दिल्ली में फिर छिड़ सकती है अधिकारों को लेकर जंग

 


LG Vs Delhi Government: दिल्ली में फिर छिड़ सकती है अधिकारों को लेकर जंग, पढ़िये- पूरा मामला

उपराज्यपाल निवास और दिल्ली सरकार के बीच कुछ मुद्दों को लेकर फिर रार बढ़ रही है। अधिकारों को लेकर शांत लड़ाई में चिनगारियां छूट रही हैं। विभिन्न मुद्दों को लेकर जिस तरह माहौल गरमा रहा है। इससे अब विवाद और बढ़ने के आसार हैं।

नई दिल्ली। सरकारी कामकाज को लेकर उपराज्यपाल निवास और दिल्ली सरकार के बीच फिर रार बढ़ रही है। अधिकारों को लेकर शांत लड़ाई में चिनगारियां छूट रही हैं। विभिन्न मुद्दों को लेकर जिस तरह माहौल गरमा रहा है। इससे अब विवाद और बढ़ने के आसार हैं। दरअसल, दिल्ली सरकार अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का हवाला दे रही है, जबकि राजनिवास संसद में पास हो चुके राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक 2021 के आधार पर काम कर रहा है। विवाद गरमाने की शुरुआत उपराज्यपाल द्वारा दिल्ली दंगा व किसानों के मामले में दिल्ली सरकार के वकीलों के पैनल को खारिज करने के साथ ही हो गई थी। शनिवार को उस समय यह और बढ़ गया, जब दिल्ली सरकार ने कहा कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के कामकाज में दखलंदाजी बंद करें। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक पत्र भी उपराज्यपाल को लिखा है। उसमें कहा है कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार गत मार्च में संसद में पास हो चुके राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक 2021 के आधार पर अपने अधिकारों की बात नहीं कर रही है।

राज्य सरकार अपने अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश को आधार मान रही है। अब यही टकराव की मुख्य वजह बनती जा रही है। दिल्ली सरकार का दावा सुप्रीम कोर्ट के चार जुलाई 2018 के आदेश में उपराज्यपाल के अधिकारों को स्पष्ट किया गया है। संविधान में कहीं भी उपराज्यपाल को यह अधिकार नहीं है कि वह दिल्ली की चुनी हुई सरकार के तहत आने वाले विषयों पर संबंधित विभागों के अधिकारियों की सीधे बैठक बुलाएं, निर्णय लें और उन्हें दिशा निर्देश जारी करें।

उपराज्यपाल को पुलिस, भूमि और पब्लिक ऑर्डर के बारे में निर्णय लेने का अधिकार दिया है। इन तीन विषयों को छोड़कर सरकार चलाने के बाकी सभी विषयों पर उपराज्यपाल केवल चुनी हुई सरकार के द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार काम करेंगे। देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली के उपराज्यपाल को संविधान द्वारा वीटो पावर दिया गया है कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार के किसी निर्णय से सहमत नहीं होने की स्थिति में वह अपनी अलग राय व्यक्त कर सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुत जोर देकर इस बात को कहा है कि उपराज्यपाल को यह अधिकार बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में इस्तेमाल करने के लिए दिया गया है। राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक 2021 में ये प्रविधान है दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल होगा। दिल्ली विधानसभा से पारित किसी भी विधेयक पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार इसमें उपराज्यपाल को दिया गया है।

दिल्ली सरकार को विधायिका से जुड़े फैसलों पर उपराज्यपाल से 15 दिन पहले और प्रशासनिक मामलों पर करीब सात दिन पहले मंजूरी लेनी होगी। इसमें यह भी प्रविधान किया गया है कि दिल्ली सरकार को शहर से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले उपराज्यपाल से सलाह लेनी होगी। इसके अलावा दिल्ली सरकार अपनी ओर से कोई कानून खुद नहीं बना सकेगी। इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि यह विधान मंडल और कार्यपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ाएगा और साथ ही निर्वाचित सरकार और राज्यपाल के उत्तरदायित्वों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के शासन की संवैधानिक योजना के अनुरूप परिभाषित करेगा।