शिक्षकों को मेरा उपहार थी स्टेनली का डब्ब, टीचर-स्टूडेंट के रिश्तों पर बनी थी ये फिल्म- अमोल गुप्ते

 

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फिल्म ‘स्टेनली का डब्बा’ मेरे लिए बहुत अहम है। इसका मुख्य आइडिया भूख थी। यूनिफार्म कैसे भूख को छुपा कर रखती है यह फिल्म में हमने दिखाया। आपके आत्मसम्मान और स्वाभिमान को टिकाए रखने में यूनिफार्म कितनी अहम भूमिका निभाती है।

मुंबई ब्यूरो। शिक्षक और छात्र के रिश्ते को दर्शाती फिल्मों में ‘स्टेनली का डब्बा’ का जिक्र जरूर आता है। अमोल गुप्ते निर्देशित यह फिल्म उन तमाम बच्चों की कहानी थी, जो विपरीत परिस्थितियों में उत्साह बनाए रखते हैं। इस फिल्म में अमोल गुप्ते ने अभिनय भी किया था। अपने स्कूल व शिक्षकों को समर्पित इस फिल्म से जुड़ी यादों को उन्होंने ताजा किया...

फिल्म ‘स्टेनली का डब्बा’ मेरे लिए बहुत अहम है। इसका मुख्य आइडिया भूख थी। यूनिफार्म कैसे भूख को छुपा कर रखती है, यह फिल्म में हमने दिखाया। आपके आत्मसम्मान और स्वाभिमान को टिकाए रखने में यूनिफार्म कितनी अहम भूमिका निभाती है। अगर यूनिफार्म न हो तो स्कूल में अमीरों के बच्चे अलग कपड़े पहनें और गरीब अलग। मुझे यही दर्शाना था कि यूनिफार्म सारे भेदभाव को खत्म कर देती है।

15 जून, 1969 को मैंने मुंबई स्थित होली फैमिली हाईस्कूल ज्वाइन किया था। वहां की प्रिंसिपल श्रीमती आशा कपूर ने मुझमें बहुत आत्मविश्वास भर दिया था। मुझे उस स्कूल पर गर्व था और उसका एक कर्ज भी था, जो मुझे चुकाना था। बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर फिल्म ‘तारे जमीं पर’ बनाने के बाद मुझे लगा कि क्यों न अपने स्कूल के बच्चों के लिए सप्ताह में एक दिन शनिवार को एक्टिंग की वर्कशाप की जाए और मैं एक बार फिर अपने बचपन के स्कूल से जुड़ जाऊं। उसी दौरान फिल्म का आइडिया भी आया। पूरे वर्कशाप में सिर्फ मैं, कैमरामैन और साउंड रिकार्डिस्ट तीन ही लोग रहते थे। फीचर फिल्म के निर्माण में इतना छोटा क्रू बहुत कम दिखता है, लेकिन मुझे बच्चों को ऐसी जगह नहीं रखना था, जहां वे ज्यादा तामझाम देख कर शरमा या डर जाएं।

फिल्म में स्टाफ रूम में दिखाई गईं कुछ टीचर्स वे थीं जिन्होंने मेरे स्कूली दिनों में पढ़ाया था। जहां तक मेरे अभिनय करने की बात है तो हर शनिवार को एक साल तक सुबह नौ बजे से दोपहर एक बजे तक भला कौन सा एक्टर काम करने के लिए तैयार होता, इसलिए मैंने फिल्म में एक्टिंग करने का फैसला किया। जब बच्चे थक जाते थे तो मैं कैमरामैन से कहता कि अब कैमरा मेरी तरफ करो। शूटिंग के दौरान मैं कभी स्क्रिप्ट लेकर नहीं पहुंचता था। उनको बस कहानी और सीन बता देता था और कहता कि आपको जो बोलना है बोलो, जो करना है करो।

इस तरह फिल्म में हमने उनके वास्तविक इमोशन, वास्तविक प्रतिक्रियाएं, वास्तविक हाव-भाव और वास्तविक डब्बे शूट किए। शूटिंग के दौरान बच्चे अपने घर से डब्बे लाते थे और वे बहुत चाव से मुझे खिलाते थे। सेट पर दो इंटरवल होते थे। एक में मैं उन्हें डब्बा देता था दूसरे में वे मुझे डब्बा देते थे। फिल्म की शूटिंग के दौरान इतने घरों से डब्बों का आना और उन्हें खाना मेरा सौभाग्य था। जब हमने फिल्म की शूटिंग की तब स्टेनली का किरदार निभाने वाले मेरे बेटे की उम्र आठ साल थी, लेकिन वह तीन साल की उम्र से ही मेरे साथ वर्कशाप में जाया करता था।

लिए उसे निर्देशित करना काफी आसान था। इस फिल्म में बात स्टेनली और उसकी डब्बे की गई है, लिहाजा इस फिल्म के लिए स्टेनली का डब्बा से सरल शीर्षक हो नहीं सकता था। फिल्मकार विशाल भारद्वाज मेरे दोस्त हैं, जब मैंने उन्हें फिल्म का फस्र्ट कट दिखाया तो उन्होंने मुझसे टाइटल में बदलाव करके डब्बा गुल जैसा कुछ रखने का सुझाव दिया, लेकिन मैं सीधे-सीधे बच्चे की कहानी दिखाना चाहता था कि उस बच्चे की व्यथा क्या है तो मैंने तुकबंदी में ना फंसकर फिल्म शीर्षक ‘स्टेनली का डब्बा’ तय किया। मैंने प्राइमरी से लेकर सातवीं कक्षा तक होली फैमिली हाईस्कूल में पढ़ाई की थी। पूरी फिल्म उसी स्कूल में शूट की गई थी। आठवीं से मैं हंसराज मोरारजी

पब्लिक स्कूल में आ गया। जहां मुझे मेरे निकुम सर, नामवर सर और परमार सर जैसे अध्यापकों की त्रिमूर्ति मिली।हर शिक्षक दिवस और गुरु पूर्णिमा के दिन अपने अध्यापकों के यहां लड्डू लेकर जरूर जाता हूं।

बहरहाल, हमारा सिनेमा बच्चों के विषयों को ज्यादा नहीं दिखा पा रहा है। ऐसा नहीं कि दर्शक ऐसी फिल्में नहीं देखना चाहते हैं। ‘तारे जमीं पर’, ‘स्टेनली का डब्बा’ और ‘हवा हवाई’ जैसी फिल्में बनीं तो लोगों ने देखीं भी। फिल्म‘साइना’ में भी एक चौथाई हिस्सा छोटी साइना का ही है। उसमें लैंगिक समानता से लेकर बच्चों के कई मुद्दों पर बात करने की कोशिश की गई है। बच्चों के मसले और उनकी सहजता में मेरी खास दिलचस्पी है। इन मुद्दों पर तो मुझे फिल्म बनानी ही है।