राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मघाती होगी आतंकवाद पर राजनीति, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी भारत को कर रही आतंकवादी खतरों से सर्तक


अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और संस्थाएं बार-बार भारत में आतंकवादी खतरों की जानकारी दे रही हैं

अगर कुछ नेता वोट बैंक या भाजपा से विरोध के कारण गैर-जिम्मेदार तरीके से संदिग्ध लोगों की गिरफ्तारियों का विरोध करेंगे तो इससे आतंकवादियों का ही हौसला बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और संस्थाएं बार-बार भारत में आतंकवादी खतरों की जानकारी दे रही हैं।

 आतंकवाद के आरोप में हुई गिरफ्तारियों पर तब तक अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया जा सकता, जब तक कि छानबीन के साथ पूरा सच सामने नहीं आ जाता। यह बात अगर उन पर लागू होती है, जो गिरफ्तार हुए सभी को तुरंत आतंकवादी मान लेते हैं, तो उन पर ही भी, जो सीधे पुलिस, उसके आतंकवाद निरोधक दस्ते यानी एटीएस, राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए की कार्रवाई को ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। आज भारत और विश्व में एक-एक व्यक्ति को पता है कि आतंकवाद संपूर्ण मानवता के लिए कितना भयानक खतरा है। हम सबने कई बार भारत में आतंकवादियों द्वारा खून और विध्वंस के भयानक दृश्य का अनुभव किया है। स्वयं उत्तर प्रदेश कई भीषण आतंकवादी हमले झेल चुका है।

गत दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दो संदिग्ध आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह दूसरी गिरफ्तारियां हो रही हैं और आतंकवाद को लेकर जो जानकारियां आ रही हैं उनसे प्रदेश ही नहीं, देश भी चिंतित है। किंतु कई हलकों से जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं वे ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली हैं। अखिलेश यादव प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं। अपने कार्यकाल में उनके सामने भी आतंकवाद की साजिशों, उसके विस्तार की रिपोर्ट और सुबूत आए होंगे। बावजूद वे कह रहे हैं कि मुझे उत्तर प्रदेश पुलिस पर विश्वास नहीं और सरकार पर तो बिल्कुल विश्वास नहीं है तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। जिन दो आतंकवादियों को एटीएस ने गिरफ्तार किया वे अलकायदा की भारतीय उपमहाद्वीप शाखा यानी एक्यूआइएस समर्थित अंसार गजवातुल हिंद से जुड़े हैं। ये दोनों संदिग्ध मिनहाज अहमद और मसीरुद्दीन ने पूछताछ में अभी तक जो बताया उन सबको हम एटीएस पर अविश्वास कर खारिज कर दें तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मघाती होगा।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और संस्थाएं बार-बार भारत में आतंकवादी खतरों की जानकारी दे रही हैं। एक्यूआइएस के बारे में उत्तर प्रदेश एटीएस ने पहली बार जानकारी नहीं दी है। भारत के पास यह जानकारी पिछले सात वर्षों से उपलब्ध है। जब अलकायदा के प्रमुख अयमान अल जवाहिरी ने एक्यूआइएस की घोषणा करते हुए इसके पहले कमांडो की बात की उसके कुछ ही समय बाद स्पष्ट हो गया कि वह व्यक्ति उत्तर प्रदेश का है। बाद में वह अफगानिस्तान में मारा गया। इस समय एक्यूआइएस का प्रमुख उमर हलमंदी है यह भी जाना तथ्य है। तो एक्यूआइएस से सीधे जुड़े या उसके समर्थन में काम करने वाले आतंकवादी संगठन किसी न किसी तरह उससे जुड़े होंगे। इसलिए एटीएस अगर कह रही है कि यह हलमंदी के निर्देशानुसार काम कर रहे थे, तो उसे आतंकवाद के जानकार और विशेषज्ञ खारिज नहीं कर सकते।

मार्च 2017 में लखनऊ में ही छिपे आतंकवादी सैफुल्लाह मुठभेड़ में मारा गया था, जो आइएसआइएस के खुरासान माडल का सदस्य था। वह भी कानपुर का ही रहने वाला था। उसके बाद कई गिरफ्तारियां हुईं। अयोध्या से लेकर वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ, रामपुर ऐसे अनेक स्थल पिछले डेढ़ दशकों में आतंकवादी हमलों का शिकार हो चुके हैं। छानबीन में प्रदेश में व्यापक आतंकवादी संजाल का पता चला और उनमें सजाएं भी हुईं। कुछ मुकदमे चल रहे हैं, लेकिन हमारे देश के कुछ नेताओं, एक्टिविस्टों के लिए तो सब झूठ है। जब हमला होता है तो सुरक्षा व्यवस्था, पुलिस, खुफिया एजेंसियों को कोसते हैं, सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं, पर अगर सुरक्षा एजेंसियां हमले के पहले ही आतंकवाद की साजिशों का खुलासा कर साजिशकर्ताओं को गिरफ्तार करती हैं तो वे लोग उनके पक्ष में झंडा उठाकर खड़े हो जाते हैं।आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र की पिछले साल जारी रिपोर्ट में भारतीय उपमहाद्वीप में अलकायदा के 180 से 200 आतंकवादियों के होने की जानकारी थी। इसमें कहा गया था कि ये आतंकवादी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार से हैं। हम यह भी जानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में अलकायदा आइएस का सहयोगी है।

लखनऊ की गिरफ्तारी के अगले ही दिन कोलकाता में भी तीन आतंकवादियों की गिरफ्तारी हुई। बंगाल की पुलिस कह रही है कि बांग्लादेशी आतंकवादी संगठन जेएमबी के स्लीपर सेल यहां पहले से हैं। अन्य कई गिरफ्तारियां होंगी, क्योंकि तीनों आतंकवादियों से पूछताछ के दौरान पता चला कि जेएमबी के 10 संदिग्ध आतंकवादी ओडिशा, बिहार और जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में चले गए हैं। तो क्या बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी आप संदेह करेंगे, जो मुस्लिम वोट बैंक के लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार रहती हैं? वास्तव में आतंकवाद हमारे देश के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है और अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी तथा तालिबानों के वर्चस्व के बाद खतरा कहीं ज्यादा बढ़ गया है। ऐसे में यह आवश्यक है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाइयों को निशाना बनाने, किसी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की जगह संतुलित रूप से अपनी बात कही जाए। अगर कुछ नेता वोट बैंक या भाजपा से विरोध के कारण तथा एक्टिविस्ट अपने निहित स्वार्थों के साए में गैर जिम्मेदार तरीके से गिरफ्तारियों का विरोध करेंगे, तो आतंकवादियों का ही हौसला बढ़ेगा।