अफगानिस्‍तान के भीतर तालिबान शासन के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकते हैं ये अफगानी नेता, जानें इनके बारे में

 

अफगानिस्‍तान के भीतर तालिबान शासन के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकते हैं ये अफगानी नेता।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह कौन से लोग हैं जो अफगानिस्‍तान में तालिबान हुकूमत को बड़ी चुनौती दे सकते हैं। अफगानिस्‍तान के किन इलाकों में उनका प्रभाव है। पाकिस्‍तान-ईरान और भारत के साथ उनके संबंध कैसे हैं।

काबुल, एजेंसी। अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान सरकार कैसी होगी यह लगभग तय हो चुका है। तालिबान की सरकार में किसकी क्‍या भूमिका होगी यह भी तय हो गया है। लेकिन अभी कई सवालों के उत्‍तर आना शेष है। मसलन, तालिबान शासन कितना समावेशी होगा? यह सरकार कितने दिन चलेगी? फ‍िलहाल यह तो वक्‍त बताएगा। एक बात तो तय है कि अफगानिस्‍तान के अंदर तालिबान को बड़ी चुनौती मिलेगी। अफगानिस्‍तान में तालिबान विरोधियों की बड़ी संख्‍या है। ये विरोधी आने वाले दिनों में विरोध करने के लिए एकजुट हो सकते हैं। तालिबान के पहले शासन के दौरान नॉर्दर्न अलायंस इसका उदाहरण है।

अफगानिस्‍तान में कभी भी कोई पूरी तरह से सत्‍ता में नहीं रहता है। वह चाहे पूर्व सावियत संघ का समय हो या उसके बाद तालिबान के शासन का समय रहा है या फ‍िर अफगान की लोकतांत्रिक सरकार का कार्यकाल रहा हो। अब यही उम्‍मीद तालिबान के साथ भी की जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह कौन से लोग हैं, जो अफगानिस्‍तान में तालिबान हुकूमत को बड़ी चुनौती दे सकते हैं। अफगानिस्‍तान के किन इलाकों में उनका प्रभाव है। पाकिस्‍तान-ईरान और भारत के साथ उनके संबंध कैसे हैं।

अहमद मसूद

  • अहमद मसूद अफगानिस्‍तान के पंजशीर घाटी में मसूद का वर्चस्‍व है। पंजशीर और पूर्वी अफगानिस्‍तान में इनका प्रभाव क्षेत्र है। इस घाटी में मसूद गुठ इतना शक्तिशाली है कि इनको पंजशीर का शेर कहा जाता है। अहमद मसूद अपने पिता के पदचिन्‍हों पर चल रहे हैं। उनके पिता का नाम अहमद शाह मसूद था। वह पूर्व सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध के हीरो रहे हैं।
  • अहमद मसूद पंजशीर घाटी में तालिबान से लोहा लेने वाले लड़ाकों के वह नेता है। अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद वह एंटी तालिबान अफगान चेहरे के रूप में उभरे हैं। इस वक्‍त वह पंजशीर में ही है। उन्‍होंने तालिबान के खिलाफ आम अफगान नागरिकों से राष्‍ट्रीय विद्रोह शुरू करने का आह्वान किया है।
  • मसूद तालिबान के खिलाफ लड़ रहे लोगों की एक बड़ी उम्‍मीद बनकर उभरे हैं। अफगानिस्‍तार सरकार के पतन के बाद पूर्व उप राष्‍ट्रपति अमरुल्‍लाह सालेह भी तालिबान से लड़ने के लिए मसूद का साथ दे रहे हैं। माना जा रहा है कि अफगान नेशनल आर्मी के सैकड़ों सैनिक भी मसूद के साथ आ गए हैं।

अब्‍दुल रशीद दोस्‍तम

  • दोस्‍तम वर्ष 2013 से 2019 तक अफगानिस्‍तान के उप-राष्‍ट्रपति रहे हैं। उत्‍तरी अफगानिस्‍तान के कई इलाकों में उनका अच्‍छा दखल है। जाउजैन, बल्‍ख, फरयाब और समनगन के इलाके में उनका प्रभाव है। वर्ष 2001 में तालिबान के खिलाफ जंग में नार्दन अलायंस में उनका प्रमुख रोल रहा है।
  • पूर्व सोवियत संघ के समय ही तालिबान के साथ उनके दोस्‍त से दुश्‍मन बने अता नूर के खिलाफ लड़ने का अच्‍छा अनुभव है। कहा जा रहा है कि तालिबान के कब्‍जे के बाद वह उज्‍बेकिस्‍तान भाग गए हैं।
  • भारत के साथ दोस्‍तम के अच्‍छे संबंध रहे हैं। दोस्‍तम ने वर्ष 1992 में भारतीय डिप्‍लोमेट्स को मजार-ए-शरीफ से निकालने में मदद की थी। वर्ष 2020 में दोस्‍तम भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिल चुके हैं।
  • दोस्‍तम अफगानिस्‍तान के सबसे बड़े उज्‍बेक नेता हैं। वह अलग-अलग समय पर तालिबान समेत अफगानिस्‍तान के हर धड़े को समर्थन कर चुके हैं। वर्ष 2014 के आम चुनाव के दौरान अशरफ गनी का समर्थन किया और खुद उप राष्‍ट्रपति बने। वर्ष 2018 में राजनीतिक विरोध‍ियों का अपहरण मामले के आरोप लगे इसके बाद वह देश छोड़कर तुर्की चले। कुछ महीनों बाद जब वह दोबारा लौटे तो गनी ने उनका स्‍वागत किया था। हालांकि, बाद में उन पर गनी सरकार के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगा।

अता मोहम्‍मद नूर

  • नूर वर्ष 2004 से 2018 तक बल्‍ख प्रांत के गवर्नर रहे। वह जमात-ए-इस्‍लामी के प्रमुख हैं। इस संगठन का प्रभाव उत्‍तरी अफगानिस्‍तान, मजार ए शरीफ और बल्‍ख के इलाके में इनके संगठन का अच्‍छा प्रभाव है। मजार ए शरीफ पर उनकी जबरदस्‍त पकड़ मानी जाती है।
  • अफगानिस्‍तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद मोहम्‍मद नूर उज्‍‍बेकिस्‍तान भाग गए। वह तालिबान हुकूमत के विरोधी रहे हैं। भारत के साथ उनके करीबी रिश्‍ते रहे हैं। वह भारत के साथ दोस्‍ताना संबंध चाहते हैं। वर्ष 2020 में विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी उनकी मुलाकात हुई थी।
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गुलबुद्दीन हिकमतयार

  • हिकमतयार अफगानिस्‍तान के पूर्व प्रधानमंत्री और ह‍िज्‍ब ए इस्‍लामी गुलबुद्दीन पार्टी के मुखिया रहे हैं। उनको बुचर आफ काबुल यानी काबुन का कसाई कहा जाता है। वह हार्ड कोर इस्‍लामिस्‍ट हैं। वह सीआइए से आर्थिक मदद पाने वाले सबसे अमीर मुजाहिद्दीनों में से एक हैं।
  • लंबे समय से तक चर्चा से दूर रहने के बाद वह इस वर्ष काबुल में उनके समर्थकों ने हेरात और बदख्‍शन में गनी सरकार के खिलाफ रैलियां भी की थीं।
  • ह‍िकमतयार के पाकिस्‍तान के साथ करीबी रिश्‍ते हैं। वह अपने भारत विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं। वर्ष 1993 में भारत विरोधी माने जाने वाले हिकमतयार के लड़ाकों के राकेट हमले के बाद भारत ने काबुल मिशन को बंद कर दिया था। इस हमले में एक भारतीय सुरक्षा गार्ड की मौत हुई थी।

करीम खलीली

  • खलीली अफगानिस्‍तान के दूसरे उप राष्‍ट्रपति रहे चके हैं। दक्षिण अफगानिस्‍तान और मध्‍य अफगानिस्‍तान के इलाकों पर इनका प्रभाव रहा है।
  • खलीली तालिबान के खिलाफ बड़ा विद्रोह कर चुके हैं। हालांकि, अब वह उससे रिश्‍ते बेहतर करने की कोशिश में जुटे हैं।
  • अफगानिस्‍तान सरकार के पतन के बाद पाक‍िस्‍तान की राजधानी इस्‍लामाबाद चले गए। ईरान से काफी करीबी रिश्‍ते हैं। वर्ष 2021 में पाकिस्‍तान के व‍िदेश मंत्री से मुलाकात की थी। उस वक्‍त बलूचिस्‍तान में 12 कोयला खदान मजदूरों की हत्‍या हुई थी।

मोहम्‍मद यूसुफ कानूनी

  • अफगानिस्‍तान के पहले उपराष्‍ट्रपति थे। न्‍यू अफगानिस्‍तान पार्टी से जुड़े हैं। पंजशीर और ईस्‍ट अफगानिस्‍तान में इनका प्रभाव है।
  • ताजिक समुदाय के कानूनी ने पश्‍तुन महिला के साथ निकाह किया। वर्ष 2004 में हामिद करजई के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। तालिबान के पहले शासन के दौरान वह नार्दन अलायंस का हिस्‍सा थे। 15 अगस्‍त को तालिबान के कब्‍जे के बाद वह पाकिस्‍तान की राजधानी इस्‍लामाबाद चले गए।
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गुल आगा शेरजई

  • शेरजई नांगरहर प्रांत के गवर्नर रहे हैं। पूर्वी अफगानिस्‍तान और कंधार क्षेत्र में इनका प्रभाव है। अफगानिस्‍तान में बुलडोजर के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2001 में तालिबान के पतन के बाद पाक‍िस्‍तान के क्‍वेटा से कंधार पहुंचे और उस पर अपना कब्‍जा किया।
  • शेरजई हामिद करजई के काफी करीबी थे। वर्ष 2014 में राष्‍ट्रपति चुनाव भी लड़ चुके हैं। उन्‍होंने तालिबन के सत्‍ता में आने का स्‍वागत किया है। कहा जा रहा है कि वह अभी अफगानिस्‍तान में ही हैं। पाकिस्‍तान और अमेरिका से उनके अच्‍छे संबंध हैं।