रामानुज प्रसाद सिंह के बारे में, उन्हें माना जाता था समाचारों का पितामह


जानिये- रामानुज प्रसाद सिंह के बारे में, उन्हें माना जाता था समाचारों का पितामह
रेडियो पर कान लगाए आठ बजे इस समाचार वाचक को सुनना किसे याद नहीं होगा। रामानुज प्रसाद सिंह समाचार वाचक कैडर के चार स्तंभों जिन्हें समाचारों का पितामह माना जाता है देवकीनंद पांडे अशोक वाजपेयी विनोद कश्यप में से एक थे।

नई दिल्ली ।  ‘ये आकाशवाणी है, अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए...।’ नाम के उच्चारण के स्वर के उस आरोह से ही उनकी व्यक्तित्व की ऊंचाई का भान होता था। रेडियो पर कान लगाए आठ बजे इस समाचार वाचक को सुनना किसे याद नहीं होगा। रामानुज प्रसाद सिंह समाचार वाचक कैडर के चार स्तंभों, जिन्हें समाचारों का पितामह माना जाता है, देवकीनंद पांडे, अशोक वाजपेयी, विनोद कश्यप में से एक थे। मुझे याद है कि जब मैं 1979 में दिल्ली आया तो समाचार में दो वर्ग थे। एक समाचार वाचक थे और दूसरे अनुवादक और संपादन का काम करते थे। मैं इसी दूसरे दूसरे वर्ग में था। इन चारों के अलावा कोई वाचक नहीं था। मैंने उनके साथ लगभग पच्चीस साल तक काम किया है। मैं बिल्कुल युवा था, मेरे पास तजुर्बे के नाम पर कुछ भी नहीं था। ऐसे दिग्गज के साथ काम करने अपने आप में सपनों को जीना था। मेरा उनके साथ वास्ता तब ज्यादा पड़ता था जब मैं किसी भी बुलेटिन का संपादन करता था। मेरा बनाया हुआ संपादित और संकलित किया हुआ बुलेटिन वे स्टूडियो में जाकर पढ़ते थे और मैं उनके साथ जाता था।

 उनके बाद फिर कभी आल इंडिया रेडियो में समाचार वाचकों की भर्ती नहीं हुई। वे सामाचार वर्ग के अंतिम स्तंभ थे। उनके सेवानिवृत होने के बाद आकाशवाणी के रेडियो समाचार वाचन का दौर समाप्त हो गया। मेरे लिए वे पिता के समान थे। उसी तरह का स्नेह रखते थे, सिखाते थे और मार्गदर्शन करते थे। मैंने वहां जाकर देखा कि उनकी आवाज की तरह ही उनके व्यक्तित्व में भी शालीनता थी। मैंने समाचार पढ़ने की कला उन्हीं से सीखी थी। उनकी खूबियों और कला को अपने चरित्र और काम में उतारने की कोशिश करता था। उन्हें सुनकर हम अपने उच्चारण, अनुवाद और संपादन के दोषों को दूर करने की कोशिश करते थे। मैं उन्हें अक्सर अभ्यास करते हुए देखा करता था। किस तरह से वे स्क्रिप्ट का अभ्यास करते हुए विराम चिह्न लगाते थे, कहां रुकते थे और किन शब्दों पर जोर देते थे। वाक्यों के आरोह-अवरोह पर कैसी स्थिरता का परिचय देते थे, यह सब काफी उत्साह बढ़ाने वाला था। उनकी सबसे अच्छी बात जो मुझे प्रभावित करती थी वह थी सहयोग की भावना।

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उनका विशाल हृदय और व्यक्तित्व उनके नाम की सार्थकता को सिद्ध करता था। वे आकाशवाणी के संमाचार का चेहरा थे तो जान पहचान भी थी। और किसी को किसी भी तरह की मदद की जरूरत होती तो वे तुरंत उसकी सहायता करते थे। उनकी पृष्ठभूमि भी बहुत अच्छी थी। संपन्न परिवार से थे, सभी से प्यार और शालीनता से बात करते थे। मैंने उन्हें गुस्सा करते, गिला, डांट-डपट करते कभी सुना ही नहीं। वे ही नहीं, उनका पूरा परिवार इसे स्नेहपूर्ण व्यक्तित्व का नी था।उनकी पत्नी और पत्नी की छोटी बहन रंजना सिंह जो नेपाली समाचार वाचिका थीं सबसे मेरे पारिवारिक ताल्लुकात हो गए थे। मुझे पता चला कि 86 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। पहले वे दिल्ली के एंड्रूज गंज में रहते थे और सेवानिवृति के बाद उन्होंने साकेत में आवास बनाया था।