आज से 100 पहले जिहादी मोपलाओं ने हिंदू स्त्रियों-पुरुषों के साथ की थी भीषण क्रूरता

 

भारतीयों पर हुए सदियों के अत्याचार को अकादमिक पुस्तकों से गायब कर दिया गया
लंबे संघर्ष के बाद जब देश को स्वाधीनता मिली भी तो देश का दुखद विभाजन भी साथ ही मिला और उसके साथ ही मिली भीषण नरसंहार और दुराचार की पीड़ा। कोई आश्चर्य नहीं कि इसे भी करीब-करीब भुला ही दिया गया।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रत्येक वर्ष अगस्त माह की 14 तारीख को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने का संकल्प देश के विभाजन से जुड़ी अकल्पनीय मानवीय त्रासदी, उससे जुड़े धार्मिक-सामाजिक कारकों एवं उस दौर के राजनीतिक नेतृत्व की विफलता की याद तो दिलाएगा ही, साथ ही यह हमें उन उपायों और तौर-तरीकों पर गौर करने और उन पर कार्य करने की सीख भी देगा, जिससे भविष्य में इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जा सके।

उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक काल से लेकर आधुनिक युग तक जहां भारतभूमि धर्म, अर्थ, शिक्षा, साहित्य एवं कला संबंधी उपलब्धियों से भरी-पूरी रही है, वहीं यह भयानक विदेशी आक्रमणों, हत्या, महिलाओं के साथ दुराचार, लूटपाट, आगजनी और तोड़फोड़ की भी मूक साक्षी रही है। मध्ययुगीन शासकों ने देश पर विदेशियों के बार-बार होने वाले आक्रमणों के बावजूद कुछ खास सबक नहीं लिया। वे अपने इतिहास के संबंध में अक्षम्य स्मृति लोप का शिकार बने रहे। महान प्रतिहार शासकों तथा वीर बप्पा रावल जैसे कुछ व्यक्तिगत प्रयास भी नाकाफी सिद्ध हुए।

परिणाम यह हुआ कि पहले सिंध हाथ से गया, फिर नालंदा विवि जली, सोमनाथ को लूटा गया और दिल्ली का भी पतन हुआ। पंजाब से कामरूप तक तथा कश्मीर से कन्याकुमारी तक की पावन धरती असभ्य तुर्क, अफगान और मुगल आक्रांताओं से छलनी होती रही।

लंबे संघर्ष के बाद जब देश को स्वाधीनता मिली भी तो देश का दुखद विभाजन भी साथ ही मिला और उसके साथ ही मिली भीषण नरसंहार और दुराचार की पीड़ा। कोई आश्चर्य नहीं कि इसे भी करीब-करीब भुला ही दिया गया। देश के कुछ प्रारंभिक शिक्षा मंत्रियों और वामपंथियों ने मिलकर इतिहास के साथ ऐसा खिलवाड़ किया कि आम भारतीयों पर हुए सदियों के अत्याचार को अकादमिक पुस्तकों से गायब कर दिया गया। इस साजिश का भारतीय समाज पर अनर्थकारी प्रभाव पड़ा है।

आम भारतीयों में से कितनों को याद है कि आज से सौ साल पहले घटित रोंगटे खड़ी कर देने वाली उन घटनाओं के विषय में जिसे मालाबार, केरल के हिंदू स्त्रियों-पुरुषों ने जिहादी मोपलाओं के हाथों भोगा था। 20 अगस्त, 1921 को केरल के एक छोटे से कस्बे पिनमांगड़ी में मोपला मुस्लिमों और अंग्रेजी सरकार के बीच खिलाफत के प्रश्न पर शुरू हुए संघर्ष ने देखते ही देखते व्यापक हिंदू विरोधी दंगे का रूप ले लिया। यहां यह बताना भी जरूरी है कि इतिहास की पुस्तकों में इस सुनियोजित हत्याकांड को आज भी ‘मोपला विद्रोह’ के नाम से पढ़ाया जाता है, मानो यह किसी क्षेत्र विशेष के कृषकों का अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध कोई संघर्ष हो। भारतीयों में व्याप्त स्मृति लोप की भयानक बीमारी का इससे सटीक उदाहरण मिलना मुश्किल ही है।