राजनीति की बलि चढ़ता रहा समान नागरिक कानून, सांप्रदायिकता का हथियार बनाकर किया गया पेश


सात दशकों से राजनीति की बलि चढ़ता रहा समान नागरिक कानून

सात दशकों में सर्वोच्च न्यायालय सहित लगभग आधे दर्जन से अधिक उच्च न्यायालयों ने इस कानून को लागू करने के पक्ष में तर्कपूर्ण निर्णय दिया है। परन्तु ये सभी दरकिनार कर दिए गए। इनमें 1985 का सर्वोच्च न्यायालय का शाहबानो मामले में दिया गया ऐतिहासिक फैसला भी है।

 भारत एक उदार, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश है, लेकिन समान नागरिक कानून के बिना ये तीनों अपूर्ण और बाधित हैं। संविधान निर्माताओं को अपेक्षा थी कि भारतीय राज्य इसे मूर्त रूप देंगे, किंतु हुआ उसका एकदम उलटा। पिछले सात दशकों से समान नागरिक कानून सत्तावादी स्वार्थ की राजनीति की न सिर्फ बलि चढ़ता रहा, अपितु राजनीति ने एक सहज, सरल विषय को जटिल बना दिया है। जिस कानून से पंथनिरपेक्षता को प्रबलता मिलेगी, उसे सांप्रदायिकता का हथियार बनाकर राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी पेश करते रहे हैं। तीन तलाक, जनसंख्या कानून और समान नागरिक कानून इसकी बानगी हैं।

सात दशकों में सर्वोच्च न्यायालय सहित लगभग आधे दर्जन से अधिक उच्च न्यायालयों ने इस कानून को लागू करने के पक्ष में तर्कपूर्ण निर्णय दिया है। परन्तु ये सभी दरकिनार कर दिए गए। इनमें 1985 का सर्वोच्च न्यायालय का शाहबानो मामले में दिया गया ऐतिहासिक फैसला भी है। भारत की संविधान सभा में 23 नवंबर, 1948 को इस प्रश्न पर सारगर्भित बहस हुई थी। इसमें मुस्लिम सदस्यों नजीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग साहब बहादुर, पोकर साहब बहादुर व हुसैन इमाम ने कई आशंकाएं उठाईं और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यंगर, कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी और भीमराव आंबेडकर ने इनके स्पष्टता से जवाब भी दिए थे। नजीरुद्दीन अहमद ने संविधान सभा से कहा, ‘जिसे ब्रिटिश 175 साल तक करने में विफल रहे या करने से डरते रहे और जिसे मुस्लिम पिछले 500 वर्षो में करने से कतराते रहे, उसे अचानक करने के लिए हमें राज्य को शक्ति नहीं देनी चाहिए।’ इसके उत्तर में मुंशी ने कहा, ‘उस मानसिकता को जिसे ब्रिटेन और ब्रिटेन की सरकार ने पोषित किया कि वैयक्तिक कानून धर्म पर आधारित है, उसे हमें अवश्य समाप्त करना चाहिए।’ इमाम हुसैन ने एक सवाल उठाया, जो आज भी उठता है। इतने बड़े देश के लिए एक कानून संभव नहीं है। इसका उत्तर आंबेडकर ने दिया कि नागरिकता कानून तो देश का, समाज का एक छोटा कोना मात्र है। उन्होंने कहा कि ऐसे गौरवाजिब तर्क से उन्हें आश्चर्य हुआ। विवाह और उत्तराधिकार को छोड़कर देश के सभी मामलों में समान कानून तो बना ही हुआ है। इसी में क्रिमिनल लॉ भी है। अय्यंगर ने सरल तरीके से संविधान सभा को आगाह किया कि हमेशा भूतकाल से दबे रहने से कोई उपयोगिता नहीं है।

आज की विरोधमूलक बहस तथ्य और तर्क दोनों से परे है। आजादी से पूर्व के अनेक उदाहरण हैं, जब अलग-अलग स्थानों में मुस्लिम समाज पर्सनल लॉ को न मानकर स्थानीय कानूनों और मान्यता से चलता था। औपनिवेशिक सरकार ने 1937 में शरई कानून बनाकर जबर्दस्ती स्थिति को बदलने का सांप्रदायिक काम किया था। उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत (एनडब्लूएफपी) में मुसलमान सिविल मामलों में वही कानून अथवा मान्यता मानते थे जिसे हंिदूू मानते थे। गुजरात में खोजा मोमीन मुसलमानों में भी वही था। केरल के मालाबार में मरुमक्कथायम कानून से हिंदू-मुस्लिम संचालित थे। आजादी के बाद नेहरू के पास अवसर था और उनसे अपेक्षा थी कि शरई कानून को हटाकर समान नागरिक कानून बनाएं, पर उन्होंने नहीं किया। तभी तो आचार्य जेबी कृपलानी ने हंिदूू कोड बिल पर बहस में हिस्सा लेते हुए संसद में कहा था, ‘एक समुदाय के लिए कानून बनाना और दूसरे को छोड़ देना राज्य की सांप्रदायिक सोच और दृष्टि का प्रतीक है।’

इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर का मत प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने संघ के अखबार ‘मदरलैंड’ को 23 अगस्त, 1972 को दिए साक्षात्कार में मुस्लिम समाज में समान नागरिकता कानून के लिए विमर्श और मानसिक तैयारी के लिए प्रयास की बात कही थी। परंतु 1972 से 2021 तक न उनके बीच बहस हुई, न ही मानसिक तैयारी का प्रयास। ऐसा नहीं है कि विवेकवादी और उदार चिंतकों की उनके बीच कमी रही है। एएए फैजी, मोइन शकीर, हुमायूं कबीर, जस्टिस एमएच बेग, तजामुल हुसैन, आरिफ मुहम्मद खान जैसे प्रगतिशील चिंतक रहे हैं। परंतु कोई राजा राम मोहन राय या ईश्वरचंद विद्यासागर नहीं बन पाया।

समान नागरिक कानून का तात्पर्य विवाह और उत्तराधिकार के प्रश्न पर वैज्ञानिकता व विवेक को आधार बनाना है। हर समाज अपने संदर्भो, उत्थान, पतन एवं विरोधाभासों के आधार पर कुछ मान्यताएं विकसित करता है, यही पर्सनल लॉ है। परंतु देश काल और संदर्भ बदलने से उसमें बदलाव समाज के विकास को सुनिश्चित करता है। समान नागरिक कानून के विपक्ष में बोलने वाले चाहे धार्मिक नेता हों या राजनीतिज्ञ, वे प्रतिक्रियावादी माने जाएंगे।किसी समाज में स्थानीयता और सामुदायिकता का भाव अहम होता है। समान नागरिक कानून दोनों भावों को पर्सनल लॉ के स्थान पर अधिक महत्व देता है और यह दोनों पक्ष संविधान कीप्रस्तावना में प्रतिबिंबित होते हैं। जब कोई समुदाय परिवर्तन को, प्रगतिशीलता को, वैज्ञानिक सोच को लंबे समय तक नकारता है, तो वह पिछड़ता है। राज्य का नैतिक और संवैधानिक दोनों दायित्व बनता है कि प्रत्यक्ष और निर्भयता के साथ हस्तक्षेप कर कानून बनाए। लोकतांत्रिक विमर्श हमेशा ही राह को आसान बनाता है और कानून की जन पक्षधरता व वैधानिकता को स्थापित करता है।

राकेश सिन्हा,सदस्य, राज्यसभा, राष्ट्रवादी विचारक

किसी समाज में स्थानीयता और सामुदायिकता का भाव अहम होता है। वही उसे स्थिरता और सद्भाव देता है। समान नागरिक कानून स्थानीयता व सामुदायिकता को पर्सनल लॉ के स्थान पर अधिक महत्व देता है और यह दोनों पक्ष संविधान की प्रस्तावना में प्रतिबिंबित होते हैं।