कोरोना काल में अनेक परिस्थितिजन्य कारणों से लोगों में बढ़ रहा मानसिक तनाव


कोरोना काल में अनेक परिस्थितिजन्य कारणों से लोगों में बढ़ रहा मानसिक तनाव। प्रतीकात्मक
प्राकृतिक आपदा महामारी की वजह से जन्मी दिक्कतें व उनके जख्म बहुत लंबे वक्त तक इंसान समाज को परेशान करते रहते हैं। सरकारें भी कई तरह की दिक्कतों का सामना करती हैं पर उसमें मनोविज्ञानी पहलू शामिल नहीं होता।

 पिछले वर्ष मार्च में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड को महामारी घोषित किया था और इस महामारी से संक्रमित होने वालों और मृतकों की संख्या का ब्योरा रोजाना पढ़ने व सुनने को मिलता रहा है। मगर इस महामारी में एक और बीमारी अंतर्निहित है- मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं। विडंबना यह है कि उसके बारे में विस्तार से आंकड़े आम जन तक नहीं पहुंचाए जा रहे। कोरोना काल में मानसिक तनाव के दायरे में कोविड के सक्रिय मरीज, इससे ठीक हो चुके लोग, गर्भवती महिलाएं, युवा, बुजुर्ग, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, फ्रंटलाइन कार्यकर्ता आदि भी शामिल हैं। इस महामारी की वजह से पैदा अवसाद और चिंता का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ रहा है।

महामारियों का इतिहास भी यही बताता है कि वह इंसान के मानसिक स्वास्थ्य को कई तरह से प्रभावित करती है। उसके अल्पकालिक व दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं। कोविड संक्रमण की रोकथाम के लिए लगाई गई तालाबंदी, सामाजिक दूरी, घर से दफ्तर का काम, स्कूल-कालेज का बंद होना, महानगरों से पलायन, आíथक अनिश्चितता, 24 घंटे घरों में रहना, रिश्तेदारों से नहीं मिल पाना आदि कारणों ने मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित किया है।

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मानसिक स्वास्थ्य के साथ हमारे देश में विडंबना यह भी है कि इसके तहत अवसाद, चिंता, परेशानी, तनाव आदि आते हैं, जिन पर अक्सर इंसान, परिवार, समाज बात ही नहीं करना चाहता। समाज इसे एक स्टिग्मा यानी कलंक के तौर पर देखता है और इसे बीमारी के तौर पर स्वीकार करने को राजी नहीं होता। बहरहाल कोरोना काल में मानसिक स्वास्थ्य के कई पहलुओं पर बहस छिड़ गई है और समाज के भीतर इस बाबत जागरूकता फैलाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। हाल ही में एक प्रतिष्ठित स्वास्थ्य पत्रिका में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना काल के दौरान युवाओं में मानसिक परेशानियां दोगुनी हो गईं। महामारी से पहले 10 में से केवल एक युवा में अवसाद व चिंता के लक्षण मिले थे, लेकिन इस महामारी में हर चार युवा में से एक को अवसाद का सामना करना पड़ा तो हर पांच में से एक युवा चिंता और चिड़चिड़ेपन का शिकार हुआ। महामारी का किशोरों के व्यवहार व मानसिक स्वास्थ्य पर अल्पकालिक व दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। कोशिश उन्हें बेहतर परामर्श व इलाज संबंधी सेवाएं प्रदान करने की होनी चाहिए।

भविष्य में ऐसे संकट से निपटने के वास्ते जिस तरह अस्पतालों में सेवाओं का विस्तार व उनकी गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार योजनाएं बना रही है, उसी तरह लोगों की मानसिक सेहत से संबंधित मौजूदा ढांचे को मजबूत करने व नए ढांचे को खड़ा करने की भी दरकार है। वैसे तो भारत सरकार ने 10 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति लागू की थी। इसका उद्देश्य मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों को मानसिक सेवाएं मुहैया कराना है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रलय ने बीते साल देशभर में लाकडाउन की घोषणा के एक हफ्ते के अंदर ही यानी 29 मार्च 2020 को ही लोगों को मनोवैज्ञानिक व सामाजिक मदद मुहैया कराने के लिए एक हेल्प लाइन नंबर जारी कर यह संदेश दिया कि उसे अपनी जनता के मानसिक स्वास्थ्य की भी फिक्र है। एक ऐसा प्रयास किया जिसकी इस महामारी में बहुत जरूरत है, लेकिन इस हेल्पलाइन का अधिक प्रसार नजर नहीं आता। इस मुददे पर काम करने वाले तमाम संगठनों को मिलकर इस बाबत काम करना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इस हेल्पलाइन के बारे में पता चल सके। स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रलय इंटरनेट मीडिया पर वैक्सीन वार्ता सरीखे जानकारी से भरपूर वीडियो अपलोड करता है, ताकि लोगों के पास सही जानकारी पहुंचे, वे अफवाहों से दूर रहें और खुद को कोविड से सुरक्षित रखें। ये प्रयास भी सराहनीय हैं।आज भी सरकार के सामने कोविड टीकाकरण को लेकर ङिाझक एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, खासकर आदिवासियों के बीच। विभिन्न आदिवासी समूहों में टीकाकरण बाबत कई आशंकाएं हैं और इसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। वे टीकाकरण से दूर भाग रहे हैं। इस संदर्भ में हाल ही में यूनिसेफ और दिल्ली विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभाग ने एक पहल की है जिसके तहत आदिवासी आबादी के अंदर टीकाकरण को लेकर ङिाझक की मानवशास्त्रीय पहलू से शोध पर काम शुरू हो गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के उप कुलपति डा. पीसी जोशी का मानना है कि इस संबंध में आदिवासियों की ङिाझक को अड़ियल रुख नहीं कहना चाहिए। हो सकता है उनकी इस प्रतिक्रिया में कोई आस्था अंतíनहित हो, कोई मिथ्या धारणा भी हो सकती है। मानवशास्त्र विभाग यह सब समझने में मदद कर सकता है।

दरअसल प्राकृतिक आपदा, महामारी की वजह से जन्मी दिक्कतें व उनके जख्म बहुत लंबे वक्त तक इंसान, समाज को परेशान करते रहते हैं। सरकारें भी कई तरह की दिक्कतों का सामना करती हैं, पर उसमें मनोविज्ञानी पहलू शामिल नहीं होता। लेकिन भुक्तभोगी, उसके करीबी व समाज पर मनोविज्ञान संबंधी असर पड़ता है। सरकार को जरूरतमंद लोगों के मानसिक पुनर्वास के सक्षम योजना बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से जारी महामारी के दौर में परिस्थितिजन्य कारणों से मानसिक स्वास्थ्य की समस्या बढ़ती जा रही है जिसे समझने और समाधान करने की जरूरत है।