दिल्ली की रगों में बहती यमुना की धारा में छुपा है राजधानी की समृद्धि का राज


वजीराबाद यमुना का साफ पानी दिखाई देता है।

ये चित्र देखकर आप सोच रहे होंगे कि ये यमुना नहीं हो सकती मगर आप चौंकिए नहीं ये यमुना ही है जहां कल-कल बहते साफ स्वच्छ पानी में लोग नहाने का आनंद ले रहे हैं। ये दृश्य वजीराबाद यमुना का है। ध्रुव कुमार

नई दिल्‍ली/गुरुग्राम, । यमुना कभी यमी, कभी कालिंदी तो कभी असित हुई लेकिन इसका स्वरूप निर्मल, शीतल और प्रेममय रहा। अपनी शीतलता से लोगों के कष्ट हरने के लिए स्वयं पानी बनीं सूर्य पुत्री यमुना या फिर राधा के श्रप से, मान्यताएं बहुत हैं, मत भिन्न-भिन्न हैं। दिल्ली की रगों में बहते यमुना के पानी ने शासकों को हमेशा लुभाया। एक तरफ सुरक्षा सुनिश्चित करती अरावली और दूसरी तरफ जल दायिनी यमुना, किसी भी बसावट के लिए इससे उपयुक्त और जगह क्या हो सकती थी। 

यमुना समृद्धि और यश का प्रतीक है। यह कई राज्यों से होते हुए दिल्ली में प्रवेश करती है और आगे जाती है, लेकिन दिल्ली जितनी समृद्धि और ख्याति किसी और प्रदेश को नहीं मिली। इसका कारण भी विशेषज्ञ बताते हैं कि यमुना शहर के उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है। वास्तुशास्त्री अनिल आचार्य का कहना है कि यमुना नदी के दक्षिण पश्चिम में लाल किला का निर्माण हुआ था। वास्तुशास्त्र के अनुसार ईशान कोण में बहता स्वच्छ जल समृद्धि का प्रतीक है। ऐसे में दिल्ली में यमुना शुभ संयोग वाले स्थान पर है। कहते हैं कि मान्यता के अनुसार यमुना नदी की स्वच्छता से दिल्ली का मान-सम्मान बढ़ेगा। इसीलिए तो इसकी स्वच्छता-निर्मलता को कायम रखना जरूरी है।

दिल्ली में लिखी गई थी यमुना की महिमा : गर्ग संहिता, पद्म पुराण और गीता प्रेस के सूर्यांक में यमुना का पौराणिक वर्णन मिलता है। इन्हीं के आधार पर माना जाता है कि यमुना और गंगा नदी मंदिरों का प्रवेश द्वार रही हैं। सनातन दर्शन के अनुसार नदियों के आशीर्वाद से ही सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और रीति-रिवाज के साथ साथ दर्शन और आध्यात्म फले-फूले। द्रौपदी ट्रस्ट की संस्थापक नीरा मिश्र का कहना है कि पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण जब पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ बनाने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज कर रहे थे, उस समय उन्होंने इंद्रप्रस्थ में यमुना नदी से एक झरना निकाला जिसे कलिंद पर्वत पर उद्गम की वजह से कालिंदी नाम दिया गया। शास्त्रों के मुताबिक कृष्ण ने उसी कालिंदी रूपी यमुना से विवाह किया था। यमुना पर कई गीत भी बने हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने यमुना तट पर बैठकर यमुनाष्टक की रचना की थी। यमुना तट का आश्रम इलाका वही स्थान है। वल्लभाचार्य द्वारा रचित यमुनाष्टक में भी यमुना की महिमा का वर्णन मिलता है। इंद्रप्रस्थ महात्म्य और महाभारत में इन यमुना को तीर्थ के तौर पर बताया गया है।

अनेक नामों वाली यमुना: पौराणिक इतिहासकार मनीष के गुप्ता बताते हैं कि विश्वकर्मा की पुत्री संध्या के गर्भ से उत्पन्न सूर्य की पुत्री यमुना है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यमुना असल में यमराज की बहन यमी है। कहते हैं, यमुना नदी का जल पहले साफ था जो बाद में कुछ नीला, कुछ काला हो गया, इसलिए इसे ‘काली गंगा’ भी कहा गया है। इसके अलावा इसका एक नाम असित भी है। असित एक ऋषि थे और माना जाता है कि सबसे पहले यमुना नदी को इन्होंने ही खोजा था। यमुना कालिंद पर्वत से निकली थी इसलिए उनका नाम कालिंदी भी पड़ गया था। प्रारंभ में यमुना का जल बिल्कुल स्वच्छ और नीले रंग का था, ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण के प्रेम में वह सांवली हो गईं।

इंद्रप्रस्थ यानी दिल्ली में ही हुआ था कृष्ण-कालिंदी का विवाह: यमुना को बचाने और उसका महत्व बताने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास कर रहे रंजीत चतुर्वेदी का कहना है कि सूर्य अपनी पुत्री को गोद में बिठाकर रखते थे। ऐसे में कालिंद पर्वत ने उनसे पूछा कि वे हमेशा पुत्री को अपनी गोद में क्यों रखते हैं। तब सूर्य ने बताया कि उनकी पुत्री में विशेष गुण हैं। इस पर पर्वत ने आग्रह किया कि यदि वे कभी भी धरती पर जाएं तो पहले उन पर चरण रखें। सूर्य ने कालिंद पर्वत को यह वरदान दिया और जब यमी यमुना बनकर पृथ्वी पर आईं तो वे कालिंद पर्वत से होती हुई निकलीं। ऐसे में यमुना कालिंदी हुईं। रंजीत के मुताबिक भागवत में लिखा है कि जब कृष्ण द्वारकाधीश बन चुके थे तो एक दिन मार्ग में उन्होंने एक स्त्री को देखा और अजरुन से कहा कि वे पूछ कर आएं कि वह स्त्री कौन थी। अजरुन ने स्त्री से जानना चाहा तो उसने बताया कि वह सूर्यपुत्री कालिंदी हैं और अपने श्रीकृष्ण का इंतजार कर रही हैं। ऐसे में इंद्रप्रस्थ यानी दिल्ली में कृष्ण कालिंदी का विवाह हुआ और अजरुन उसके साक्षी बने थे। ऐसे में यमी का पृथ्वी पर आना और कृष्ण का उनसे विवाह करना, यह एक सुनियोजित तरीके से रची गई लीला थी।

लाल किला की दीवार के साथ सलीम गढ़ का किला जहां पर कभी यमुना बहती थी। ध्रुव कुमार

यहीं पांचाल में तो निकली थी यमुना की मूर्ति : कहा जाता है कि गंगा में स्नान करके सभी पापों से मुक्त हुआ जा सकता है। नीरा बताती हैं कि तीर्थों में अगर गंगा स्नान का महत्व है तो यमुना पान का महत्व है। कई जगह मंदिरों में यमुना की मूर्तियां बताती हैं कि प्राचीन काल से ही यमुना की पूजा मंदिरों में होती थी। पुरातत्व विभाग की 1940 की खोदाई में पांचाल के ‘अहिछत्र’ में गंगा के साथ यमुना नदी की सबसे बड़ी टेराकोटा की मूर्ति निकली थी। अहिछत्र उत्तर पांचाल की प्राचीन राजधानी थी। इसका उल्लेख महाभारत में है। यह मूर्ति उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के रामनगर गांव में खोजी गई थी। अब यमुना की यह छह फीट ऊंची मूर्ति दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है।

कष्ट मिटाने को नीर बनी : प्रागैतिहासिक काल में यमुना मधुबन के समीप बहती थी, जहां उसके तट पर शत्रुघ्न ने सर्वप्रथम मथुरा नगरी की स्थापना की थी। यमुना नदी यमुनोत्री स्थित कालिंद पर्वत से निकलकर हरियाणा दिल्ली होते हुए मथुरा पहुंचती है। इसके पश्चात आगरा फिरोजाबाद होते हुए प्रयागराज संगम में मिल जाती है। मनीष के गुप्ता का कहना है कि पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य की पत्नी संध्या उनके तेज और ताप से भयभीत रहा करती थीं जबकि भगवान सूर्य उनके इस भय से सहमत नहीं थे। उन दोनों के आपसी तालमेल में कमी को देखते हुए यमुना ने अपने आप को जल में परिवर्तित करने का फैसला ले लिया ताकि वह कष्ट बढ़ाने वाली न बनें। उनके मन में यह भावना थी कि संसार में पहले से ही बहुत कष्ट हैं ऐसे में उन्हें उन कष्टों को घटाने के लिए अपना बलिदान देना होगा। यमुना ने हिमालय के जिस स्थान पर अपने आप को जल में परिवर्तित करके गिराया उस स्थान का नाम यमुनोत्री पड़ा। जल में परिवर्तित होने के बावजूद यमी अपनी मां को याद करती रहीं। उनकी मां ने उन्हें दिलासा दी कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण जन्म लेंगे जो कि भगवान विष्णु के अवतार हैं और वही आपका सम्मान बढ़ाएंगे। यमुना पर काम कर रहे रंजीत चतुर्वेदी के अनुसार जब राधा ने कृष्ण के साथ निकुंज में यमी को देख लिया था तब कृष्ण ने उन्हें अपने अंदर समाहित कर लिया और यमुना उनकी आंखों से जलधारा के रूप में फूट पड़ीं। राधा को जब इस बात का ज्ञान हुआ तो उन्होंने यमुना को उसी समय श्रप दे दिया कि अब वे ऐसे ही नीर बनकर धरती पर बहती रहेंगी।

इसकी शीतला से दिल्ली का दिल भी हुआ शीतल : पांडवों से लेकर मुगलों और अंग्रेजों तक ने दिल्ली को चुना, क्योंकि यहां अरावली की गोद में यमुना नदी की शीतलता मिलती थी। आचार्य चतुरसेन ने अपनी कहानी-संकलन की पुस्तक ‘बड़ी बेमग’ में बड़ी ही खूबसूरती से इस बात का जिक्र किया है कि किस तरह से गर्मी की तपिश में झुलस रहे मुगल बादशाह शाहजहां को यमुना की शीतलता दिल्ली खींच लाई। वे लिखते हैं कि अभी दिल्ली नई बस रही थी। आगरा की गर्मी से घबराकर बादशाह शाहजहां ने यमुना के किनारे अर्धचंद्राकार यह नया नगर बसाया था। शाहजहांनाबाद के लिए बहुत सा मलबा और सामान पुरानी दिल्ली के महलात के खंडहरों से लिया गया था जो पुराने किले से हौज खास और कुतुबमीनार तक फैले हुए थे। नदी की दिशा को छोड़कर बाकी तीनों ओर सुरक्षा के लिए पक्की पत्थर की शहरपनाह बन चुकी थी। सलीमगढ़ का किला बीच यमुना में था जहां आज मार्ग बना हुआ है और ऊपर से ट्रेन गुजरती है। किला भी लगभग अर्धचंद्राकार था। इसकी तली में यमुना नदी बह रही थी परंतु किले की दीवार और नदी के बीच बड़ा रेतीला मैदान था जिसमें हाथियों की लड़ाई दिखाई जाती थी। यहीं खड़े होकर सरदार, अमीर और हिंदू राजाओं की फौज झरोखे में खड़े बादशाह के दर्शन किया करती थी। नदी की ओर छोड़कर किले के सब ओर गहरी खाई थी जो यमुना के पानी से भरी हुई थी। इसके बांध खूब मजबूत थे और पत्थर के बने थे। खाई के जल में मछलियां बहुत थीं। आज के हालात में महज एक प्रजाति की ही मछली यमुना में बची हैं जिनका जीवन भी प्रदूषण के कारण संकट में है।