कोरोना महामारी के बाद स्कूली शिक्षा व्यवस्था में समग्र सुधार की बने रूपरेखा

 


महामारी के बाद स्कूली शिक्षा व्यवस्था में पैदा हुई चुनौतियों से समग्रता से निपटने की आवश्यकता है। फाइल

कोरोना महामारी के दौरान देशभर में स्कूली शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक प्रभावित हुई है। हालांकि आनलाइन माध्यम से स्कूली कक्षाओं का संचालन अवश्य जारी रखा गया है लेकिन महामारी जनित कारणों से आनलाइन कक्षाओं के अभी जारी रहने के दौर में इस व्यवस्था में अपेक्षित सुधार की आवश्यकता है।

 कोरोना काल में देश में शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में सरकार द्वारा कई नीतिगत फैसले लिए गए हैं। वहीं पिछले दिनों एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली प्लस यानी यूडीआइएसई प्लस द्वारा वर्ष 2019-20 के लिए जारी रिपोर्ट कई मायनों में अहम है। एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली की शुरूआत 2012-13 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रलय (तब मानव संसाधन मंत्रलय) द्वारा की गई थी। मंत्रलय ने इसमें प्राथमिक शिक्षा और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए एकीकृत प्रणाली का गठन किया था। भारत में विद्यालयी शिक्षा पर यह मुख्य सार्वजनिक डाटाबेस है, जिसमें 15 लाख से अधिक विद्यालय शामिल हैं। वहीं इसमें 97 लाख शिक्षक और प्री-प्राइमरी से उच्च माध्यमिक स्तर तक 26.5 करोड़ बच्चे हैं।

यूडीआइएसई प्लस की रिपोर्ट में वर्ष 2019-20 के आधार पर विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था में विभिन्न पहलुओं का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार माध्यमिक स्तर पर 3.8 करोड़ से अधिक छात्र नामांकित हैं, जिनमें से 44.3 फीसद सरकारी विद्यालयों में हैं और करीब 20 फीसद सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में हैं, जबकि लगभग 35 प्रतिशत छात्र निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यानी विद्यालयी शिक्षा के सभी स्तरों पर सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) में 2018-19 की तुलना में 2019-20 में सुधार हुआ है। एलिमेंटरी और अपर प्राइमरी स्तर के विद्यालयों में सकल प्रवेश दर (जीईआर) क्रमश: 1.7 फीसद और दो फीसद वृद्वि दर्ज की गई है, जबकि हायर सेकेंडरी स्तर पर वृद्धि दर 1.3 फीसद रही। इस दौरान शिक्षक छात्र अनुपात में भी सुधार हुआ। महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षकों की संख्या में 2018-19 की तुलना में 2019-20 में 2.7 फीसद की वृद्धि हुई। आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2019-20 में 96.87 लाख शिक्षक स्कूली शिक्षा में लगे थे, जो 2018-19 के आंकड़ों की तुलना में लगभग 2.57 लाख अधिक है।

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उपरोक्त संदर्भो में यूडीआइएसई की रिपोर्ट सकारात्मक संकेत देती है। जबकि कुछ पक्ष अभी भी चिंता का कारण बने हुए हैं। पूर्व के अध्ययनों के अनुसार विद्यालयों में नामांकन दर में वृद्धि के साथ पाठ्यक्रम सत्र के बीच में विद्यालय छोड़ने की दर में कमी लाना चुनौतीपूर्ण है, जिसके कई सामाजिक और आíथक निहितार्थ हैं। दूसरी तरफ कोरोना महामारी के दौरान शिक्षा व्यवस्था सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था के लिए तय की जा रही आगामी नीतियों में यूडीआइएसई प्लस रिपोर्ट को आधार बनाना महत्वपूर्ण होगा। रिपोर्ट के अनुसार देश में करीब 30 फीसद छात्र सेकेंडरी से सीनियर सेकेंडरी स्तर पर दाखिला नहीं लेते हैं और बीच में ही विद्यालय छोड़ देते हैं। जबकि माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने की दर 17 फीसद से अधिक है। उच्च प्राथमिक और प्राथमिक स्तर पर यह क्रमश: 1.8 और 1.5 फीसद है।

महामारी के बाद से व्यापक बदलाव : भारत में शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए वर्तमान में अनेक कदम उठाए जरूर जा रहे हैं, लेकिन इस दिशा में अभी भी काफी कुछ किया जाना शेष है। दूसरी तरफ यूडीआइएसई प्लस की रिपोर्ट में कोरोना महामारी के पूर्व की स्थिति से संबंधित आंकड़ों को शामिल किया गया है। ऐसे में यह आवश्यक है कि जिस तरह कोरोना महामारी के दौरान शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई है, इसके सभी आयामों पर चर्चा की जानी चाहिए।

कोरोना महामारी के दौरान आनलाइन माध्यम एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है। ऐसे में आनलाइन शिक्षा व्यवस्था लागू करने में तकनीकी पूर्व आवश्यकताएं और आधारभूत संरचना पर कार्य किया जाना अहम होगा। संबंधित रिपोर्ट के अनुसार देश के सिर्फ 39 फीसद स्कूलों में कंप्यूटर और सिर्फ 22 फीसद स्कूलों में इंटरनेट कनेक्शन था। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि कोरोना काल में आनलाइन शिक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी रही। हाल ही में इस संबंध में प्रकाशित यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 8.5 प्रतिशत स्कूली छात्रों के पास इंटरनेट की सुविधा है। यही कारण है कि कोरोना के कारण शिक्षा में उत्पन्न व्यवधान की स्थिति में भारत का स्थान दक्षिण एशिया में दूसरे सबसे खराब देशों में रहा। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को आनलाइन शिक्षा व्यवस्था के माध्यम को और प्रभावी बनाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

भारतनेट परियोजना : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त को यह कहा था कि आगामी एक हजार दिनों में देश के सभी गांवों में ब्राडबैंड कनेक्टिविटी के विस्तार का लक्ष्य रखा है। वहीं पिछले दिनों सरकार ने ‘भारतनेट परियोजना’ के माध्यम से ब्राडबैंड विस्तार के लिए अतिरिक्त राशि की घोषणा की है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में आनलाइन शिक्षा व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू करने में काफी मदद मिलेगी। जरूरत है कि योजनाओं को तय समय में पूरा किया जाए, क्योंकि अक्टूबर 2011 में प्रारंभ भारतनेट परियोजना को पूरा करने की तय समय सीमा को कई बार बढ़ाया जा चुका है। इस परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वर्तमान महामारी काल में आनलाइन शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में इस परियोजना की महत्वपूर्ण भूमिका है।

आनलाइन शिक्षा व्यवस्था का विश्लेषण : यूडीआइएसई प्लस की रिपोर्ट ने नई शिक्षा नीति और आनलाइन शिक्षा व्यवस्था से संबंधित पक्षों को विश्लेषण करने की आवश्यकता पर बल दिया है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में आनलाइन और डिजिटल शिक्षा प्रौद्योगिकी का समान उपयोग सुनिश्चित करना, विषय के अंतर्गत महामारी के दौर में आनलाइन शिक्षा व्यवस्था को लागू करना एक आवश्यक कदम माना है। साथ ही इसके कई आयामों पर चर्चा भी की गई है। नई शिक्षा नीति में साहित्य, वोकेशनल विषय, ओपन डिस्टेंस लìनग आदि में आनलाइन माध्यमों को महत्वपूर्ण माना गया है, जबकि ‘स्वयं’ और ‘दीक्षा’ जैसे आनलाइन प्लेटफार्म का उपयोग कर शिक्षकों के प्रशिक्षण का कार्य किया जाना है। उपरोक्त आधार पर यह महत्वपूर्ण है कि आनलाइन शिक्षा व्यवस्था को लागू करने के लिए सभी आवश्यक आधारभूत संरचना और प्रौद्योगिकी के विकास से संबंधित सभी जरूरतों पर एक प्रभावी रूपरेखा तैयार करने की जरूरत है।

बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम या शिक्षा का अधिकार अधिनियम यानी आरटीई चार अगस्त 2009 को अधिनियमित किया गया था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत भारत में छह से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रविधान किया गया है। वहीं एक अप्रैल 2010 को अधिनियम लागू होने पर भारत शिक्षा को हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाने वाले 135 देशों में से एक बन गया।

कोरोना महामारी ने स्कूली शिक्षा व्यवस्था को काफी प्रभावित किया है, जबकि यूडीआइएसई प्लस की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई कमियों को दुरुस्त करने की जरुरत है। कोरोना महामारी के दौरान छात्रों के लिए आनलाइन माध्यम ही बेहतर विकल्प था। ऐसे में ग्रामीण और शहरी छात्रों में आनलाइन माध्यम से दी जा रही शिक्षा में काफी असमानता थी, जबकि सरकरी और गैर सरकारी विद्यालयों की स्थिति कमोबेश यही रही। इस संबंध में 34,000 से अधिक भारतीय छात्रों पर किए गए एनसीईआरटी के एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अगस्त 2020 में जारी किया गया जिसके तहत लगभग 27 फीसद स्कूली छात्रों के पास आनलाइन कक्षाओं में भाग लेने के लिए स्मार्टफोन, लैपटाप या कंप्यूटर तक पहुंच नहीं थी। ऐसे में यह आवश्यक है कि सभी छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए। पिछले दिनों केंद्र सरकार द्वारा सेटेलाइट टीवी क्लासरूम स्थापित करने के लिए इसरो ने अपनी सहमति दे दी है, ताकि महामारी के दौरान विद्यालय बंद होने की स्थिति में उन हजारों छात्रों को शिक्षा मुहैया कराई जा सके जिनकी पहुंच आनलाइन कक्षाओं तक नहीं है। ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में टीवी तक बच्चों की पहुंच आसान है, वहीं सेटेलाइट टीवी के माध्यम से छात्र निशुल्क आनलाइन क्लास की सुविधा का लाभ उठा सकेंगे।

विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था से जुड़े पिछले कुछ रिपोर्ट इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि विगत दशकों में निजी विद्यालयों के खुलने में और उनमें नामांकन दर में काफी वृद्धि दर्ज की गई है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि निजी विद्यालय शिक्षा प्राप्त करने के लिए लोगों के सामने एक विकल्प देता है, लेकिन यह शिक्षा व्यवस्था में असमानता का भी कारण बना है। सरकार के सामने यह चुनौती है कि सरकारी विद्यालयों में भी बेहतर शिक्षा व्यवस्था को लागू किया जाए और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाया जाए। विगत दो वर्षो से वैश्विक कोरोना महामारी के कारण शिक्षा व्यवस्था एक चुनौती के दौर से गुजर रही है। जबकि यूडीआइएसई प्लस की रिपोर्ट से स्कूली शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई अहम पक्ष उभर कर सामने आए हैं। ऐसे में यह महत्वपूर्ण कि केंद्र और राज्य सरकारों को इसके विभिन्न पक्षों से जुड़े कई आयामों पर कार्य करने की जरूरत है। गौरतलब है कि प्रारंभ में शिक्षा राज्य सूची में शामिल थी, किंतु केंद्र और राज्यों का महत्व देखते हुए संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम के तहत इसे समवर्ती सूची में शामिल कर लिया गया। ऐसे में केंद्र और राज्यों को एक साझा और प्रभावी रणनीति के तहत कार्य करने की आवश्यकता है।

ऐसे समय में जब देश में नई शिक्षा नीति लागू की जा रही है, उसके तहत शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किया जाना है। ऐसे में नई शिक्षा नीति में महामारी की दशा में वैकल्पिक माध्यमों की रूपरेखा भी तैयार की गई है। अत: विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए इसे अवसर के तौर पर लेना चाहिए और एक तय समय सीमा में शिक्षा से जुड़ी नई पाठ्यक्रम व्यवस्था के साथ आधारभूत संरचना के विकास के लक्ष्य को पूरा किया जाना चाहिए।