सुनवाई में देरी करता है कानून एवं न्याय व्यवस्था पर से आम लोगों का भरोसा कम

 

अहमदाबाद में श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों की जो सुनवाई 13 साल बाद पूरी हुई
बेहतर हो कि सरकार और न्यायपालिका मिलकर ऐसी कोई व्यवस्था करें जिससे कम से कम संगीन मामलों और खास तौर पर आतंकवाद से जुड़े मामलों का निपटारा एक निश्चित समय में हो। तमाम दावों के बावजूद ऐसा होने में मुश्किलें आ रही हैं।

अहमदाबाद में श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के मामले की सुनवाई 13 साल बाद पूरी होना कोई संतोषजनक बात नहीं। इन बम धमाकों में 50 से अधिक लोग मारे गए थे और तमाम अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे। ऐसे मामले की सुनवाई में इतना लंबा समय लग जाना यह बताता है कि आतंकी घटनाओं का निपटारा किस तरह आम मामलों की तरह देरी से होता है। कायदे से इस और इस जैसे अन्य मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर कहीं अधिक तीव्र गति से होनी चाहिए, ताकि पीड़ितों को राहत और अपराधियों को उनके किए की सजा मिल सके।

पता नहीं क्यों ऐसा नहीं हो पा रहा है। किसी आतंकी गतिविधि से जुड़ा यह पहला ऐसा मामला नहीं जिसकी जांच अथवा सुनवाई पूरी होने में इतनी अधिक देर हुई हो। ऐसे ही अन्य मामलों में भी इसी तरह की देरी हुई है। आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों के निराकरण में जब अनावश्यक देरी होती है तो न केवल आतंकवाद से मुकाबले की प्रतिबद्धता को लेकर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि किसी न किसी स्तर पर आतंकी तत्वों और देश विरोधी ताकतों का दुस्साहस भी बढ़ता है।

बेहतर हो कि सरकार और न्यायपालिका मिलकर ऐसी कोई व्यवस्था करें जिससे कम से कम संगीन मामलों और खास तौर पर आतंकवाद से जुड़े मामलों का निपटारा एक निश्चित समय में हो। तमाम दावों के बावजूद ऐसा होने में मुश्किलें आ रही हैं। इसका उदाहरण है दिल्ली दंगों की जांच पर दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से असंतोष जताया जाना। दिल्ली के भीषण दंगे आतंकी घटना जैसे ही थे। इस भयावह घटना के दोषियों का पता लगाकर उन्हें समय रहते कठोर दंड दिया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस न तो अपेक्षित तत्परता दिखा सकी और न ही दोषियों को दंड दिलाने के लिए सही तरह से जांच कर सकी।

जब गंभीर मामलों की सुनवाई और निपटारे में जरूरत से ज्यादा देर होती है तो कानून एवं न्याय व्यवस्था पर से आम लोगों का भरोसा कम होता है और जब ऐसा होता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। हमारे नीति-नियंताओं को यह समझने में और अधिक देरी नहीं करनी चाहिए कि पुलिस जांच में शिथिलता और अदालतों में मामलों की सुनवाई में अनावश्यक विलंब गंभीर समस्याएं खड़ी करने का काम कर रहा है।

अहमदाबाद में श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों की जो सुनवाई 13 साल बाद पूरी हुई वह निचली अदालत की ओर से संपन्न हुई है। इस अदालत का फैसला जो भी हो, अभी यह प्रकरण ऊंची अदालतों में जाएगा और कोई नहीं जानता कि वहां से निपटारा कब होगा।