सितंबर माह में इसलिए अधिक होने लगी है बारिश, ये है वजह


मौसम विभाग के मुताबिक 1901 के बाद ऐसा तीसरी बार होगा, जब सितंबर महीने में इतनी बारिश होगी।
अध्ययन के अनुसार भारत में सितंबर की चरम घटनाओं में परिवर्तनशीलता का न्यूनतम हिस्सा आर्कटिक समुद्री बर्फ की सीमा खासकर आर्कटिक के कारा सागर क्षेत्र से प्रभावित हो सकता है। गर्मियों

नई दिल्ली। बीते कुछ सालों से सितंबर माह में अधिक बारिश का सिलसिला बढ़ा है। सितंबर में अधिक बारिश की वजह आर्कटिक महासागर में समुद्री बर्फ का पिघलना है। हाल में ही इस बारे में एक अध्ययन किया गया है जो इस बात की पुष्टि करता है। वहीं अल-नीनो और ला-नीनो जैसी घटनाएं भी सितंबर में बारिश बढ़ा रही है।

अध्ययन के अनुसार भारत में सितंबर की चरम घटनाओं में परिवर्तनशीलता का न्यूनतम हिस्सा आर्कटिक समुद्री बर्फ की सीमा खासकर आर्कटिक के कारा सागर क्षेत्र से प्रभावित हो सकता है। गर्मियों के दौरान कारासागर क्षेत्र में समुद्री बर्फ के तेजी से पिघलने से समुद्र का आवरण (कम समुद्री बर्फ) खुल जाता है। गर्मी के समय में सौर विकिरण के तहत खुले समुद्र के आवरण में यह वृद्धि अधिक संवहन, गर्मी मुक्त करने की अनुमति देती है। इससे वायुमंडलीय सर्कुलेशन बदल जाता है। ऊपरी वायुमंडल में इस तरह के वायुमंडलीय सर्कुलेशन में परिवरर्तन सबट्रॉपिकल एशिया की और बहुत तेज गति से लंबी दूरी की यात्रा करते हैं। इससे भारतीय भूभाग पर प्रभाव पड़ता है।

गर्म अरब सागर के तापमान के साथ-साथ ऊपरी वायुमंडलीय सर्कुलेशन में संबद्ध परिवर्तन, अरब सागर के ऊपर पश्चिमी मानसूनी हवाओं द्वारा नमी के कंवर्जेंश में बढ़ोतरी करते हैं। इससे मध्य और पश्चिम भारत में संवहन की तीव्रता सुविधाजनक होती है। इससे अधिक बारिश की घटनाएं हो सकती है।

इसलिए अधिक हो रही सितंबर में बारिश

सितंबर माह में हुई बारिश ने बीते सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। मौसम विभाग के मुताबिक 1901 के बाद ऐसा तीसरी बार होगा, जब सितंबर महीने में इतनी बारिश होगी।1917 में सिर्फ सितंबर महीने में 285.6 एमएम की बारिश हुई थी। मौसम विभाग का कहना है कि सितंबर महीने में तेज बारिश के पीछे तीन कारण प्रमुख है। पहला कारण पैसिफिक ओसन के ऊपर बना अल नीनो का इफेक्ट, जिसने मानसून को दबाया और जुलाई में कम बारिश हुई। ठीक उसी वक्त इंडियन ओशियन में मानसून के अनुकूल वातावरण तैयार है। मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र का कहना है कि वर्तमान में समुद्री सतह का तापमान और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की हवाओं की स्थितियां अल नीनो स्थितियों का संकेत दे रही हैं। हालांकि मानसून के आखिरी चरण अथवा उसके बाद ला नीना की स्थिति फिर से उभरने की संभावना है। अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर में ला नीना की स्थिति बनने से बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बन सकते हैं।

तीसरा कारक बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाब का क्षेत्र बारिश की वजह है। इसके लगातार बनने की वजह से लंबे वक्त तक भारी बारिश होती है, जो हम सितंबर महीने में देख सकते हैं। मौसम विभाग के मुताबिक लो प्रेशर वाला एक सिस्टम 10 दिनों तक एक्टिव होता है। इसके लगातार बनने की वजह से सितंबर महीने में तेज बारिश हो रही है और आगे भी यह क्रम जारी रह सकता है।

इसलिए हिमालय की तलहटी में बढ़ी हैं भारी बारिश की घटनाएं

वैज्ञानिकों ने पाया है कि ब्लैक कार्बन और धूल जैसे एयरोसोल्स के कारण हिमालय क्षेत्र की तलहटी में भारी वर्षा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। जो भारत के गांगेय मैदान को दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक बनाते हैं। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला, लीपज़िग इंस्टीट्यूट फॉर मीटीरोलॉजी (लिम), यूनिवर्सिटी ऑफ लीपजिंग, जर्मनी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम के अध्ययन में यह बात सामने आई है। उन्होंने दिखाया कि पार्टिकुलेट एमिशन या कण उत्सर्जन, क्लाउड सिस्टम के भौतिक और गतिशील गुणों को बदल सकता है। इसके फलस्वरूप प्रदूषित शहरी क्षेत्रों में हवा के साथ वर्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी होती है।

अध्ययन में क्या आया सामने

हिमालय की तलहटी में अधिक बारिश होने की जांच करने के लिए अध्ययन में 17 सालों (2001-2017) के बारिश संबंधी आंकड़ों का आकलन किया गया। इसके साथ ही एरोसोल माप ( जिसे एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (ऐओडी) कहा जाता है), विभिन्न ऊंचाइयों पर दबाव, तापमान और नमी की मात्रा का उपयोग थर्मोडायनामिक वेरिएबल्‍स और लांग वेब रेडिएशन (पृथ्वी से उत्सर्जित होने वाले रेडिएशन को लांग वेब रेडिएशन कहते हैं) की गणना के लिए किया गया। थर्मोडायनामिक वेरिएबल्‍स और लांग वेब रेडिएशन की गणना से भारी वर्षा का अंकगणित समझने में मदद मिली। टीम को भारी बारिश की घटनाओं, उच्च एरोसोल लोडिंग और स्थैतिक ऊर्जा (एमएसई) बीच स्पष्ट जुड़ाव मिला। इससे यह स्पष्ट हुआ कि हिमालय क्षेत्र में उच्च वर्षा की घटनाओं पर एरोसोल के विकिरण प्रभाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।एरोसोल के बारे में जानें

सूक्ष्म ठोस कणों अथवा तरल बूंदों के हवा या किसी अन्य गैस में कोलाइड को एरोसोल कहा जाता है। एरोसोल प्राकृतिक या मानव जनित हो सकते हैं। हवा में उपस्थित एरोसोल को वायुमंडलीय एरोसोल कहा जाता है। धुंध, धूल, वायुमंडलीय प्रदूषक कण तथा धुआं एरोसोल के उदाहरण हैं। सामान्य बातचीत में, एरोसोल फुहार को संदर्भित करता है, जो कि एक डब्बे या सदृश पात्र में उपभोक्ता उत्पाद के रूप में वितरित किया जाता है। तरल या ठोस कणों का व्यास 1 माइक्रोन या उससे भी छोटा होता है। बीते कुछ सालों में शोधकर्ताओं ने अब इस बात पर भी जोर देना शुरू किया है कि वाहनों के धुएं से, अधजले फसल अवशेषों से तथा धूल और रासायनिक अपशिष्ट से निकलने वाला एरोसोल जीवनदायी बरसात के मौसम को और भी अधिक कमज़ोर कर रहा है।

ये हैं अल-नीनो और ला-नीनो

अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस मौसमी घटना का नाम है, जिसमें पानी की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और हवा पूर्व की और बहने लग जाता है। जो न केवल समुद्र पर बल्कि वायुमंडल पर भी प्रभाव डालता है। इस घटना के चलते समुद्र का तापमान 4 से 5 डिग्री तक गर्म हो जाता है। ला नीना की स्थिति बनने पर पश्चिमी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में सामान्य से कम वायुदाब बनने से इसकी स्थिति बनती है। इसके कारण समुद्र का तापमान सामान्य से घट जाता है। आमतौर पर इन दोनों ही घटनाओं का असर 9 से 12 महीने तक रहता है, पर कभी-कभी यह स्थिति कई वर्षों तक बनी रह सकती है। यह दोनों ही घटनाएं दुनिया भर में मौसम, बारिश, तूफान, बाढ़, सूखा जैसी घटनाओं को प्रभावित करती हैं। इनकी वजह से कहीं सामान्य से ज्यादा बारिश होती है तो कहीं सूखा पड़ता है, और कहीं तूफान आते हैं।