है। इसे भी अपनाए जाने की जरूरत है। डीआरडीओ भी इस दिशा में काफी पहले से काम कर रहा है। नई चुनौतियां आने के बाद उस दिशा में पहले से चल रहे काम में भी तेजी लानी होगी। रक्षा विशेषज्ञों को किफायती तकनीक पर भी जोर देना चाहिए। जो भी तकनीक विकसित की जाए, उसकी कीमत कम रखने की कोशिश हो। इससे इनके प्रसार में मदद मिलेगी।

पूर्व जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ पश्चिमी कमान ले. जनरल केजे सिंह का कहना है कि सीमा पर ड्रोन से हमले की कोशिशों के बाद इनसे निपटने की रणनीति पर चिंता बढ़ गई है। ड्रोन का यह खतरा सभी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ है। इस नए खतरे से निपटने की विशेषज्ञता को देखते हुए इजरायल की नीति पर चलने की जरूरत है। साथ ही तकनीक के स्तर पर यथासंभव विकास करना होगा।