उत्तर भारत में अत्यधिक सिंचाई का मानसून पर पड़ रहा ऐसा असर, फसलों पर ऐसा पड़ रहा प्रभाव

 


अध्ययन में पाया कि चावल की तुलना में गेहूं के साथ जोखिम दोगुना से अधिक मात्रा में बढ़ गया है।

जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स नाम की शोध–पत्रिका में हाल ही में प्रकाशित इस शोध से पता चला है कि मानसून की वर्षा दक्षिण एशिया में सिंचाई की पद्धतियों से जुड़ी पसंद के प्रति संवेदनशील है। चावल और गेहूं के लिए जोखिम हाल के दशक में बढ़ गया है।

नई दिल्ली। जलवायु से जुड़े शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि उत्तरी भारत में अत्यधिक सिंचाई इस उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग की ओर सितंबर माह में होने वाली मानसून की वर्षा को स्थानांतरित कर देती है, जिससे मध्य भारत में मौसम की स्थितियां व्यापक रूप से चरम पर पहुंच जाती हैं। इसका प्रतिकूल प्रभाव खेती और फसलों पर पड़ता है। इसके कारण किसानों को मुश्किल का सामना करना पड़ता है।

यह अध्ययन, जोकि इस तथ्य को स्थापित करता है कि मॉनसून की वर्षा दक्षिण एशिया में सिंचाई की पद्धतियों से जुड़ी पसंद के प्रति संवेदनशील है, इस क्षेत्र में उपयुक्त कृषि पद्धतियों की योजना बनाने में मदद कर सकती है।

आईआईटी मुंबई में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा समर्थित एक उत्कृष्टता केंद्र, जलवायु अध्ययन (आईडीपीसीएस) कार्यक्रम के संयोजक सुबिमल घोष ने जलवायु मॉडल का उपयोग करते हुए भारतीय ग्रीष्मकालीन मॉनसून पर कृषि कार्यों में जल के उपयोग के प्रभाव का अध्ययन किया।

'जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स' नाम की शोध–पत्रिका में हाल ही में प्रकाशित इस शोध से पता चला है कि मानसून की वर्षा दक्षिण एशिया में सिंचाई की पद्धतियों से जुड़ी पसंद के प्रति संवेदनशील है। आईडीपीसीएस, आईआईटी बोम्बे के प्रो. शुभंकर कर्मकार और उनके शोध समूह ने एक अन्य अध्ययन में पहली बार इस तथ्य को पहचाना कि चावल और गेहूं के लिए जोखिम हाल के दशक में बढ़ गया है। इस अध्ययन ने यह भी पाया कि चावल की तुलना में गेहूं के साथ जोखिम दोगुना से अधिक मात्रा में बढ़ गया है। इस अध्ययन ने 'जोखिम' की मात्रा निर्धारित करने के लिए आईपीसीसी परिभाषा की आकलन रिपोर्ट 5 का पालन किया और इसे 'एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स ' में प्रकाशित किया गया है। फसल का बढ़ता जोखिम मुख्य रूप से किसानों की घटती संख्या से प्रेरित होता है और गेहूं के जोखिम के लिए फसल उगाने के मौसम के दौरान न्यूनतम तापमान में वृद्धि को भी जिम्मेदार ठहराया जाता है। इस अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि अत्यधिक वर्षा और सूखे से संबंधित जल-जलवायु संबंधी खतरे तापमान की चरम स्थितियों की तुलना में फसलों के जोखिम को विशेष रूप से खतरनाक तरीके से बढ़ा रहे हैं।इस अध्ययन से प्राप्त एक अन्य निष्कर्ष यह है कि मध्य भारत में हाल के दशकों में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि हो रही है और यह सिंचाई में वृद्धि और उसकी वजह से वाष्पीकरण में होने वाली वृद्धि (भूमि की सतह से वाष्पीकरण और पौधों से वाष्पोत्सर्जन का योग) के कारण भी होता है।