सोवियत संघ की वापसी के बाद पांव पसारने लगा था तालिबान, जानिए- अफगानिस्‍तान में अमेरिका की भूमिका

 


तालिबान के पांच साल के शासनकाल में शरिया कानून के नाम पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए ग
अमेरिकी समर्थन प्राप्त मुजाहिदीन के लड़ाकों ने 1994 में तालिबान को खड़ा किया दो वर्षों में ही आतंकी संगठन काबिज हो गया था सत्ता में 2001 में अमेरिका ने ही खदेड़ा। आतंकियों का पनाहगार पाकिस्तान समेत कुल चार देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता दी थी।

नई दिल्ली, रायटर। अफगानिस्तानी सेना को पीछे धकेल विभिन्न प्रांतों पर काबिज होते हुए आतंकी संगठन तालिबान रविवार को राजधानी काबुल में प्रवेश कर गया। तालिबान ने सोमवार को घोषित कर दिया कि युद्ध खत्‍म हो चुका है और उसने देश पर कब्‍जा कर लिया है। पश्तो भाषा में तालिबान का अर्थ होता है- छात्र। वर्ष 1994 में यह आतंकी संगठन दक्षिणी अफगानिस्तान के कंधार में पनपने लगा था।

यह वो दौर था, जब सोवियत संघ की वापसी के बाद सरकार गिर चुकी थी और गृहयुद्ध की शुरुआत हो चुका था। अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जे के लिए चरमपंथी गुटों का संघर्ष जारी था और इन्हीं में से एक था तालिबान।

तालिबान वास्तव में मुजाहिदीन लड़ाकों का ही एक समूह है, जिसे 1980 के आसपास सोवियत बलों को खदेड़ने के लिए अमेरिका ने खड़ा किया था। सिर्फ दो वर्षों में तालिबान ने लगभग पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा करते हुए वर्ष 1996 में उसे इस्लामिक अमीरात घोषित कर दिया।

9/11 के हमले के बाद वापस लौटी अमेरिकी सेना

11 सितंबर, 2001 को अल कायदा ने अमेरिका में हमला कर दिया। इसके बाद अमेरिकी सेना उत्तर की तरफ से अफगानिस्तान में दाखिल हुई और हवाई हमलों का सहारा लेती हुई नवंबर में काबुल पहुंच गई। तालिबानी आतंकी ग्रामीण क्षेत्र में छुप गए और करीब 20 वर्षो तक अफगानिस्तानी सरकार व पश्चिमी सहयोगियों के खिलाफ आतंकी वारदातों को अंजाम देते रहे। तालिबान के कमजोर पड़ने के साथ ही उसकी नींव डालने वाला सरगना मुल्ला मुहम्मद उमर भी छिप गया। उसके ठिकानों के बारे में बेहद गोपनीयता बरती जाती थी। यहां तक कि उसकी मौत के बारे में उसके बेटे ने दो साल बाद वर्ष 2013 में पुष्टि की थी।

अराजक रहा है तालिबान का शासनकाल

तालिबान के पांच साल के शासनकाल में शरिया कानून के नाम पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए गए। महिलाओं को शिक्षा व काम करने से पूरी तरह मनाही थी। यहां तक कि वे घर से भी तभी बाहर आ सकती थीं, जब कोई पुरुष सदस्य उनके साथ होता। सार्वजनिक सुनवाई और सजा देना आम हो गया था। पश्चिम फिल्में व किताबें प्रतिबंधित कर दी गईं। सांस्कृतिक कलाकृतियों को ईश निंदा का प्रतीक मानते हुए क्रूरता के साथ नष्ट कर दिया गया। तालिबान का विरोध करने वालों और पश्चिमी देशों का आरोप है कि वह फिर अफगानिस्तान में उसी तरह का शासन कायम करना चाहता है। इस पर तालिबान ने साल की शुरुआत में कहा था कि वह ‘वास्तविक इस्लामिक प्रणाली’ की स्थापना चाहता है, जिसमें महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए प्रविधान होंगे। हालांकि, इस आशय के संकेत मिले हैं कि तालिबान ने कुछ इलाकों में महिलाओं के काम करने पर प्रतिबंध लगा चुका है।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता

आतंकियों का पनाहगार पाकिस्तान समेत कुल चार देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता दी थी। अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान पर प्रतिबंध लगा रखे हैं, जबकि ज्यादातर देशों ने बहुत ही हल्के संकेत दिए हैं कि वे राजनयिक रूप से संगठन को मान्यता देंगे। एक महीने पहले अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन कह चुके हैं कि अगर तालिबान सत्ता में आता है तो अफगानिस्तान की मान्यता खारिज होने का खतरा पैदा हो जाएगा। चीन ने बहुत ही सावधानी के साथ संकेत देना शुरू किया है कि वह तालिबान के विधिसम्मत शासन को मान्यता दे सकता है।