बसों की खरीद मामले में राजनीतिक दलों को अपना-अपना पक्ष


Delhi Bus Purchase Case: बसों की खरीद मामले में राजनीतिक दलों को अपना-अपना पक्ष
उपराज्यपाल अनिल बैजल द्वारा गठित समिति ने जांच की थी जिसकी रिपोर्ट में बसों की खरीद के टेंडर में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई थी जबकि रखरखाव को लेकर जारी टेंडर में नियमों का पालन नहीं किए जाने की बात कही गई थी।

नई दिल्ली । दिल्ली में बसों की खरीद में कथित अनियमितता की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआइ) को सौंप दी गई है। इस मामले में भाजपा विधायकों ने बसों की खरीद और रखरखाव के लिए जारी टेंडर में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। उनकी शिकायत पर उपराज्यपाल अनिल बैजल द्वारा गठित समिति ने जांच की थी, जिसकी रिपोर्ट में बसों की खरीद के टेंडर में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई थी, जबकि रखरखाव को लेकर जारी टेंडर में नियमों का पालन नहीं किए जाने की बात कही गई थी। साथ ही यह सिफारिश भी की गई थी कि इस टेंडर को रद कर नए सिरे से टेंडर जारी किया जाए और प्रतिस्पर्धा में ज्यादा संख्या में कंपनियों को शामिल किया जाए। जांच समिति ने इसके साथ ही वारंटी की अवधि में रखरखाव के लिए कंपनियों को भुगतान संबंधी भाजपा विधायकों की आपत्ति को दरकिनार करते हुए दिल्ली सरकार के फैसले को सही ठहराया था।

दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के बेड़े में बसों की कमी विगत कई वर्षों से बनी हुई है। दिल्ली सरकार ने जनवरी में एक हजार लो-फ्लोर बसों की खरीद के लिए दो कंपनियों को आर्डर दिया गया था, लेकिन भाजपा विधायकों के आरोपों के बाद खरीद पर रोक लगा दी थी। यदि किसी मामले में आरोप लगे हैं तो उनकी जांच की जानी चाहिए, ताकि आरोपों की पड़ताल कर दूध का दूध और पानी का पानी किया जा सके।

उपराज्यपाल  अनिल बैजल द्वारा गठित जांच समिति ने इस मामले में किसी वित्तीय अनियमितता का जिक्र किए बिना मात्र रखरखाव से जुड़ा टेंडर नए सिरे से जारी करने की सिफारिश की थी। यह दर्शाता है कि उसकी जांच में कोई गंभीर बात सामने नहीं आई। ऐसे में अब सीबीआइ जांच में क्या सामने आएगा, ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इस बीच बसों की खरीद की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू कर बसें जल्द से जल्द लाई जानी चाहिए, ताकि जांच इत्यादि के कारण विलंब न हो और दिल्लीवासियों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।