चूल्हा या तंदूर जलाने के अलावा इन चीजों से भी होता है हवा में प्रदूषण,


हवा में प्रदूषण चूल्हा या तंदूर जलाने से ही नहीं होता बल्कि एलपीजी गैस से भी होता है।

जानकर हैरानी भले ही हो लेकिन हवा में प्रदूषण चूल्हा या तंदूर जलाने से ही नहीं होता बल्कि एलपीजी गैस से भी होता है। वजह खाना बनाने के तौर तरीके। जब भी दाल-सब्जी में तड़का लगाया जाता है या फिर कुछ तला जाता है।

नई दिल्ली। जानकर हैरानी भले ही हो, लेकिन हवा में प्रदूषण चूल्हा या तंदूर जलाने से ही नहीं होता बल्कि एलपीजी गैस से भी होता है। वजह, खाना बनाने के तौर तरीके। जब भी दाल-सब्जी में तड़का लगाया जाता है या फिर कुछ तला जाता है तो कढ़ाई या फ्राईपैन में धुंआ भी उठता है और कई बार आग की लपटें भी उठ जाती हैं। यह भी प्रदूषण ही है जिससे बचने के लिए लोग चिमनी या एग्जास्ट फैन लगाते हैं। यह जानकारी आइआइटी कानपुर के नए अध्ययन में सामने आई है।

यह राजधानी में पहला वास्तविक समय प्रदूषण स्त्रोत विभाजन अध्ययन है। 'ग्रीष्मकाल के दौरान दिल्ली में कार्बनिक और तत्वों सहित सूक्ष्म कणों के वास्तविक समय की मात्रा का ठहराव और स्त्रोत विभाजन' शीर्षक वाले इस अध्ययन में राजधानी में प्रदूषण के कुछ प्रमुख स्त्रोत के रूप में दहन, वाहनों का उत्सर्जन, कचरा जलाना और खाना बनाना भी शामिल है। इस अध्ययन के तहत पीएम 2.5 को एक इकाई मानने के बजाय शोधकर्ताओं ने इसे कई उप-श्रेणियों में बांट दिया, जिसमें कार्बनिक एरोसोल, ब्लैक कार्बन, सल्फेट्स, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरीन और नाइट्रेट शामिल हैं। इससे कुल प्रदूषण मिश्रण में हर स्त्रोत के अनुपात को सटीक रूप से निर्धारित करने में मदद मिली।

अध्ययन बताता है कि शहर के कार्बनिक एरोसोल में कार्बनिक पदार्थो के दहन से निकलने वाले प्रदूषक की हिस्सेदारी 64 फीसद तक रही। जून और जुलाई के दौरान 27 फीसद प्रदूषक तत्व बिजली संयंत्र उत्सर्जन और औद्योगिक अपशिष्ट जलने से निकलने वाले धुएं में निलंबित धातु के कण थे। अध्ययन से पता चला है कि गर्मियों के दौरान दिल्ली की हवा में कार्बनिक एरोसोल बढ़ाने में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन का 12.3 फीसद, ठोस ईंधन में खाना पकाने (घर में और खुले में दोनों जगह) का 16.2 फीसद, तत्व या धातु ज्यादातर धूल का 52.5 फीसद, बिजली संयंत्रों से उत्सर्जन का 16.2 फीसद, कचरा जलाने और इस्पात उद्योगों के उत्सर्जन का 10.7 फीसद, ठोस ईंधन दहन का 10.5 फीसद, औद्योगिक अपशिष्ट का 1.5 फीसद और धातु प्रसंस्करण उद्योगों के उत्सर्जन का 1.4 फीसद योगदान रहा।

अध्ययन ने उन विभिन्न क्षेत्रों को भी चिह्नित किया है जहां से प्रदूषक राजधानी में आते हैं, ताकि स्थानीय स्त्रोतों और शहर के बाहर स्थित स्त्रोतों से प्रदूषण की हिस्सेदारी को समझा जा सके। उदाहरण के लिए, अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि पंजाब, हरियाणा और पाकिस्तान में स्थित छोटी और मध्यम धातु प्रसंस्करण इकाइयां दिल्ली के पीएम 2.5 स्तर में क्लोरीन की मात्रा बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इसी तरह पीएम 2.5 में क्रिस्टल तत्वों (जैसे एल्युमीनियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम और आयरन) का उच्च योगदान गर्मियों के दौरान राजस्थान के रेगिस्तान से क्षेत्र में धूल भरी आंधी की उच्च तीव्रता के कारण देखा गया था।दिल्ली के प्रदूषण ग्राफ की पूरी तस्वीर प्राप्त करने के लिए इस अध्ययन को पहले के स्त्रोत विभाजन अध्ययन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इससे सरकारी एजेंसियों- नीति निर्माताओं को यह समझने में भी मदद मिलेगी कि शमन के किन कदमों से मदद मिली है और अब क्या करने की जरूरत है। - प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी, विभाग प्रमुख (सिविल इंजीनियरिंग), आइआइटी-कानपुर