महात्मा गांधी ने दी राष्ट्रभाषा की संकल्पना: अनिल जोशी

 

हिंदी के स्वाभिमान से स्वाधीनता का स्वप्न विषय पर आयोजित सत्र
आज हम राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी की जो संकल्पना कर पा रहे हैं उसके लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पूरा श्रेय देते हुए केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के उपाध्यक्ष अनिल जोशी ने कहा कि गांधी जी ने इसका विचार 1918 में इंदौर में आयोजित साहित्य सम्मेलन में रखा था

 नई दिल्ली,  संवाददाता। आज हम राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी की जो संकल्पना कर पा रहे हैं, उसके लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पूरा श्रेय देते हुए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष अनिल जोशी ने कहा कि गांधी जी ने इसका विचार वर्ष 1918 में इंदौर में आयोजित साहित्य सम्मेलन में रखा था। उस समय कांग्रेस पार्टी ऐसे लोगों का संगठन था, जिनका अंग्रेजी पर अधिक जोर था, लेकिन गांधी जी को लगा कि अगर दलितों, मजदूरों और किसानों की बात करनी है और स्वाधीनता के आंदोलन से जन-जन को जोड़ना है तो ऐसी एक भाषा की आवश्यकता है, जो सभी को जोड़ सके और यह सिर्फ हिंदी हो सकती है।

‘हिंदी के स्वाभिमान से स्वाधीनता का स्वप्न’ विषय पर वक्ताओं ने रखे विचार

अनिल जोशी ‘हिंदी के स्वाभिमान से स्वाधीनता का स्वप्न'' विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित कर रहे थे। इसमें आइआइएम रोहतक के निदेशक प्रो. धीरज शर्मा व राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के निदेशक युवराज मलिक ने भी अपने विचार रखे। परिचर्चा का संचालन साहित्यकार एवं राष्ट्रीय संग्रहालय की सहायक निदेशक (राजभाषा) अल्का सिन्हा ने किया।

बातचीत के क्रम को आगे बढ़ाते हुए जोशी ने कहा कि गांधी जी ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के लिए न सिर्फ विचार रखे, बल्कि उस दिशा में गंभीरता से कदम भी उठाए। उन्होंने अपने बेटे देवदास गांधी को तत्कालीन मद्रास में सी. राजगोपालाचारी के यहां हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भेजा। किसी एक भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि नार्वे, हालैंड व स्वीडन जैसे देशों की बात होती तो इसका जवाब सरलता से दिया जा सकता है, पर अपने देश में इसका जवाब जटिल है। इसपर सोच समझकर ही विमर्श रखना होगा।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अपनी भाषा में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई के निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि चिकित्सा और इंजीनियरिंग की पढ़ाई अंग्रेजी की जगह अपनी भाषा में कराने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। 14 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई शुरू हो चुकी है, लेकिन यहां तक पहुंचने में 75 वर्ष अवश्य लग गए।

आइआइएम, रोहतक के निदेशक प्रो. धीरज शर्मा की पुस्तक का भी हुआ विमोचन

हिंदी भाषा के विकास में फिल्मों के योगदान के सवाल पर प्रो. धीरज शर्मा ने कहा कि 70-80 के दशक तक भारतीय संस्कृति और हिंदी को बढ़ाने में फिल्मों का योगदान था, लेकिन बीते 30 वर्षों में स्थिति बिगड़ी है। यही नहीं, हिंदी व भारतीय संस्कृति के साथ ही सिखों को भी हेय दृष्टि से देखा गया और उनका मजाक ही उड़ाया जा रहा है। यह स्थिति तब है, जबकि क्रिकेट के साथ ही सिनेमा पूरे देश को एक सूत्र में बांधने का सशक्त माध्यम है।

फिल्मों का भारतीय जनमानस पर गहरा असर पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो फिल्मों पर प्रतिबंध नहीं लगते और रीलें नहीं जलानी पड़तीं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में दूसरी भाषाओं को थोपने का जिक्र करते हुए कहा कि देश का कोई भी एक ऐसा जिला नहीं है, जहां उर्दू बड़ा प्रभाव रखती हो। यहां तक कि जिस उत्तर प्रदेश से वह आते हैं, वहां का मुस्लिम समाज भोजपुरी, अवधी, ब्रज जैसी लोक बोली बोलता है, लेकिन फिल्मों में उर्दू को थोपा जा रहा है।

उन्होंने फिल्मों को देश का एंबेस्डर बताते हुए कहा कि आज भी यूरोप, अमेरिका, रूस व खाड़ी देशों समेत दुनिया के कई स्थानों में भारत की बड़ी पहचान फिल्मों से है, लेकिन सच तो यह है कि भारतीय संस्कृति और भाषा को बढ़ावा देने में हिंदी फिल्म जगत जो कर सकता था, वह उसने नहीं किया।

युवराज मलिक ने कहा कि जब कोई आक्रांता किसी देश पर हमला करता है तो सबसे पहले उसकी भाषा और संस्कृति पर हमला करता है। दो फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में भारत के लिए शिक्षा कानून का मसौदा रखते हुए मैकाले ने तीन नीति रखी थीं। विचारों की रीढ़ को तोड़ें। हीन भावना पैदा करें और अंग्रेजी को सर्वश्रेष्ठ बताएं। यही स्थिति आज भी है। राजनीतिक रूप से देश आजाद तो हो गया, लेकिन भाषा के रूप में अब भी गुलाम है। यह भी एक तथ्य है कि आजादी के बाद देश के नाम पहला भाषण अंग्रेजी में ही था।

अंग्रेजी को एक प्रतिभा के तौर पर ले सकते हैं, लेकिन यह अपरिहार्य नहीं है। मेरे लिए मेरी अभिव्यक्ति मातृ भाषा में पैदा होती है। हिंदी भारत माता के माथे की बिंदी है। उन्होंने कहा कि अपने विचार हमें अपनी भाषा में रखने होंगे। तभी वे राष्ट्रीय विचार होंगे और तभी राष्ट्र के अंदर आत्मीयता की भावना आएगी।

अल्का सिन्हा ने भाषा के साथ खिलवाड़ करने वालों को दंड देने की पैरोकारी करते हुए कहा कि जब कोई लाल बत्ती तोड़ता है तो चालान कटता है, लेकिन कोई भाषा के नियमों को तोड़ता है तो उसमें कोई दंड नहीं है। इसपर विचार होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने एक देश-एक भाषा की मांग जोरदार तरीके से रखते हुए कहा कि जब देश का एक पक्षी और एक पुष्प तय है तो एक भाषा क्यों नहीं है। कार्यक्रम में प्रो. धीरज शर्मा की पुस्तक ‘फिल्में और संस्कृति’ का विमोचन भी किया गया। अंत  एसोसिएट एडिटर अनंत विजय ने धन्यवाद ज्ञापित किया।