दिल्ली यूनीवर्सिटी के बनने की दिलचस्प कहानी, एक साल बाद ही क्यों आ गई थी बंद करने की नौबत

 

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 दिल्ली के छात्र अलीगढ़ या लाहौर जाते थे। इलाहाबाद (प्रयागराज) से लाहौर तक कोई सरकारी यूनीवर्सिटी नहीं थी। 1881 में सेंट स्टीफेंस कालेज और 1899 में हिंदू कालेज शुरू हुआ दोनों पंजाब यूनीवर्सिटी से संबद्ध थे। दोनों ही चांदनी चौक में थे।

नई दिल्ली । दिल्ली यूनीवर्सिटी को साल भर भी नहीं हुआ था कि व्यय में कटौती के लिए बनी ‘इंचकेप रिट्रेचमेंट कमेटी’ ने यूनीवर्सिटी को चलाए रखने के लिए सरकार को दोबारा सोचने की सिफारिश की।  जुड़े अधिकारियों पर तो मानो गाज ही गिर पड़ी, कुलपति डा. हरि सिंह गौर ने रास्ता निकाला, इस सिफारिश के खिलाफ मेमोरेंडम तो जारी किया ही, सेंट्रल असेंबली के सदस्य होने के नाते 19 मार्च 1923 को असेंबली में फिर बहस करवाई और दिल्ली यूनीवर्सिटी को जारी रखने का प्रस्ताव निर्विरोध पास करवा दिया।

यूनीवर्सिटी के निर्माता के तौर पर यूं तो विवि के अंग्रेज कुलपति मौरिस ग्वायर को सबसे ज्यादा श्रेय दिया जाता है, लेकिन पहले कुलपति कैंब्रिज यूनीवर्सटिी के छात्र, मशहूर शिक्षाविद्, न्यायविद्, समाज-सुधारक, संविधान सभा सदस्य डा. हरि सिंह गौर के हिस्से बड़ा श्रेय ये है कि विरोध और वित्तीय दिक्कतों के बावजूद यूनीवर्सटिी को बंद नहीं होने दिया। आज उनके गृह जिले सागर (एमपी) में उनके नाम पर एक यूनीवर्सिटी है, जिसके संस्थापक व आजीवन कुलपति वही रहे।

बात 1857 की है। क्रांति के बाद अंग्रेज दिल्ली से नाराज थे, 1858 के एक्ट से तीन यूनीवर्सिटी खुलीं, कलकत्ता (कोलकाता), मद्रास और बम्बई (मुंबई) में लेकिन दिल्ली में नहीं। दिल्ली के छात्र अलीगढ़ या लाहौर जाते थे। इलाहाबाद (प्रयागराज) से लाहौर तक कोई सरकारी यूनीवर्सिटी नहीं थी। 1881 में सेंट स्टीफेंस कालेज और 1899 में हिंदू कालेज शुरू हुआ, दोनों पंजाब यूनीवर्सिटी से संबद्ध थे। दोनों ही चांदनी चौक में थे, फिर दोनों ही कश्मीरी गेट इलाके में चले गए। बाद में वर्तमान जगहों पर आए। सेंट स्टीफेंस के पास कैंब्रिज मिशन का फंड था, लेकिन हिंदू कालेज के लिए सनातनी धर्म सभा इतना फंड नहीं दे पाती थी। इधर राजधानी दिल्ली आने के बाद अंग्रेजी शिक्षा विभाग ने सैद्धांतिक तौर पर तय कर लिया था कि एक ऐसी जगह आरक्षित होगी, जहां सारे बड़े शैक्षिक संस्थान आसपास हों। एक सरकारी कालेज हो, जो बाद में यूनीवर्सिटी बने। लाला केदारनाथ ने अनुमति के बाद 85000 रुपये इकट्ठा किए, इस तरह रामजस कालेज 1917 में अस्तित्व में आया।

राजधानी दिल्ली बनने के बाद काफी लंबी बहस हुई जो पूरे दशक चलती रही, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के चलते यूनीवर्सिटी शुरू करने का मामला टलता ही रहा। बहस का पहला मुद्दा था कि दिल्ली में नेशनल यूनीवर्सटिी बने या सरकारी यूनीवर्सिटी। दिल्ली में पहली बार नेशनल यूनीवर्सटिी खोलने का सुझाव दिया एनी बेसेंट ने, उनका ये सुझाव एजुकेशन डीजी मिस्टर गाइल्स ने साफ खारिज कर दिया।

अनुमान लगाया गया कि 500 छात्रों के लिए छात्रवास वाला सरकारी कालेज बनाने के लिए पांच लाख रुपये की जरूरत होगी। दिल्ली के तत्कालीन चीफ कमिश्नर एचसी बेडान ने कहा कि सेंट स्टीफेंस के नजदीक अस्थाई तौर पर शुरू करेंगे, साइंस ब्लाक संयुक्त होगा तो दो लाख ही खर्च आएगा। मूल योजना थी कि कुल 170 एकड़ जमीन सेंट स्टीफेंस कालेज के साथ जोड़ी जाए। शिक्षा विभाग ने तो हिंदू कालेज के नाम का भी सुझाया, लेकिन ना हिंदू कालेज का प्रबंधन खुश था और ना ही पंजाब यूनीवर्सिटी और सेंट स्टीफेंस की हिचकिचाहट के चलते ये योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

यूनीवर्सिटी का मामला 1919 दिसंबर में चीफ कमिश्नर सीए बैरन की मीटिंग से पटरी पर आया, जिसमें सरकार, शिक्षा अधिकारी, चीफ इंजीनियर और तीनों कालेजों के प्रतिनिधि भी थे। इसमें तीनों कालेजों की मदद से एक यूनीवर्सटिी का औपचारिक प्रस्ताव रखा गया। यहीं से उसके केंद्र के रूप में सेंट स्टीफेंस कालेज का नाम चर्चा में आया, जिससे रामजस और हिंदू कालेज के प्रतिनिधियों को परेशानी होना शुरू हो गई। इधर शिक्षा सचिव हेनरी शार्प और हैली ने कहा कि वायसराय काउंसिल के गैर भारतीय सदस्य इतने खर्च के लिए राजी नहीं हैं। भारतीय सदस्यों ने उनका विरोध किया। वायसराय काउंसिल ने प्रस्ताव फाइनेंस कमेटी को भेजा, जिसने 75000 रुपये मंजूर कर दिए।

ऐसे बना दिल्ली विवि

16 जनवरी 1922 को सेंट्रल असेंबली में इस बिल को रखा गया, जो 22 फरवरी को पास हो गया। वायदा किया गया कि कालेजों को ना तो कहीं दूसरी जगह भेजा जाएगा, ना ही कोई बड़ा बदलाव होगा। लेडी हाìडग मेडिकल कालेज को भी पंजाब यूनीवर्सटिी से ही संबद्ध रखा जाएगा। शुरुआत में कला और विज्ञान, दो विभाग ही शुरू किए गए। कुल तीन डिग्री कालेज, चार इंटरमीडियएट कालेज और 750 छात्रों के साथ यूनीवर्सटिी शुरू हो गई, बाकी विभाग और कालेज बाद में जुड़ते रहे।

पहले यूनीवर्सिटी का संचालन असेंबली चैंबर्स के कुछ कमरों में हुआ, जब ये कमरे 1926 में किसी दूसरे विभाग को आवंटित हो गए तो यूनीवर्सटिी कर्जन हाउस में शिफ्ट हो गई। वित्तीय परेशानियों के चलते एक कमेटी बनी, तय हुआ कि एक जगह यूनीवर्सटिी को मिलनी चाहिए। अजय कुमार शर्मा की ‘ए हिस्ट्री आफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स इन दिल्ली’ के मुताबिक छह साइट्स में से तय हुआ कि वाइसरीगल लाज एस्टेट के 266 एकड़ में से 93 एकड़ यूनीवर्सिटी को दिया जा सकता है। 1933 में यूनीवर्सिटी वाइसरीगल लाज में शिफ्ट हो गई। वाइसरीगल हाउस पांच वायसरायों का दफ्तर रहा था। शानदार पार्कों से घिरी ये इमारत आज वीसी आफिस के तौर पर जानी जाती है। प्रभा चोपड़ा संपादित ‘दिल्ली गजेटियर’ के मुताबिक मूल योजना में दिल्ली यूनीवर्सटिी का प्रभावी क्षेत्र 10 किलोमीटर था, जो बाद में पूरी दिल्ली कर दिया गया। एनसीईआरटी रिपोर्ट 1961 के मुताबिक, 1922 में यूनीवर्सिटी में केवल दो और कालेजों में कुल 76 शिक्षक थे, जो 1960 तक बढ़कर क्रमश: 245 और 920 हो गए थे।