समानता की दरकार, देश में समान नागरिक संहिता की व्यापकता और जरूरत

 


गोवा एकमात्र राज्य है, जहां गोवा फैमिली लॉ के नाम से समान नागरिक संहिता लागू है

देश में विभिन्न धर्मो व मान्यताओं के लोग अपने रीति-रिवाजों के आधार पर शादी संपत्ति तलाक और बच्चा गोद लेने संबंधी फैसले करते हैं। मामला दो अलग-अलग समुदाय के लोगों से जुड़ा हो तो अक्सर विवाद की स्थिति बन जाती है।

नई दिल्‍ली। कानून के समक्ष सब समान और सबके लिए समान कानून जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला हैं। कई बार कोई समान कानून नहीं होने का कुछ लोग अनुचित लाभ भी लेना चाहते हैं। हाल में दिल्ली हाई कोर्ट में आया तलाक का एक मामला कुछ ऐसा ही था। हिंदू रीति-रिवाज से शादी होने के बावजूद जब तलाक की बात आई, तो महिला ने यह दलील दी कि राजस्थान के जनजातीय मीणा समुदाय से होने के कारण उस पर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रविधान लागू नहीं होते। अदालत ने महिला के तर्क को तो खारिज किया ही, देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत को भी रेखांकित किया।

यूसीसी की अवधारणा

समान नागरिक संहिता मूलत: धार्मिक मान्यताओं से जुड़े अलग-अलग कानूनों को समाप्त करने और इसकी जगह एक समान कानून लागू करने की अवधारणा पर केंद्रित है। यह संहिता शादी, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार, बच्चा गोद लेने और गुजारा भत्ता जैसे मामलों में लागू होगी।

संविधान में भी जताई गई जरूरत

तत्कालीन परिस्थितियों में समान नागरिक संहिता को लागू भले न किया गया हो, लेकिन संविधान में इसकी जरूरत जरूर जताई गई है। संविधान सभा में इस पर चर्चा भी हुई। 1951 से 1954 के बीच संसद में इस पर तीखी बहस हुई थी। मसले पर एक राय नहीं बन पाने के बाद इसे संविधान के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 44 में शामिल कर दिया गया।

गोवा ने प्रस्तुत किया उदाहरण

  • गोवा एकमात्र राज्य है, जहां गोवा फैमिली लॉ के नाम से समान नागरिक संहिता लागू है

मौजूदा स्थिति: फिलहाल देश में विभिन्न धर्मो व मान्यताओं के लोग अपने रीति-रिवाजों के आधार पर शादी, संपत्ति, तलाक और बच्चा गोद लेने संबंधी फैसले करते हैं। मामला दो अलग-अलग समुदाय के लोगों से जुड़ा हो, तो अक्सर विवाद की स्थिति बन जाती है। ऐसे विवादों के सर्वमान्य निपटारे के लिए कोई कानून नहीं है

कानून एक फायदे अनेक

कानूनों का सरलीकरण : यूसीसी से विवाह, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर कानूनों को सरल बनाने में मदद मिलेगी। किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक पर एक जैसा ही कानून लागू होगा, जिससे न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव कम होगा।

लैंगिक न्याय : इसका एक बड़ा लाभ स्त्री-पुरुष समानता के मोर्चे पर मिलेगा। यूसीसी से पर्सनल लॉ जैसी व्यवस्थाएं समाप्त होंगी, जिससे इनमें मौजूद लैंगिक पक्षपात को खत्म किया जा सकेगा।

पंथनिरपेक्षता को बल : देश के संविधान की प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जुड़ा है। एक पंथनिरपेक्ष व्यवस्था में धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अलग-अलग नियम कतई स्वीकार नहीं किए जा सकते हैं।

सरला मुद्गल केस

हिंदू पति ने पत्नी को तलाक दिए बिना ही इस्लाम कुबूल किया और दूसरी शादी कर ली, इससे दूसरी शादी की कानूनी मान्यता पर सवाल उठे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत हुई शादी रद तभी मानी जाएगी, जब कानून के तहत ही उसे खत्म किया जाए। ऐसा किए बिना धर्म परिवर्तन कर हुई शादी भारतीय दंड संहिता की धारा 494 (5) के तहत अपराध मानी जाएगी। यह मामला 1995 का है।

चर्चित मामले

मुहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम: इस मामले में 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता बनाने का आदेश दिया। शाहबानो को उसके पति ने तीन बार तलाक बोलकर तलाक दे दिया था। शाहबानो ने पति से हक मेहर के इतर गुजारा भत्ते की मांग की और मामला अदालत पहुंचा। अदालत ने आदेश दिया कि धारा 125 के तहत मुस्लिम महिला को भी गुजारा भत्ते का अधिकार है।

हंगामा है क्यों बरपा?

संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 में अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति, धार्मिक रीति-रिवाज के संरक्षण का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। वे अपने धर्म के हिसाब से शिक्षण संस्थानों का संचालन करते हैं। समान नागरिक संहिता को इन अधिकारों के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है।

यूसीसी के पक्षकारों का कहना है कि रीति-रिवाज के नाम पर किसी पर अत्याचार या किसी के अधिकारों के हनन की मंजूरी नहीं दी जा सकती है। मुस्लिम महिलाओं के मामले में ऐसे कई किस्से सामने आते हैं। तत्काल तीन तलाक भी ऐसी ही कुरीति थी, जिस पर सरकार ने अंतत: कानून बनाया। बहु विवाह भी ऐसी ही प्रथा है, जो मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार को बढ़ावा देती है।