बैंक खातों में विश्व कीर्तिमान, फिर भी सूदखोरों से निजात नहीं, एनएसएस सर्वे- 17.1 फीसद ग्रामीण घरों पर था कर्ज का बोझ

 

सूदखोरों से किसानों और ग्रामीण जनता को मुक्ति दिलाने के उपायों का कुछ खास नतीजा नहीं निकल पाया है।
भले ही वर्ष 2013 से 2019 के दौरान देशभर में बैंक खाता खोलने की संख्या तकरीबन दोगुनी हो गई हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सूदखोरों रिश्तेदारों- दोस्तों चिट फंड आदि से कर्ज लेने वालों की संख्या इस दौरान 19 फीसद से घट कर महज 17.1 फीसद हो पाई है।

 नई दिल्ली। सूदखोरों से किसानों और ग्रामीण जनता को मुक्ति दिलाने के लिए सरकार ने क्या कुछ उपाय नहीं किया लेकिन ऐसा लगता है कि हाल के वर्षों तक इनका कुछ खास नतीजा नहीं निकला है। वर्ष 2013 से 2019 के दौरान देशभर में बैंक खाता खोलने की संख्या तकरीबन दोगुनी हो गई, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सूदखोरों, रिश्तेदारों- दोस्तों, चिट फंड आदि से कर्ज लेने वालों की संख्या इस दौरान 19 फीसद से घट कर महज 17.1 फीसद हो पाई।

इन्‍होंने ने लिया ज्यादा ब्याज पर कर्ज

सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी तकरीबन 8 फीसद घर ऐसे हैं, जिन्होंने 2019 में बहुत ज्यादा ब्याज पर कर्ज देने वाले लोगों से कर्ज ले रखा था। पिछले शनिवार को भारत सरकार की तरफ से जारी अखिल भारतीय ऋण व निवेश सर्वेक्षण-2019 में यह बात सामने आई है।

कर्ज वितरण में सुधार नहीं

एनएसएस का सर्वे साफ तौर पर बताता है कि बड़ी संख्या में बैंक खाता खोलने के बावजूद संस्थागत एजेंसियों से कर्ज वितरण की स्थिति में बहुत सुधार नहीं आया है। सबसे कम दिनों में सबसे ज्यादा बैंक खाता खोलने का भारत के नाम विश्व रिकार्ड है। केंद्र सरकार का मौजूदा आंकड़ा बताता है कि 15 अगस्त, 2014 में लांच की गई प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत जून 2021 तक कुल 42.44 करोड़ बैंक खाते खोले गए।

ऐसे बढ़ते गए बैंक खाते 

राजग से पहले संप्रग सरकार इसी योजना को जीरो बैलेंस बैंक खाता योजना के नाम से चला रही थी। आरबीआइ के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2013 में जीरो बैलेंस बैंक खाता योजना के तहत 18 करोड़ खाते खोले गए थे। जनवरी 2019 में जन धन योजना के तहत खोले गए बैंक खातों की संख्या 34.03 करोड़ थी। यानी मार्च 2013 से जनवरी 2019 के बीच कुल 16 करोड़ नए खाते खोले गए, यानी तकरीबन 90 फीसद का इजाफा हुआ।

सूदखोरों के जाल से बचाने में मामूली सुधार  

इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्र में गैर संस्थागत क्षेत्रों (सूदखोर, दोस्त, रिश्तेदार आदि) से कर्ज लेने वाले परिवारों का हिस्सा 19 फीसद से घट कर 17.1 फीसद हुआ है। शहरी क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 10.3 फीसद से घट कर 7.9 फीसद हुई है। यानी इतनी बड़ी संख्या में बैंक खाता खोलने के बावजूद सूदखोरों व दूसरे गैर संस्थानों से कर्ज ले कर काम चलाने वाले परिवारों में दो से ढाई फीसद की ही कमी हुई है।

...ताकि सूदखोरों के चंगुल में नहीं फंसें

जन धन खाता खोलने को लेकर बार-बार बताया गया है कि इसका एक बड़ा मकसद लोगों को संस्थागत बैंकिंग सुविधा से जोड़ना है ताकि वे ज्यादा ब्याज वसूलने वाले सूदखोरों के चंगुल में नहीं फंसें। रिपोर्ट बताती है कि सूदखोरों के साथ ही आम जनता अब भी संबंधियों या दोस्तों से कर्ज लेने को ज्यादा महत्व दे रही है।

ग्रामीण क्षेत्रों का हाल 

ग्रामीण क्षेत्र के 6.2 फीसद परिवारों पर अपने रिश्तेदारों या मित्रों का कर्ज है। शहरी क्षेत्र में 3.2 फीसद परिवारों ने मित्रों से कर्ज ले रखा है। इसी तरह से बहुत ज्यादा ब्याज पर कर्ज देने वाले प्रोफेशनल मनीलेंडर्स से भी काफी संख्या में लोगों ने कर्ज ले रखा है।

क्‍या कहते हैं आंकड़े 

साल 2019 में ग्रामीण क्षेत्रों में 24.8 फीसद परिवारों ने संस्थागत क्षेत्रों (बैंक, सहकारी समितियों, बीमा कंपनियों, पीएफ, एनबीएफसी, एसएचजी आदि) से कर्ज ले रखा था, जबकि शहरी क्षेत्रों में इनसे कर्ज लेने वाले 17.5 फीसद हैं। देश में कर्ज की स्थिति पर यह सर्वे छह वर्षों बाद किया गया है। इसके पहले का सर्वे वर्ष 2013 का है। इस पुराने सर्वे के मुताबिक तब ग्रामीण क्षेत्र के 17.2 फीसद परिवारों पर संस्थागत क्षेत्र का और 14.8 फीसद शहरी क्षेत्र के परिवारों पर इनका कर्ज है।