किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां कभी नहीं चाहेंगे आंदोलन में हुड्डा, चौटाला और टिकैत की भागीदारी

 


उगराहां यह कतई नहीं चाहेंगे कि कोई भी जाट नेता चाहे चौटाला हों यी हुड्डा आंदोलन के मंच पर आएं।

जोगिंदर सिंह उगराहां पता है कि ओमप्रकाश चौटाला कौन हैं और उनका जितना जनाधार है उसके सामने उगराहां क्या पंजाब के जितने भी कथित किसान संगठन आंदोलन कर रहे हैं सब मिलकर ओमप्रकाश चौटाला के जनाधार की देश भर के किसानों के बीच उनकी लोकप्रियता की बराबरी नहीं कर सकते।

 हिसार। तीनों कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन में दिल्ली सीमा पर जो धरने दिए जा रहे हैं, उनमें हरियाणा का जाट समुदाय बड़ी संख्या में भागीदारी कर रहा था, लेकिन पंजाब के एक किसान संगठन के नेता ने बुजुर्ग ओमप्रकाश चौटाला को आंदोलन में मंच देने के सवाल पर नाराज कर दिया है। उगराहां ने इस प्रश्न पर तिरस्कार भरे अंदाज में कौन चौटाला?

ऐसा नहीं कि उगराहां को पता नहीं है कि ओमप्रकाश चौटाल कौन है? उन्हें पता है कि ओमप्रकाश चौटाला कौन हैं और उनका जितना जनाधार है, उसके सामने उगराहां क्या पंजाब के जितने भी कथित किसान संगठन आंदोलन कर रहे हैं, सब मिलकर ओमप्रकाश चौटाला के जनाधार की, देश भर के किसानों के बीच उनकी लोकप्रियता की बराबरी नहीं कर सकते। रही बात आदोलन के मंच पर बुजुर्ग चौटाला को शिरकत न करने देने की तो इसे सलीके से भी कहा जा सकता था, लेकिन उगराहां ने जिस भाषा का उपयोग किया, वह आपत्तिजनक थी। उन्होंने ऐसा क्यों किया? इस समझने के लिए कोई बहुत शोध या अध्ययन की आवश्यकता नहीं है।

बस केवल इतना करना होगा कि जब से आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से उगराहां की यूनियन के समर्थकों के बयानों और भाषणों पर एक नजर डलाने की आवश्यकता भर है। यह उगराहां की ही यूनियन थी, जिसने टीकरी बार्डर पर गंभीर मुकदमों में जेल में बंद खालिद उमर, शरजील उस्मानी जैसे दर्जनों अलगाववादियों की रिहाई की मांग के पोस्टर से लगाए थे, जबकि उनकी इस मांग का कृषि कानूनों और किसानों से कोई लेना-देना नहीं था। इसके अतिरिक्त खालिस्तान समर्थकों का आंदोलनस्थलों पर जमावड़ा आम बात है। यहां तक कि पंजाब के कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू तक यह कह चुके हैं कि आंदोलन पर आतंकी तत्त्व हावी हैं।

इसका विरोध जाट समुदाय से आने वाले चर्चित नेता राकेश टिकैत ने खुलेआम विरोध भले न किया हो, लेकिन वह इन तत्त्वों से दूरी बनाए रखते हैं, जबकि उनके बड़े भाई नरेश टिकैत यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी यूनियन (भारतीय किसान यूनियन, टिकैत) का अलगाववादी तत्त्वों को कोई समर्थन नहीं है और न ही वह ऐसी किसी मांग का समर्थन करती है। स्पष्ट है कि चौटाला के मंच पर आने से अलगाववादी तत्त्वों के समर्थक हतोत्साहित होंगे। इसलिए उगराहां यह कतई नहीं चाहेंगे कि कोई भी जाट नेता चाहे चौटाला हों यी भूपेंद्र सिंह हुड्डा आंदोलन के मंच पर आएं।

उगराहां को पता है कि चौटाला या हुड्डा मंच पर आ जाएंगे तो उनकी बहुत मेहनत से सजाई गई महफिल वे लूट ले जाएंगे और उनके इरादों पर पानी फिर जाएगा। वे तो राकेश टिकैत के खिलाफ भी मजबूरी में नहीं बोल पाते, क्योंकि आंदोलन की उजड़ चुकी महफिल दोबारा जमी है तो राकेश टिकैत के ही कारण। इसीलिए धरनास्थलों से जितने भी प्रेस नोट जारी होते हैं, उनमें कहीं भी राकेश टिकैत का नाम नहीं होता। इसीलिए राकेश टिकैत सिंघु बार्डर या टीकरी बार्डर पर जाने से भी कतराते हैं, क्योंकि वहां अब जाट समुदाय के लोगों की भागीदारी नाममात्र रह गई है। हालांकि मध्य हरियाणा में कई टोल नाकों अब भी जो धरने चल रहे हैं, वे केवल जाट समुदाय के समर्थन से ही चल रहे हैं और राकेश टिकैत वहां समय-समय पर पहुंचते रहते हैं।

सेना के पराक्रम पर सवाल उठाने से गुस्सा और भड़का: उगराहां की यूनियन अलगाववादी तत्त्वों का समर्थन तो कर ही रही है, पंजाब की किसान सभा के एक नेता अमरीक सिंह ने पुलवामा हमले पर सवाल उठाते हुए सर्जिकल स्ट्राइक को भी फर्जी बता दिया, इससे जाट समुदाय की नाराजगी और बढ़ गई है, कारण यह कि जाट युवा अपनी देशभक्ति के जज्बे के कारण ही सेना में भर्ती होते हैं। हरियाणा की आबादी भले ही देश की आबादी का ढाई फीसद हो लेकिन सेना में उनकी भागीदारी दस फीसद है। यहां हर गांव में ऐसे परिवार मिल जाएंगे जिनके यहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग सेना में जाते रहे हैं।