: जांच समिति ने की थी बसों के रखरखाव का टेंडर रद करने की सिफारिश

 

Delhi Low Floor Bus Purchase Scam: जांच समिति ने की थी बसों के रखरखाव का टेंडर रद करने की सिफारिश

 परिवहन निगम (डीटीसी) की लो-फ्लोर बसों की खरीद व वार्षिक रखरखाव को लेकर भाजपा विधायकों की शिकायत पर गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में बसों के रखरखाव के लिए जारी टेंडर रद करने की सिफारिश की थी।

नई दिल्ली । दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की लो-फ्लोर बसों की खरीद व वार्षिक रखरखाव को लेकर भाजपा विधायकों की शिकायत पर गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में बसों के रखरखाव के लिए जारी टेंडर रद करने की सिफारिश की थी। रिपोर्ट में रखरखाव के लिए जारी टेंडर में नियमों का पालन नहीं किए जाने का हवाला देते हुए इस काम के लिए नए सिरे से टेंडर जारी करने और प्रतिस्पर्धा में ज्यादा कंपनियों को शामिल करने की सलाह दी गई थी। वहीं, जांच समिति ने वारंटी की अवधि में रखरखाव के लिए कंपनियों के भुगतान के दिल्ली सरकार के फैसले को सही ठहराया था।

समिति ने कहा था कि शिकायत बसों के रखरखाव के लिए अनुबंध से संबंधित हैं, इसलिए जांच इसी पर केंद्रित है। रिपोर्ट में कहा गया था कि बसों की खरीद व इसके रखरखाव के अलग-अलग टेंडर पांच माह के अंतराल पर जारी किए गए हैं, लेकिन इसके कारण नहीं बताए गए हैं। साथ ही प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए टेंडर प्रक्रिया में ज्यादा कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया। बोली प्रक्रिया में सिर्फ बस आपूर्ति करने वाली दोनों कंपनियां शामिल हुईं। वार्षिक रखरखाव की न्यूनतम बोली निर्धारित करने की प्रक्रिया का भी दस्तावेजों में उल्लेख नहीं है। इन खामियों को उठाते हुए टेंडर को निरस्त करके फिर से इसे जारी करने को कहा गया था।

हालांकि, वारंटी अवधि में बसों के रखरखाव के लिए भुगतान करने को लेकर भाजपा विधायकों की शिकायत को समिति ने खारिज कर दिया था। उसका कहना था कि नियम के मुताबिक वारंटी की अवधि खत्म होने के बाद रखरखाव का भुगतान किया जाना चाहिए, लेकिन इसमें जरूरत के अनुसार बदलाव संभव है। लो-फ्लोर बस खरीद मामले में वारंटी अवधि के दौरान आपूर्तिकर्ता द्वारा मुख्त रखरखाव व भुगतान वाले काम में अंतर स्पष्ट किया गया है। इसे गलत नहीं कहा जा सकता है।

क्या है मामला

दिल्ली सरकार ने विगत जनवरी माह में 890 करोड़ रुपये में एक हजार लो फ्लोर बसें खरीदने के लिए दो कंपनियों को आर्डर दिए थे। जेबीएम आटो लिमिटेड से सात सौ और टाटा मोटर्स से तीन सौ बसों की आपूर्ति होनी थी। भाजपा का आरोप था कि टेंडर की शर्तों में बदलाव करके इन कंपनियों को बसों की आपूर्ति होने पर पहले दिन से ही इनके रखरखाव के लिए भुगतान किया जाएगा। विधायकों ने इसकी शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) से की थी। सरकार से एसीबी को जांच की अनुमति नहीं मिलने पर भाजपा विधायक विजेंद्र गुप्ता ने उपराज्यपाल से इसकी शिकायत की थी। उपराज्यपाल ने जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति में सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी ओपी अग्रवाल व दिल्ली के प्रधान सतर्कता सचिव एवं प्रधान यातायात सचिव शामिल थे। वहीं, सरकार ने जांच पूरी होने तक बस की खरीद प्रक्रिया रोक दी थी।