कश्मीर का एक गांव जहां न दहेज की चिंता, न बारात के खान-पान का खर्च, जानें क्‍या हैं नियम

 

बाबावाइल गांव में शादियों में दहेज लेना और देना दोनों अपराध माना जाता है

कश्मीर के गांदरबल जिले में हरमुख की हसीन पहा़ड़ि‍यों के दामन में बसा खूबसूरत गांव बाबावाइल। अपने कड़े नियम-कानून और अनुशासन के लिए पूरे कश्मीर में जाना जाता है। गांव के नियम सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

  श्रीनगर। कश्मीर के गांदरबल जिले में हरमुख की हसीन पहा़ड़ि‍यों के दामन में बसा खूबसूरत गांव बाबावाइल। अपने कड़े नियम-कानून और अनुशासन के लिए पूरे कश्मीर में जाना जाता है। गांव के नियम सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। इस गांव में शादियों में दहेज लेना और देना दोनों अपराध माना जाता है। शादी में लड़की वालों को एक धेला भी खर्च नहीं करना पड़ता है। उल्टा लड़के के घरवाले लड़की वालों को शादी में होने वाले खर्च, दुल्हन के कपड़े व चाय-पानी के इंतजाम के लिए पैसे देते हैं। बड़ा घर के नाम से मशहूर 1500 की आबादी वाले इस गांव में 'नो डावरी' का नियम पिछले 30 वर्षों से सख्ती से लागू है। यही कारण है कि इन वर्षों से गांव में एक भी घरेलू हिंसा की घटना नहीं हुई है।

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लड़की वालों को नहीं, लड़के वालों को उठाना पड़ता है शादी का खर्च

श्रीनगर से 40 किलोमीटर दूर बसे गांव बाबावाइल के सरपंच मुहम्मद अल्ताफ अहमद शाह ने बताया कि गांव में बनाए गए लिखित दस्तावेज के तहत शादी तय होते ही लड़के के घरवालों को लड़की के घरवालों को 50 हजार रुपये देने होते हैं, जिनमें से 20 हजार दुल्हन का मेहर, 20 हजार दुल्हन के कपड़े व अन्य सामान जबकि 10 हजार रुपये बारातियों व बाकी महमानों के चाय-पानी के लिए होता है। शाह ने कहा कि बारात के साथ चार से ज्यादा लोग नहीं जाते। सभी को नियम का पालन करना होता है।

एक घटना ने बदली गांव की सोच

सरपंच अल्ताफ ने बताया कि वर्ष 1990 तक इस गांव में भी आम रीति रिवाज के साथ शादियां कराई जाती थीं। लड़की के मायके वाले उसे भरपूर दहेज के साथ ससुराल रवाना करते थे। वर्ष 1991 में यहां घरेलू हिंसा का एक मामला सामने आया। पड़ोस के गांव की एक लड़की की हमारे गांव के एक युवक से शादी हुई। पति ने अपनी पत्नी से मायके से कुछ पैसे लाने की मांग की, ताकि वह पैसा अपने कारोबार में लगा सके। पत्नी ने मना कर दिया। एक दिन उसने अपनी पत्नी की बेरहमी से पिटाई कर दी। लड़की के मायके वालों ने उस पर घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करवा दिया। मामला अदालत तक पहुंच गया और तकरीबन डेढ़ साल तक लटका रहा। इस मामले ने गांव का नाम खराब कर दिया।

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पंचायत ने कराई सुलह

गांव के बुजुर्गों ने पंचायत बुलाई और पीडि़त महिला के परिवार से बात कर मामले को अदालत से खारिज करवाया। पंचायत में लड़के ने अपनी पत्नी से माफी मांग ली और दोनों परिवारों के बीच सुलह कर मामले को हल कर लिया गया। दोनों पति-पत्नी राजी खुशी एक-दूसरे के साथ रहने पर राजी हो गए। इस घटना ने गांव वालों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी और उसी दिन पंचायत ने फैसला किया कि आज के बाद से गांव का कोई भी न दहेज लेगा और न देगा। अल्ताफ ने कहा कि इस सिलसिले में एक लिखित दस्तावेज पर सभी स्थानीय लोगों के हस्ताक्षर लिए गए हैं।

घरेलू हिंसा के मामले भी रुक गए

गांव में दहेज पर रोक ने न केवल लड़कियों की शादी आसान कर दी बल्कि इसने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, घरेलू हिंसा और अपराधों पर भी विराम लगा दिया है। सरपंच अल्ताफ के अनुसार, बीते 30 वर्षों से महिलाओं पर अत्याचार का एक भी मामला सामने नहीं आया है।

दिलाई जाती है शपथ

गांव में लागू कानून के अनुसार, अगर किसी को दहेज लेने या देने में संलिप्त पाया जाता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। सरपंच एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष व स्थानीय निवासी नजीर अहमद रैना ने कहा कि हम शादी लायक युवाओं को पहले ही शपथ दिलाते हैं कि वह अपनी शादी में न दहेज लेंगे और न देंगे। अगर किसी ने ऐसा किया तो उसका सामाजिक बहिष्कार होगा।

अन्य गांव में भी चला रहे अभियान

स्थानीय लोगों ने दहेज न देने की परंपरा को केवल अपने गांव तक ही सीमित नहीं रखा है। 'नो टू डावरी सिस्टम' के नाम से स्थानीय लोगों ने एक अभियान भी चला रखा है, जिसके तहत वह जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन कर लोगों विशेषकर युवाओं को प्रेरित करते हैं। नजीर अहमद ने बताया कि हमारा यह अभियान रंग लाने लगा है। पड़ोसी गांव के युवा इससे जुड़ रहे हैं। वह भी अन्य लोगों को जागरूक कर रहे हैं। रैना ने कहा कि हमारी कोशिश है कि दहेज न लेने की यह परंपरा पूरे कश्मीर में स्वेच्छा से लागू हो।

नियम और असर

-लड़की वालों को नहीं, लड़के वालों को उठाना पड़ता है शादी का खर्च

-दुल्हन का मेहर, कपड़ों व अन्य खर्च के लिए देने पड़ते हैं 50 हजार रुपये

-बारात के साथ चार से ज्यादा लोग नहीं जा सकते

-बारात लेकर गए दूल्हा पक्ष को चाय-पानी के भी देने पड़ते हैं पैसे