आबादी के बढ़ते दबाव और प र्यावरण असंतुलन से सिकुड़ते जंगल के चलते सुंदरवन में बढ़ रहे बाघों के हमले

 

बाघों को इस वन का रक्षक भी कहा जाता है।

सुंदरवन को भले ही एक ऐसे स्थल के रूप में जाना जाता हो जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है लेकिन स्थानीय निवासियों को यहां बाघों से जुड़ी त्रासदियों का सामना करना पड़ता है। इंटरनेट मीडिया

कोलकाता।यूनेस्को की विश्व धरोहरों में शुमार सुंदरवन में बीते सप्ताह दो लोगों पर बाघों ने हमले किए, जिनमें से एक की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। इस क्षेत्र में रायल बंगाल टाइगर के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। बंगाल और पड़ोसी बांग्लादेश तक करीब 10 हजार वर्ग किमी में यह दलदली (मैंग्रोव) जंगल फैला है, जिसमें 4,262 वर्ग किमी क्षेत्र भारत में है। सुंदरवन बाघों के अलावा अपनी जैविक विविधताओं के लिए भी पूरी दुनिया में मशहूर है। बाघों को इस वन का रक्षक भी कहा जाता है, लेकिन सिमटते क्षेत्र और बढ़ती संख्या (2018-19 में यहां बाघों की संख्या 111 थी, जो 134 हो गई है), घटते शिकार और बढ़ते जलस्तर से रक्षक को अब परेशानी होने लगी है। इसका नतीजा हमले के रूप में सामने आ रहा है।

सुंदरवन में कुल 102 द्वीप हैं। इनमें से 54 पर आबादी है। आबादी के बढ़ते दबाव और पर्यावरण असंतुलन से सिकुड़ते जंगल के चलते सुंदरवन से सटी विभिन्न बस्तियों के लोगों को बाघों का शिकार होना पड़ रहा है। दूसरी ओर बाघों के जंगलों से निकलकर बस्तियों में आने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सुंदरवन में हर साल 40 से 45 लोग बाघों के शिकार हो रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार यह संख्या 100 से भी ज्यादा है।

दरअसल वन विभाग हर साल करीब 50 लोगों को ही सुंदरवन में शहद इकट्ठा करने और मछलियां आदि पकड़ने की अनुमति देता है, लेकिन अवैध रूप से सैकड़ों लोग इन जंगलों में चले जाते हैं। अधिकारियों के मुताबिक बाघों के हमले की अधिकांश मामलों में रिपोर्ट ही नहीं दर्ज कराई जाती। इसलिए हमले का सही आंकड़ा बताना मुश्किल है। वन विभाग की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने पिछले वर्ष अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सुंदरवन से सटी बंगाल की खाड़ी का जलस्तर और पानी में खारापन बढ़ने, शिकार की जगह कम होने और पसंदीदा भोजन नहीं मिलने की वजह से बाघ शिकार की तलाश में गांवों का रुख करने लगे हैं।

सुंदरवन के जिस इलाके में बाघ रहते हैं, वहां पानी का खारापन बीते एक दशक में 15 फीसद बढ़ गया है, इसलिए बाघ बस्तियों में पहुंचने लगे हैं। इन क्षेत्रों में रहने वालों का कहना है कि बाघों का निवाला बनना उनकी नियति बन चुकी है, क्योंकि घर में बैठे रहेंगे तो भूखे मरेंगे और जंगल में जाएंगे तो बाघों का निवाला बनेंगे। ऐसे में इन लोगों को बचाने के लिए केंद्र व राज्य सरकार को ठोस कदम उठाना होगा और इनकी आजीविका के लिए वैकल्पिक प्रबंध करने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में हालात और बदतर हो जाएंगे।

पिछले शनिवार को सुंदरवन के झीला जंगल में तीन मछुआरों का दल गया था, तभी एक बाघ ने अचानक हमला कर दिया। जब तक किसी को कुछ समझ में आता, बाघ दारिक मंडल नामक एक मछुआरे को खींचकर ले गया। उसके दोनों साथी कुछ नहीं कर पाए। उसके शव की तलाश की जा रही है। इससे एक दिन पहले भी इस इलाके में एक मछुआरे पर बाघ ने हमला किया। हालांकि सुदर्शन सरदार नामक मछुआरे का भाग्य अच्छा था कि उसके साथ गए अन्य मछुआरों ने बाघ के साथ लड़कर उसे बचा लिया।

ये दोनों घटनाएं इसीलिए सामने आईं, क्योंकि मछुआरों के दोनों दल वन विभाग से अनुमति लेकर जंगल में गए थे। अगर चोरी से गए होते तो कुछ पता नहीं चलता जैसा कि अतुल सरदार के साथ हुआ। दरअसल अतुल कुछ दिनों पहले जंगल में गया था, जहां वह बाघ के हमले में मारा गया। लिहाजा उसके भाई और उसके दोस्तों ने उसे वहीं जंगल में ही दफना दिया। यदि जंगल से उसकी क्षत-विक्षत लाश लेकर आते और चिता जलाकर अंतिम संस्कार करते तो वन विभाग को पता चल जाता। ऐसे में इन लोगों को पकड़ लिया जाता। बाघ के हमले में मरे व्यक्ति का शव जलाने पर इनलोगों को जेल जाना पड़ता। इसलिए कानूनी पचड़े से बचने के लिए चोरी से वन में जाकर बाघ के हमले में मरने वाले का शव उसी जंगल में चुपके से दफन कर दिया जाता है। यह सिर्फ अतुल की कहानी नहीं है। सुंदरवन से सटे गांवों में ऐसे कई मिल जाएंगे, जिन्हें अपनों की मौत का मातम चुपचाप मनाने को विवश होना पड़ा है।