भारत को अफगान में बनने वाली नई तालिबान सरकार के स्वरूप और उसके रुख पर सतर्कता बरतनी होगी


भारत को अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति बनाए रखनी चाहिए।

लोगों को अहसास होने लगा है कि जिस तरह से अफगानिस्तान के सत्तारूढ़ नेता संकट के समय भागे हैं उससे पता चलता है कि वो अफगानिस्तान के हितैषी नहीं हैं और उनके ये निष्कर्ष किसी हद तक उन देशों पर भी चस्पा होते हैं।

लोकमित्र। यह अच्छा हुआ कि भारत ने काबुल मिशन को लेकर अफरातफरी में कोई निर्णय करने के बजाय ‘वेट एंड वाच’ का फैसला किया है। भारत को अफगानिस्तान में बनने वाली नई तालिबान सरकार के स्वरूप और उसके रुख पर सतर्कतापूर्वक निगाह रखकर अपने हितों के अनुकूल फैसला करना चाहिए, न कि अमेरिका और यूरोप की जुगलबंदी का गैरजरूरी हिस्सा बनना चाहिए। अफगानिस्तान में जितने भी देशों के डिप्लोमेटिक मिशन हैं, उनमें से अब तक केवल रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान ने ही अपने दूतावासों को बंद नहीं करने का फैसला किया है। जबकि अमेरिका और लगभग सभी यूरोपीय देशों ने अपने राजनयिक मिशनों को लगभग बंद कर दिया है।

भारत ने भी काबुल में तालिबान के घुसने के बाद वहां अपना दूतावास खाली कर दिया। लेकिन अभी इसे पूरी तरह से बंद नहीं किया गया है। तालिबान को लेकर सतर्क रहना चाहिए, लेकिन उसे दो दशक पुराने चश्मे से देखने की जिद नहीं करनी चाहिए। मौजूदा तालिबान पिछले तालिबान जैसा शायद नहीं है, क्योंकि उसने हमारी सबसे बड़ी आशंका कश्मीर को लेकर दो टूक बयान दिया है कि उसे कश्मीर से कुछ लेना देना नहीं है, यह भारत और पाकिस्तान के बीच का आपसी मसला है।

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देखा जाए तो तालिबान ने जिस अनुरोध के स्वर में भारत से अफगानिस्तान में चल रही अपनी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए कहा है और इसके लिए आम जनता का वास्ता दिया है, उससे साफ पता चलता है कि कबीलाई आक्रामकता के कारण उसने सत्ता भले आसानी से हासिल कर ली हो, लेकिन अफगानिस्तान को नए सिरे से खड़ा करना इतना आसान नहीं है। अगर हमने तालिबान पर अपने अनुमानित निष्कर्षों के आधार पर अफगानिस्तान को पूरी तरह से छोड़ दिया यानी अपने डिप्लोमेटिक मिशन को वहां खत्म कर दिया तो हमारे नुकसान के साथ ही इससे पाकिस्तान को फायदा होगा। वह हमें अफगानिस्तान के भगोड़े नेताओं खासकर राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ जोड़कर दिखाने की कोशिश करेगा, जिनके बारे में कहा जाता है कि वो अफगानिस्तान का बहुत सारा धन लेकर चंपत हो गए हैं। इससे हमारी छवि को ऐतिहासिक धक्का लगेगा।

अफगानिस्तान के बहुत से लोग भागकर भारत आना चाहते हैं और जो भारत में हैं वो भी इस सच्चाई की तस्दीक करते हैं कि भारत और भारतीय लोग अफगानिस्तान के वास्तविक हितैषी हैं। लेकिन एक बार हमने काबुल से भारतीय मिशन को पूरी तरह से बंद कर दिया तो हम अपनी छवि को पाकिस्तान द्वारा मनमानी गढ़ने के लिए छोड़ देंगे। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के अफगानिस्तान से भागते ही न सिर्फ खुद को, बल्कि अफगानिस्तान की पुरानी सरकार व उसके तमाम सहयोगियों को भी सवालिया घेरे में खड़ा कर दिया है। लोगों को अहसास होने लगा है कि जिस तरह से अफगानिस्तान के सत्तारूढ़ नेता संकट के समय भागे हैं, उससे पता चलता है कि वो अफगानिस्तान के हितैषी नहीं हैं और उनके ये निष्कर्ष किसी हद तक उन देशों पर भी चस्पा होते हैं, जो पिछली सरकार को समर्थन कर रहे थे, जिनमें भारत भी एक था।

अब जबकि पिछली सरकार के मुखिया और कई दूसरे नेता अफगानिस्तान को मझधार में छोड़कर भाग गए हैं, ऐसे में भारत का पूरी तरह से अफगानिस्तान को छोड़ देना उन्हीं भगौड़े के पाले में खड़ा करेगा। हमें इस बात को भी ध्यान रखना चाहिए कि अफगानिस्तान समेत एशिया के ज्यादातर मुस्लिम देशों में अमेरिका और यूरोपीय देशों की छवि अच्छी नहीं है, जबकि भारत इन सभी देशों में सम्मान का पात्र है। इसलिए हमें महज अमेरिका के साथ दोस्ती निभाने के लिए अपनी इस ऐतिहासिक छवि का नुकसान नहीं करना चाहिए। साथ ही, पाकिस्तान और चीन के द्वारा भविष्य में भारत को अफगान विरोधी के रूप में दुष्प्रचारित करने से रोकने के लिए भी भारत को अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति बनाए रखनी चाहिए।