अब सर्दी पहले ही बताएगी कि गर्मी कितना सताएगी, भोपाल के विज्ञानियों ने बनाया माडल

 

भोपाल स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइसर)

यह माडल गर्मी के सीजन से ठीक पहले के दिसंबर जनवरी और फरवरी के आंकड़ों का इस्तेमाल कर गर्मी के महीनों में तापमान का पूर्वानुमान करता है। विज्ञानियों ने बहुरेखीय सांख्यिकीय तकनीक का उपयोग कर यह माडल तैयार किया है।

 भोपाल। आने वाली गर्मी ज्यादा सताएगी या कम। लू का स्तर क्या रहेगा। इसकी जानकारी अब गर्मी से ठीक पहले समाप्त हुए सर्दी के मौसम के आधार पर मिल सकेगी। मई और जून की चिलचिलाती धूप के बारे में करीब दो माह पहले ही एक विशेष सांख्यिकीय माडल से जानकारी मिल सकेगी। इसे भोपाल स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइसर) के पृथ्वी एवं पर्यावरणीय विज्ञान विभाग के विज्ञानियों ने बनाया है। इसके माध्यम से गर्मी में तापमान और भारत में विस्तृत जलवायु विसंगितयों का पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा। इसका फायदा यह होगा कि मौसम के दुष्प्रभाव से निपटने की तैयारी की जा सकेगी।

जलवायु विसंगतियों का भी पता लगाकर करेगा आगाह

इस माडल के अध्ययन के परिणाम को हाल ही में अमेरिका के इंटरनेशनल जर्नल आफ क्लाइमेटोलाजी में प्रकाशित किया गया है। केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से इस शोध को पूरा करने में आर्थिक मदद मिली है।

jagran

दिसंबर-जनवरी के आंकड़ों का प्रयोग

यह माडल गर्मी के सीजन से ठीक पहले के दिसंबर, जनवरी और फरवरी के आंकड़ों का इस्तेमाल कर गर्मी के महीनों में तापमान का पूर्वानुमान करता है। विज्ञानियों ने बहुरेखीय सांख्यिकीय तकनीक का उपयोग कर यह माडल तैयार किया है। विज्ञानियों ने पूरे भारत में गर्मी के मौसम के तापमान और सर्दी में समुद्र की सतह के दबाव, हवा, बारिश, अधिकतम, न्यूनतम और औसत तापमान के आंकड़ों का उपयोग कर यह माडल तैयार किया है।

jagran

बदलाव समझना होगा आसान

आइसर के विज्ञानी डा. पंकज कुमार ने बताया कि इस माडल के जरिये मौसम में हो रहे बदलाव को समझना आसान होगा। साथ ही, यह माडल विभिन्न मौसमी पैमानों को समझने में भी मदद करेगा। शोध के दौरान विज्ञानियों ने पाया कि हाल के कुछ साल में गर्मी में तापमान में अपेक्षाकृत वृद्धि देखने को मिली है।

उत्तर व दक्षिण भारत के मौसम का किया आकलन

माडल को विकसित करने के लिए 69 साल के मौसम के आंकड़ों का उपयोग कर किया गया है। इस माडल ने इतने साल के मौसम का लगभग सही अंदाजा लगाया। शोध में शामिल शोधार्थी आदित्य कुमार दुबे ने बताया कि शोध के दौरान मुख्य रूप से दक्षिण और उत्तर भारत के मौसम का आकलन किया गया है। इस अध्ययन का इस्तेमाल अन्य मौसम संबंधी संभावित घटनाओं का पता लगाने के लिए भी किया जा सकता है। इससे निपटने के लिए सरकार पहले से ही उपाय कर सकती है।

उत्तर भारत में कम दिखता बढ़े तापमान का असर

विज्ञानी पंकज कुमार कहते हैं कि उत्तर भारत में गर्मी के दौरान तापमान में हाल के दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका कारण है कि उत्तर भारत में वातावरण में हीट डोम टाइप का एक स्ट्रक्चर बनता है, इसे हवा पार नहीं करती है और अवरुद्ध हो जाती है। एक ब्लाकिंग एरिया भी बनता है। इस कारण उत्तर भारत में तापमान में ज्यादा वृद्धि होती है। हालांकि इस वृद्धि का असर कम महसूस होता है। दक्षिण भारत में तापमान में वृद्धि तो होती है, लेकिन वहां नमी ज्यादा होती है, क्योंकि समुद्र है। इस कारण वहां चिपचपी गर्मी पड़ती है और इसका असर लोगों पर ज्यादा होता है।

यह होगा फायदा

-यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि लू किस तरह से चलेगी।

- संभावित मौसम के अनुसार स्थानीय स्तर पर नीतियां बनाई जा सकेंगी।

-कृषि पर संभावित असर को लेकर नीतियां बनाई जा सकेंगी।

-ज्यादा गर्मी का अनुमान होने पर पेयजल की व्यवस्था उसके अनुसार की जा सकेगी।

इस माडल के जरिये जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को पारिस्थितिकी तंत्र, सामाजिक अर्थव्यवस्था और एक खतरे के तौर पर तेजी से पहचाना जा सकता है। ऐसे में मौसमी बदलाव को समझने और उसका पूर्वानुमान व्यक्त करने में आसानी होगी।

डा. पंकज कुमार, सहायक प्रोफेसर, आइसर

जलवायु परिवर्तन को लेकर शोध होना एक अच्छा प्रयास है। इस तरीके के शोध में ठंड के मौसम के अलावा बरसात के मौसम के कई वर्षों के आंकड़े जुटाकर निष्कर्ष निकाला जाता है।

अजय शुक्ला, पूर्व वरिष्ठ मौसम विज्ञानी, मौसम विज्ञान केंद्र, भोपाल