किसान ने इल्लियों को चकमा देने के लिए किया अनूठा प्रयोग, फसल से हुआ दोगुना फायदा


किसान फसल को खरपतवार और इल्लियों (कैटरपिलर) से बचाने के लिए कई तरह के जतन करते हैं।

आमतौर पर किसान फसल को खरपतवार और इल्लियों (कैटरपिलर) से बचाने के लिए कई तरह के जतन करते हैं। सामान्य खेती में तो कीटनाशक इनसे छुटकारा दिला सकते हैं लेकिन जैविक खेती में इसका उपयोग नहीं होता।

 इंदौर। आमतौर पर किसान फसल को खरपतवार और इल्लियों (कैटरपिलर) से बचाने के लिए कई तरह के जतन करते हैं। सामान्य खेती में तो कीटनाशक इनसे छुटकारा दिला सकते हैं लेकिन जैविक खेती में इसका उपयोग नहीं होता। जैविक खेती में कम उत्पादन और किसानों के कम रुझान का भी यह एक कारण होता है। इंदौर के पास सिमरोल गांव के किसान लेखराज पाटीदार ने इल्लियों को चकमा देने के लिए अनूठा प्रयोग किया। हल्दी की फसल को इल्लियों से बचाने के लिए ट्रैप क्राप का इस्तेमाल किया। इसमें ढेंचा (एक तरह का खरपतरवार) को पहले खेत में फसल की तरह लगाया और फिर उसके बीच हल्दी बोई। ढेंचा की पत्तियां काफी मुलायम होती हैं। इल्लियां इन्हें पसंद करती हैं और पास ही उगी कड़े पत्तों वाली हल्दी को छोड़ देती हैं। इस प्रयोग से लेखराज को एक एकड़ हल्दी की खेती में 1.69 लाख रुपये का मुनाफा हुआ। जुलाई में बोई जाने वाली हल्दी मार्च में तैयार होती है।

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किसान लेखराज ने फसल बचाने के लिए किया अनूठा उपाय, हल्दी के साथ ढेंचा लगाया

लेखराज ने बताया कि उन्होंने पहले आत्मा (एग्रीकल्चर टेक्नोलाजी मैनेजमेंट एजेंसी) से तकनीकी जानकारी हासिल की। रासायनिक खाद के लगातार उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम होती जाती है। साथ ही, इस तरह से उगाई फसल भी सेहत के लिए नुकसानदायक होती है। जब ट्रैप क्राप तकनीक का पता चला तो इसका उपयोग किया। फसल को खाद भी जैविक ही दी गई। इसके लिए पांच पत्तियों का काढ़ा, जीवामृत, छाछ से बनी दवाई और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया।

अन्य फसलों के लिए भी उपयोगी

कृषि महाविद्यालय के विज्ञानी मुकेश सक्सेना ने बताया कि ढेंचा को ट्रैप क्राप इसीलिए कहा जाता है क्योंकि यह इल्लियों व अन्य नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी ओर आकर्षित करता है। वैज्ञानिक भी इसे जैविक खेती करने के लिए उपयोगी मानते हैं। सिर्फ हल्दी नहीं, परंपरागत फसलों में भी इस तरीके का इस्तेमाल हो सकता है। मसालों और सब्जी की फसल के लिए तो यह पद्धति वरदान से कम नहीं है। हल्दी की जैविक खेती में अच्छी पैदावार के बाद अब क्षेत्र के 50 अन्य किसानों ने भी इस पद्धति से खेती करने में रुचि दिखाई है।

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खेत में ही करने लगे हरित खाद का उत्पादन

ढेंचा को मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने वाली हरित खाद के रूप में जाना जाता है। मिट्टी में मिलने के बाद यह केंचुओं के लिए भी बहुत लाभदायक होती है। कीटनाशकों का उपयोग करने से इल्लियों के साथ फसल के लिए फायदेमंद कीट (मित्र कीट) भी नष्ट हो जाते हैं। इल्लियां फसल खराब करती हैं तो मित्र कीट इल्लियों को खाकर उनकी संख्या को नियंत्रित करते हैं। मुकेश सक्सेना बताते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र की श्रंखला बनाने में सभी कीटों व पक्षियों का योगदान होता है। ट्रैप क्राप यानी ढेंचा इल्लियों को भोजन उपलब्ध कराता है। उनकी संख्या बढ़ी तो हो सकता है कि वे ढेंचा को खत्म करने के बाद मुख्य फसल पर हमला कर दें। ऐसे में मित्र कीट उन्हें खाकर नियंत्रित करते हैं। जैविक खेती का एक फायदा यह भी है।

लागत कम, मुनाफा अधिक

लेखराज को एक एकड़ में हल्दी की खेती जैविक पद्धति से करने पर लागत कम लगी और फायदा भी अधिक हुआ। रासायनिक खेती में अनुमानित लागत अधिक आती है और फसल की बिक्री जैविक के मुकाबले आधी कीमत पर होती है इसलिए मुनाफा कम होता है। सामान्य खेती में रासायनिक खाद और पौध संरक्षण (कीटनाशक) पर करीब 12 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च होते हैं।

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लेखराज ने जिस तरह ट्रैप क्राप से हल्दी की खेती की है, वह अनूठा प्रयोग है। हल्दी के साथ ढेंचा का प्रयोग किसान ने पहली बार किया है, जो बहुत ही कारगर साबित हुआ। इससे खेती भी अच्छी हुई और उन्हें लाभ भी अधिक हुआ है।