इंसुलिन के आविष्कार से लेकर अब तक मधुमेह के इलाज में काफी प्रगति हुई


हमें सतत अध्ययन और प्रयास करते रहने व इंसुलिन जैसे ही नए आविष्कारों की आवश्यकता है।

इंसुलिन के आविष्कार के सौ वर्षो के बाद भी मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है जिसे बढ़ाने में मोटापा खानपान की पाश्चात्य पद्धति आरामतलब जीवनशैली मशीनीकरण और कई अन्य कारण जिम्मेदार भी हैं।

 यद्यपि कोरोना जनित महामारी ने वर्तमान में हमारे जीवन में उथल-पुथल मचा रखा है, परंतु इससे अलग बीमारियों के संदर्भ हमारे देश को डायबिटीज (मधुमेह) की राजधानी के रूप में जाना जाता है। वैसे तो मधुमेह प्राचीनतम बीमारियों में से एक है और इसके बहुत तरह के उपचार अलग अलग चिकित्सा पद्धतियों में सुझाए गए हैं, परंतु आज हम सौ वर्ष पूर्व हुए एक ऐसे आविष्कार के बारे में चर्चा करेंगे जिसने आधुनिक समय में मधुमेह के उपचार को नया स्वरूप दिया।

हम इंसुलिन की बात कर रहे हैं जिसकी शतकीय वर्षगांठ इस वर्ष मनाई जा रही है। आज से सौ वर्ष पहले 1921 में इंसुलिन को कनाडा के टोरंटो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं फ्रेडरिक ग्रांट बेंटिंग और चाल्र्स हर्बर्ट बेस्ट ने जॉन मैक्लिओड के निर्देशन में इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया था। इस आविष्कार को सर्वप्रथम एक 14 वर्ष के मधुमेह रोगी लियोनार्ड थॉम्पसन पर 1922 में आजमाया गया। थॉम्पसन टाइप वन मधुमेह रोग से पीड़ित थे जो अक्सर बच्चों में होती है और इसमें रोगी के अग्नाशय में इंसुलिन का निर्माण नहीं होता। इंसुलिन न बनाने के कारण थॉम्पसन का ब्लड शुगर हमेश बढ़ा रहता था, परंतु बेंटिंग और बेस्ट द्वारा तैयार किए गए इंसुलिन के इंजेक्शन से उनका शुगर नियंत्रित हो गया। इस प्रकार दुनिया को मधुमेह के उपचार के लिए नई दवा मिली।

इंसुलिन के आविष्कार से पहले विज्ञानियों को यह पता था कि अग्नाशय किसी न किसी तरह मधुमेह के लिए जिम्मेदार है। वर्ष 1889 में ऑस्कर मिन्कोवस्की और जोसफ वॉन मेरिंग ने पता लगा लिया था कि अग्नाशय को नष्ट करने पर कुत्तों में मधुमेह हो जाता है। अपने प्रयोगों से उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि अग्नाशय में कोई ऐसा तत्व मौजूद है जिसे यदि निकाल कर ऐसे जानवर को दिया जाए जिसे मधुमेह है तो उसे मधुमेह के दुष्प्रभावों से बचाया जा सकता है। अब तक यह तो साफ हो चुका था कि अग्नाशय में स्थित कोई कोशिका समूह ही शरीर में बढ़े शुगर को नियंत्रित करती है, परंतु इसका प्रमाण उपलब्ध नहीं था। वर्ष 1893 में लगुस्से ने सुझाया कि लैंगरहैंस की कोशिकाएं कुछ ऐसी चीजें स्रावित करती हैं जो शरीर में शर्करा के उपापचय को नियंत्रित करता है।

अब मिन्कोवस्की और मेरिंग के कार्य को आगे बढ़ाया बेंटिंग ने। बेंटिंग टोरंटो विश्वविद्यालय से चिकित्सा विज्ञान की डिग्री प्राप्त कर एक सर्जन के पद पर कार्यरत थे। एक मेडिकल स्कूल में अपने एक व्याख्यान की तैयारी के संदर्भ में अक्टूबर 1920 में बेंटिंग के हाथ मोसेस बरों का एक लेख लगा। इस लेख में कहा गया था कि यदि अग्नाशय की एसिनर ग्रंथियों से पाचक रस लाने वाली नलिकाओं को बांध कर बंद कर दिया जाय तो कुछ दिनों में एसिनर कोशिकाएं मर जाती हैं और पाचक रस जैसे कि टिप्सिन आदि का स्राव बंद हो जाता है। बेंटिंग के मन में एक विचार कौंधा जो इंसुलिन के परिष्करण में बहुत सहायक सिद्ध हुआ। उनका विश्वास था कि अग्नाशय में बनने वाले एंजाइम या पाचक रस इंसुलिन को परिष्करण प्रक्रिया के दौरान नष्ट कर देते हैं। इस विचार से उन्होंने टोरंटो विश्वविद्यालय के जॉन मैक्लिओड को अवगत कराया जो काबरेहाइड्रेट उपापचय पर अनुसंधान करते थे। इस प्रकार जॉन मैक्लिओड के निर्देशन में बेंटिंग और बेस्ट ने 1921 में इस प्रयोग का कार्य शुरू किया।

उन्होंने कुत्तों में अग्नाशय की नलिकाओं को बांध दिया और सात सप्ताह के बाद पाया कि अग्नाशय का आकार घट कर एक तिहाई रह गया। उन्होंने उन अग्नाशयों से निकाले गए रस को उन कुत्तों को इंजेक्शन से दिया जिन्हें अग्नाशय निकाल लिए जाने से मधुमेह हो गया था। इससे मधुमेह पीड़ित प्रयोग में शामिल कुत्तों में शुगर का स्तर घट कर सामान्य हो गया। इतना ही नहीं, कुत्तों में मधुमेह के लक्षणों में बहुत सुधार हुआ, उनकी जिजीविषा लौट आई, उनके घाव शीघ्र भर गए और वे अन्य मधुमेह पीड़ित कुत्तों से ज्यादा दिनों तक जीवित रहे।

इस प्रकार अनगिनत विज्ञानियों के इतने वर्षो के सतत प्रयास को अंतत: सफलता मिली और डायबिटीज को मात देने के लिए किए गए इस आविष्कार ने मधुमेह से पीड़ितों को सामान्य जीवन जीने की आशा से भर दिया। इस आविष्कार के लिए बेंटिंग और मैक्लिओड को 1923 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

इंसुलिन के आविष्कार के बाद से अब तक इस दिशा में काफी प्रगति हो चुकी है। पिछली शताब्दी के आठवें दशक तक आते आते इंसुलिन को बायोटेक्नोलॉजी के माध्यम से रेकॉम्बीनैंट डीएनए तकनीक से बनाया जाने लगा जिसे ‘ह्यूमन इंसुलिन’ कहा गया। यह इंसुलिन वैसा ही होता है जैसा हमारा शरीर बनाता है और यह अत्यंत शुद्ध होता है। इस पद्धति से बहुत अधिक मात्र में इंसुलिन का निर्माण होने से करोड़ों रोगियों को इंसुलिन आसानी से प्राप्त हो पाता है। इंसुलिन के आविष्कार के सौ वर्षो के बाद भी मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है, जिसे बढ़ाने में मोटापा, खानपान की पाश्चात्य पद्धति, आरामतलब जीवनशैली, मशीनीकरण और कई अन्य कारण जिम्मेदार हैं। इंसुलिन मधुमेह को नियंत्रित तो कर सकता है, परंतु मधुमेह हो ही नहीं, इसके लिए हमें सतत अध्ययन और प्रयास करते रहने व इंसुलिन जैसे ही नए आविष्कारों की आवश्यकता है।