रेल यात्रियों के समग्र हितों का हो संरक्षण, व्यावहारिक समस्याएं भी समझें यात्री

 

यात्रियों का समय कीमती है और ट्रेनों में देरी के लिए किसी न किसी को जवाबदेह बनाना होगा।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि अगर सार्वजनिक परिवहन को निजी क्षेत्र के साथ प्रतिस्पर्धा करनी है तो उसे अपनी कार्यशैली को सुधारना होगा। अगर रेलवे देरी की वजह बताने में नाकाम रहता है तो उसे यात्रियों को मुआवजा देना होगा।

 कोरोना संकट के दौर में एक बात स्पष्ट हो गई कि आपातकाल में रेल सेवाएं हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। चाहे यात्री हो या सामग्री या आक्सीजन, सबकी आपूर्ति के लिए रेल निरंतर कार्यरत है। रेलवे समेत पूरा देश इस कठिन दौर से उबर ही रहा है कि उच्चतम न्यायालय का हाल ही में दिया गया फैसला सोच में डाल देता है।

दरअसल रेल संचालन पर केंद्रित उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए एक हालिया फैसले में रेलवे द्वारा संबंधित यात्री को मुआवजा देने की बात कही है, जिसमें ट्रेन के गंतव्य तक पहुंचने में करीब चार घंटे की देरी के कारण यात्री की आगे की फ्लाइट छूट गई थी। यात्री को हुए आर्थिक नुकसान और मानसिक प्रताड़ना का भी मुआवजा न्यायालय ने उसको देने का निर्णय सुनाया। इस फैसले का रेल कर्मचारियों और रेल प्रशासन पर गहरा असर पड़ेगा। हमें इन तथ्यों को भी समझना चाहिए कि ट्रेन संचालन में देरी की वजह को रेल प्रशासन उच्चतम न्यायालय को समझा पाया या नहीं।

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देखा जाए तो बीते कल में अक्सर छिपा होता है आज की समस्याओं का हल। दरअसल 19वीं शताब्दी में भारत में रेल पटरियों को बिछाने की शुरुआत हुई थी। ब्रिटिश राज ‘क्राउन’ के फंड से राजकीय रेल परिवहन व्यवस्था बना रहा था। जैसाकि हम जानते हैं इंग्लैंड में कानून व्यवस्था लिखित कम, दायित्व बोध पर आधारित ज्यादा है। भारत में रेल व्यवस्था और रेल यात्री के बीच के रिश्ते की बारीकियां तय होती हैं संविधान, कानून (रेलवे एक्ट), नियम, टिब्यूनल आदि के द्वारा। टिकट खरीदने के बाद यात्र शुरू करना और गंतव्य तक पहुंचना, इसकी समग्र समीक्षा के लिए अनेक संस्थागत नियमावली पढ़नी पड़ेगी। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के वर्तमान निर्णय का असर इस पूरे नियम-कानून के जंजाल पर पड़ेगा, इसलिए दायित्व-बोध को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक संबंधित संस्था के कार्यक्षेत्र को परिमार्जति करना होगा।

रेलगाड़ी के इंजन की क्षमता, उसमें कितने डिब्बे जुड़ेंगे और किस गति पर वह दौड़ेगी, यह सब संबंधित रेलमार्ग के ढांचे और तकनीक पर भी निर्भर है। संचालन की राह में पूर्णतया सुगमता यानी सबकुछ सही रहने पर भी ट्रेन के गंतव्य स्थल पर पहुंचने में यदि देरी हो जाए, तो किसका कितना दायित्व है और किसकी कितनी गलती है, इस सवाल का उत्तर देना आसान नहीं है। उल्लेखनीय है कि ‘सर्विस क्वालिटी लेवल’ उस आश्वासन को कहते हैं जो यात्री सेवाओं से सहज ही जुड़ा हुआ है। निर्धारित समय पर ट्रेन का आगमन-प्रस्थान और समय-सारणी के अनुसार रास्ते के स्टेशनों से गुजरना, यह भी एक निहित आश्वासन ही तो है। तेज गति की राजधानी-शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन या फिर कोई अन्य एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेन आगे चलेगी या फिर आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद मालगाड़ी, ऐसे में मुआवजे की मर्यादा को समझना भी रेल संचालन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू है, क्योंकि यह सर्वविदित है कि राजधानी-शताब्दी जैसी सवारी गाड़ियां भी फायदे में नहीं चलती हैं, जबकि उनका घाटा मालगाड़ियों के संचालन से ही समायोजित किया जाता है।

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मालूम हो कि एयरलाइन का टिकट बुक करते हुए कुछ रकम इंश्योरेंस के मद में भी ली जाती है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो प्रत्येक एयरलाइन टिकट की बिक्री पर इंश्योरेंस की रकम लेकर एक फंड बनाया जाता है, जिससे शिकायतकर्ता को मुआवजा दिया जाता है। भारतीय रेल में भी इस तरह की व्यवस्था का विकास करना होगा। इस तरह का प्रविधान करने से टेनों के विलंब के कारणों की समीक्षा की जा सकती है और उसी अनुरूप मुआवजे को निर्धारित भी किया जा सकता है। (ये लेखिका के निजी विचार हैं)