द लाइट आफ एशिया द पोयम दैट डिफाइंड द बुद्धा, गौतम बुद्ध के प्रभाव को दर्शाती कृति


Book Review: द लाइट आफ एशिया द पोयम दैट डिफाइंड द बुद्धा

द लाइट आफ एशिया द पोयम दैट डिफाइंड द बुद्धा।यह पुस्तक एडविन अर्नाल्ड और उनकी किताब की चर्चा के बहाने भारत में गौतम बुद्ध के प्रभाव को रेखांकित करती है। आइए जानें किताब से जुड़ी खास बातें।

 कोई पुस्तक आज से एक सौ बयालीस साल पहले प्रकाशित हो और उसके बारे में लगातार चर्चा होती रहे, यह कम ही सुनने को मिलता है। भारतीय साहित्य परंपरा में तो कई ऐसी पुस्तकें हैं, जो शताब्दियों पहले लिखी गईं और आज भी उसके प्रभावों की चर्चा होती है। लेकिन एक विदेशी लेखक की किसी भारतीय पर लिखी गई पुस्तक इतने दिनों तक चर्चा में रहे, इसके उदाहरण बहुत कम हैं। सर एडविन आर्नाल्ड ने गौतम बुद्ध के जीवन और संदेशों को केंद्र में रखकर एक पुस्तक लिखी थी 'द लाइट आफ एशिया' जो 1879 में लंदन से प्रकाशित हुई थी। छपते ही इस पुस्तक ने ब्रिटेन में धूम मचा दी थी। यूरोप और अमेरिका में भी यह बेहद चर्चित हुई थी। बाद के वर्षों में इस पुस्तक का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और इस पर आधारित फिल्में भी बनीं। अब पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने एडविन आर्नाल्ड की पुस्तक के भारतीय समाज पर प्रभाव पर एक बेहद दिलचस्प पुस्तक लिखी है, 'द लाइट ऑफ एशिया, द पोयम दैट डिफाइंड द बुद्धा'।

इस पुस्तक की प्रस्तावना दलाई लामा ने लिखी है। जयराम रमेश ने अपनी इस पुस्तक में लिखा है कि एडविन आर्नाल्ड की पुस्तक ने विश्व के कम से कम 11 साहित्यिक व्यक्तित्वों को प्रभावित किया, जिनमें से पांच को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। इनमें रूडयार्ड किपलिंग, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, टीएस इलियट, डब्ल्यूबी येट्स जैसे लेखकों के अलावा लियो टालस्टाय और डीएच लारेंस जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखक शामिल हैं।

जयराम रमेश ने अपनी इस पुस्तक में बेहद श्रमपूर्वक एडविन आर्नाल्ड से जुड़े तथ्यों को लिखा है। खासतौर पर भारत से उनके जुड़ाव को लेकर भी वह पुस्तक में उल्लेख करते हैं। वे यह बताते हैं कि एडविन आर्नाल्ड 1886 में बोधगया आए थे और बाद के दिनों में पुणे के प्रसिद्ध डेक्कन कालेज के प्राचार्य रहे। एडविन आर्नाल्ड के भारत प्रवास की घटनाओं को बताने के क्रम में लेखक अपनी राजनीतिक विचारधारा के हिसाब से टिप्पणियां करते चलते हैं। वे विवेकानंद और एडविन आर्नाल्ड के बीच हुई मुलाकात का जिक्र तो करते हैं, लेकिन सावधानी के साथ। वे लिखते हैं कि '1896 में विवेकानंद लंदन में थे, जहां उनका स्वागत हुआ था। मैक्समूलर के साथ उनकी मुलाकात का अभिलेख तो मिलता है, लेकिन दुर्भाग्यवश एडविन आर्नाल्ड के साथ उनकी मुलाकात का कहीं उल्लेख नहीं मिलता।

इस किताब में एक पूरा अध्याय है, 'द लाइट ऑफ एशिया इन हिंदी, फिल्म एंड मोर'। इस अध्याय में जयराम रमेश हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक रामचंद्र शुक्ल का उल्लेख करते हैं। 1922 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'द लाइट आफ एशिया' का हिंदी अनुवाद किया था, जिसका नाम था 'बुद्धचरित 'और इसको बनारस की नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया था। 'बुद्धचरित' के अनुवाद की भूमिका भी शुक्ल जी ने लिखी थी, जिसमें उन्होंने ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली को लेकर विस्तृत टिप्पणी भी की थी। 'बुद्धचरित का 1985 में नागरी प्रचारिणी सभा ने पुनर्प्रकाशन किया था। जयराम रमेश ने उस दौर के लेखकों के हवाले से यह प्रमाणित किया है कि 'द लाइट ऑफ एशिया' के हिंदी अनुवाद ने हिंदी के उन कवियों को प्रभावित किया, जो बुद्ध पर लिखना चाहते थे।

इसके अलावा जयराम ने एडविन आर्नाल्ड की कृति के फिल्मों के प्रभाव को भी रेखांकित किया है। उनके मुताबिक, दादा साहब फाल्के ने 1923 में एक मूक फिल्म 'बुद्धदेव' बनाई थी। उसके बाद भारत और जर्मनी के सहयोग से अंग्रजी, जर्मन और हिंदी में एक फिल्म बनी। हिंदी में 'प्रेम संन्यास' के नाम से फिल्म बनी। यह फिल्म हिमांशु राय के दिमाग की उपज थी और इसे लिखा था निरंजन पाल ने। निरंजन पाल बिपिन चंद्र पाल के पुत्र थे। इस फिल्म के निर्माण के बारे में, उसके क्राफ्ट के बारे में भी जयराम रमेश ने विस्तार से लिखा है। कुल मिलाकर, जयराम रमेश ने भारतीय संदर्भों को नए सिरे से उठाकर इस तरह से पिरोया है कि उनकी पुस्तक दिलचस्प और पठनीय बन गई है।