अफगानिस्‍तान की तालिबान सरकार का सबसे बड़ा फायदा पाकिस्‍तान को नहीं, चीन को होगा, जानें कैसे

 

अफगानिस्‍तान की तालिबान सरकार से पूरा फायदा उठाएगा चीन

तालिबान सरकार के गठन के बाद चीन की यहांं पर पौ-बारह होने वाली है। इसकी केवल एक नहीं बल्कि कई वजह हैं। चीन भले ही तालिबान सरकार को मान्‍यता न दे लेकिन काम सारे वही होंगे जो मान्‍यता देने पर होते हैं।

नई दिल्‍ली (आनलाइन डेस्‍क)। अफगानिस्‍तान में तालिबान की सरकार के गठन के बाद बड़ा सवाल है कि उसको किन-किन देशों से मान्‍यता मिलेगी। इस बारे में काफी हद तक अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर स्थिति साफ हो चुकी है। तालिबान सरकार को पाकिस्‍तान और कतर के अलावा फिलहाल कोई भी दूसरा देश मान्‍यता देने पर हामी नहीं भर रहा है। भारत, अमेरिका, चीन, रूस, तुर्की समेत यूरोपीय संगठन की तालिबान से वार्ता जरूर हुई है। लेकिन, इन्‍होंने तालिबान सरकार को मान्‍यता देने से फिलहाल इनकार कर दिया है। इसके बावजूद चीन इस सरकार के बेहद करीब है। बिना सरकार को मान्‍यता दिए हुए भी वो वही सब करने को तैयार है तो मान्‍यता देने पर होता है। यही वजह है कि जानकार मानते हैं कि इस सरकार का सबसे बड़ा फायदा भी चीन को ही होने वाला है। इसमें वो पाकिस्‍तान को भी पीछे छोड़ देगा।

ऐसा इसलिए भी है क्‍यों‍कि पाकिस्‍तान खुद चीन के रहमोकरम पर निर्भर है। चीन के आगे पाकिस्‍तान पूरी तरह से बेबस है। ऐसे में वो चीन से किसी भी तरह का पंगा नहीं ले सकता है। इतना जरूर हो सकता है कि भारत में अस्थिरता के लिए वो तालिबान का साथ पा ले। ये चीन के लिए भी फायदे का सौदा होगा। 

आपको बता दें कि चीन पहले ही ये साफ कर चुका है कि वो अपना दूतावास अफगानिस्‍तान में बंद नहीं करने वाला है। वो ये भी साफ कर चुका है कि अफगानिस्‍तान सरकार के लिए वो फंड भी जुटाएगा। जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर एचएस प्रभाकर का मानना है कि चीन को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए एक और बेहतर जगह अफगानिस्‍तान के रूप में मिल गई है। उनके मुताबिक चीन की रणनीति तीन मुद्दों पर काम करती है। पहला उसका रणनीतिक और व्‍यापारिक दृष्टि से फायदा, दूसरा भारत का नुकसान और तीसरा है अमेरिका। इन तीनों पर अफगानिस्‍तान खरा उतरता है।

उनके मुताबिक चीन ने काबुल पर कब्‍जे से पहले ही तालिबान से बातचीत की थी। हालांकि इस बातचीत का एजेंडा दुनिया के सामने उसके शिनजियांग प्रांत में किसी तरह की अस्थिरता न फैलाना था। लेकिन हकीकत में ये वार्ता तालिबान को पूरा समर्थन देने और अपना फायदा को लेकर हुई थी। दरअसल, चीन अफगानिस्‍तान में पैसा बहाने को पूरी तरह से तैयार बैठा है। चीन अफगानिस्‍तान का फायदा न सिर्फ अपनी ताकत को बढ़ाने में इस्‍तेमाल कर सकता है बल्कि व्‍यापारिक दृष्टि से भी कर सकता है।

रणनीतिक दृष्टि से उसकी नजर अफगानिस्‍तान के रणनीतिक ठिकानों पर लगी हुई है। इसमें बगराम एयरपोर्ट समेत दूसरे ठिकाने भी शामिल हैं। इसके अलावा उसकी नजर वहां की खनिज संपदा पर भी लगी हुई है। आपको बता दें कि अफगानिस्‍तान में बेशुमार खनिज संपदा है। कई तरह के रेयर अर्थ मैटल वहां पर मौजूद हैं। चीन इनको निकालकर इसका बड़ा हिस्‍सा अपने पास रखना चाहता है। ये इसलिए भी संभव है क्‍योंकि तालिबान सरकार को मान्‍यता देने के मूड में फिलहाल दूसरे देश नहीं हैं। चीन इसका पूरा फायदा उठाने की फिराक में है।

चीन वहां से निकाले जाने वाले इन खनिजों को अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में बेचकर अरबों डालर कमा सकता है।

वहीं दूसरी तरफ अफगानिस्‍तान के रणनीतिक ठिकानों पर अपने कब्‍जे की वजह से वो भारत के लिए तो खतरा बढ़ाएगा ही साथ ही वो एशिया की बढ़ती शक्ति भी बन जाएगा। अफगानिस्‍तान में घुसने के बाद उसकी पहुंच कहीं आगे तक हो जाएगी। व्‍यापार की निगाह से देखें तो वहां पर उसको फायदा ही होने वाला है। वो अपने सामान को पश्चिम एशिया के दूसरे देशों में कम लागत पर पहुंचा सकेगा। वन बेल्‍ट रोड समेत दूसरे प्रोजेक्‍ट को भी इससे फायदा हो सकता है।