स्त्री अधिकारों को मिले कानूनी संरक्षण, समान नागरिक संहिता से निकल सकती है राह


समान नागरिक संहिता से ही मिलेगा देश की हर स्त्री को कानूनी संरक्षण का पूर्ण अधिकार

संविधान के मुताबिक हर भारतीय नागरिक को समान अधिकार हासिल है लेकिन जब घर एवं परिवार की बात आती है तो स्त्री गौण हो जाती है और धार्मिक रीति-रिवाज हावी हो जाते हैं। शादी तलाक मिल्कियत बच्चों की सरपरस्ती जैसे मामलों में हमेशा स्त्री को अन्याय झेलना पड़ता है।

  समान नागरिक संहिता हमेशा से राजनीति एवं विवादों में लिपटा विषय रहा है। यह भले ही भाजपा के घोषणा पत्र का हिस्सा हो, लेकिन इसका मूल विचार पंडित जवाहर लाल नेहरू और बाबासाहेब आंबेडकर ने रखा था। उनकी असल चिंता स्त्री समानता और स्त्री अधिकारों के बारे में थी। उन्हें फिक्र थी कि हमारे समाज में धर्म की आड़ में पुरुष प्रधानता के चलते देश की आधी आबादी को समान न्याय मिलना मुश्किल होगा। आजादी के सात दशक बाद आज यह मुद्दा धर्म की राजनीति और पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के बीच अटका पड़ा है। अब जब देश की शीर्ष अदालत से लेकर राज्यों की तमाम उच्च अदालतें इसे वक्त की जरूरत बता रही हैं, तो इसे लागू करना ही बेहतर कदम होगा।

संविधान के मुताबिक हर भारतीय नागरिक को समान अधिकार हासिल है, लेकिन जब घर एवं परिवार की बात आती है, तो स्त्री गौण हो जाती है और धार्मिक रीति-रिवाज हावी हो जाते हैं। शादी, तलाक, मिल्कियत, बच्चों की सरपरस्ती जैसे मामलों में हमेशा स्त्री को अन्याय ङोलना पड़ता है। इन मामलों में तथाकथित धर्म आधारित रीतियों का जोर रहता है, जहां पुरुष को सवरेपरि और स्त्री दोयम दर्जे की है। ऐसा हर धर्म और मजहब में दिखता है। इस मामले में हिंदू कोड बिल से हिंदू स्त्रियों को पर्याप्त अधिकार मिले। समय-समय पर इसमें और भी सुधार हुआ।

वहीं मुस्लिम समाज आज भी 1937 के शरीयत एप्लीकेशन एक्ट से संचालित होता है। देश में मुस्लिम पारिवारिक कानून में व्यापक सुधार की जरूरत है। पिछले कुछ वर्षो में मुस्लिम औरतों ने जुबानी तीन तलाक के खिलाफ व्यापक मुहिम छेड़ी, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवैध करार दिया। इस दौरान संघर्षरत महिलाओं ने निकाहनामा, मेहर समेत अन्य स्त्री अधिकारों को भी उजागर किया, जिन्हें मजहब के ठेकेदार सामने नहीं आने देते। शाहबानो मामले से लेकर आज तक वे मुस्लिम कानून में हर सुधार का विरोध करते रहे हैं। आज भी हलाला, बहुविवाह, शादी की उम्र, संतान की सरपरस्ती, तलाक का सही तरीका जैसे मसले मौजूद हैं। शरई कानून में स्त्री को हलाला, बहुविवाह, संतान की सरपरस्ती जैसे मामलों में संरक्षण नहीं प्राप्त है। देश की हर स्त्री को कानूनी संरक्षण का पूर्ण अधिकार है, फिर वह हंिदूू स्त्री हो या मुस्लिम। समान नागरिक संहिता से इसकी राह निकल सकती है।

हालांकि समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीति सही नहीं है। इसे स्त्री न्याय की तरह समझना चाहिए, चुनावी गणित की तरह नहीं। मुस्लिम समाज के सामने गरीबी, शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन जैसी कई समस्याएं हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास जीतने की बात कही थी, जिस पर अमल होना चाहिए। किसी भी कानून के गठन में सूझ-बूझ, विचार-विमर्श एवं सभी की राय शामिल करना जरूरी है। व्यापक सामाजिक स्वीकृति के बिना कानून निर्थक हो जाता है। वैसे भी समान नागरिक संहिता सिर्फ मुसलमानों का मामला नहीं है, यह पारसी, हंिदूू समेत सभी समाजों से जुड़ा है। स्त्री समानता लोकतंत्र का ध्येय होता है, जिसके बिना प्रगति संभव नहीं। इस पर निष्ठा, ईमानदारी, खुलेपन और सूझ-बूझ से कदम उठाने की जरूरत है।

जकिया सोमन, संस्थापक, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन

शरई कानून में स्त्री को हलाला, बहुविवाह, संतान की सरपरस्ती जैसे मामलों में संरक्षण नहीं प्राप्त है। देश की हर स्त्री को कानूनी संरक्षण का पूर्ण अधिकार है, फिर वह हंिदूू स्त्री हो या मुस्लिम। समान नागरिक संहिता से इसकी राह निकल सकती है।