चांद की गुत्थियां सुलझा रहा है चंद्रयान-2 का आर्बिटर, खींची चांद की अब तक की सबसे अच्छी तस्वीर

 

चंद्रयान-2 को मंगल की कक्षा में पहुंचे दो साल से ज्यादा हो गया है।
इसरो ने बताया कि क्लास पेलोड की मदद से चांद की सतह पर क्रोमियम और मैगनीज के होने के प्रमाण मिले हैं। एक्सएसएम पेलोड ने कोरोनल हीटिंग को समझने में मदद की है। आइआइआरएस ने चांद की सतह पर हाइड्रोक्सिल और वाटर-आइस की मौजूदगी का स्पष्ट प्रमाण जुटाया है।

नई दिल्ली, पेट्र। भारत के चंद्रयान-2 को मंगल की कक्षा में पहुंचे दो साल से ज्यादा हो गया है। इस दौरान आर्बिटर में लगे पेलोड (वैज्ञानिक उपकरण) लगातार चांद की अहम जानकारियां जुटा रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने हाल में दो दिवसीय वर्कशाप में दो साल की इसकी उपलब्धियों की जानकारी दी।

 खींची है चांद की सबसे अच्छी तस्वीर

इसरो ने बताया है कि चंद्रयान-2 ने ओएचआरसी के जरिये 100 किलोमीटर की दूरी से 25 सेमी के रेजोल्यूशन पर चांद की अब तक की सबसे अच्छी तस्वीर खींची है। इसी तरह टीएमसी-2 की मदद से चांद की सतह की कई अहम जानकारियां मिल रही हैं।

कुछ अहम जानकारियां

इसरो ने बताया कि क्लास पेलोड की मदद से चांद की सतह पर क्रोमियम और मैगनीज के होने के प्रमाण मिले हैं। एक्सएसएम पेलोड ने कोरोनल हीटिंग को समझने में मदद की है। आइआइआरएस ने चांद की सतह पर हाइड्रोक्सिल और वाटर-आइस की मौजूदगी का स्पष्ट प्रमाण जुटाया है। इसी तरह, डीएफएसएआर ने सब-सर्फेस वाटर आइस के संकेत जुटाए हैं।

भेजे गए थे आठ पेलोड

- चंद्रयान-2 लार्ज एरिया साफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (क्लास)

- सोलर एक्स-रे मानीटर (एक्सएसएम)

- चंद्र एटमास्फेरिक कंपोजिशनल एक्सप्लोरर 2 (चेस-2)

- डुअल फ्रिक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (डीएफएसएआर)

- इमेजिंग इन्फ्रा-रेड स्पेक्ट्रोमीटर (आइआइआरएस)

- टेरैन मैपिंग कैमरा (टीएमसी 2)

- आर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा (ओएचआरसी)

- डुअल फ्रिक्वेंसी रेडियो साइंस (डीएफआरएस)

 दो साल पहले हुआ था लांच

चंद्रयान-2 को 22 जुलाई, 2019 को लांच किया गया था। 20 अगस्त को इसने चांद की कक्षा में प्रवेश किया था। दो सितंबर को आर्बिटर और लैंडर अलग हुए थे। सात सितंबर को लैंडर की चांद पर साफ्ट लैंडिंग होनी थी, लेकिन आखिरी क्षणों में यह क्रैश हो गया था। आर्बिटर तय प्रक्रिया के तहत अध्ययन कर रहा है। इसे एक साल तक चांद का चक्कर काटने और विधिवत तरीके से काम करते रहने के लिए तैयार किया गया था। बाद में इसरो ने बताया कि यह सात साल तक काम करेगा।