महिलाओं की इच्छाशक्ति ने रांची के देवरी गांव को बनाया एलोवेरा विलेज, हो रही बंपर कमाई



झारखंड के देवरी गांव के किसान हकीकत में बदल रहे हैं।
गांव की मुन्नी देवी बताती हैं कि एलोवेरा की खेती हमें अन्य फसलों से कई गुना ज्यादा मुनाफा दे रही है। रांची कोलकाता और अन्य स्थानों से आयुर्वेदिक कंपनियों व दवा निर्माण के व्यवसाय से जुड़े लोग गांव आकर एलोवेरा की पत्तियां ले जाते हैं।

  रांची। आत्मनिर्भर भारत की सोच को झारखंड के देवरी गांव के किसान हकीकत में बदल रहे हैं। रांची-लोहरदगा मार्ग पर स्थित नगड़ी प्रखंड के इस गांव की पहचान अब एलोवेरा विलेज के रूप में है। रांची से 25 किलोमीटर दूर इस गांव में तीन साल पहले मंजू कच्छप, मुन्नी देवी, भाग्यमणि तिर्की समेत आधा दर्जन से अधिक महिलाओं ने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के विशेषज्ञों से प्रशिक्षण लेने के बाद एलोवेरा की खेती शुरू की। यह औषधीय खेती इनके लिए इतनी फायदेमंद साबित हुई कि अब गांव के 50 से अधिक किसान लगभग 50 एकड़ क्षेत्र में एलोवेरा की खेती करने लगे हैं।

गांव आकर सीधे किसानों से उत्पाद खरीद रहीं कंपनियां

इस खेती का दायरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गांव मे प्रवेश करते ही एलोवेरा विलेज लिखा एक हरे रंग का बोर्ड आपका स्वागत करता है। इसे देखते ही जानकारी हो जाती है कि आप किसी ऐसे गांव में हैं, जहां औषधीय पौधों की, खासकर एलोवेरा की खेती होती है। आगे बढऩे पर एलोवेरा से लहलहाते हरे-भरे खेतों को देख आप आनंद का अनुभव कर सकते हैं। कृषि प्रधान इस गांव के लोग अब तक आलू, प्याज, मटर व अन्य सब्जियों की खेती करते रहे हैं, जिससे उन्हें बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं हो पाता था। अब एलोवेरा की खेती यहां किसानों की खुशहाली और स्वावलंबन का जरिया बन चुकी है।

कम लागत में अधिक मुनाफा

गांव की मुन्नी देवी बताती हैं कि एलोवेरा की खेती हमें अन्य फसलों से कई गुना ज्यादा मुनाफा दे रही है। रांची, कोलकाता और अन्य स्थानों से आयुर्वेदिक कंपनियों व दवा निर्माण के व्यवसाय से जुड़े लोग गांव आकर एलोवेरा की पत्तियां ले जाते हैं। इसके एवज में उन्हेंं अच्छी-खासी रकम मिल जाती है। भाग्यमणि तिर्की और रंथू उरांव बताते हैं कि फसल तैयार होते ही बड़े-बड़े ट्रक लेकर व्यापारी एलोवेरा खरीदने गांव पहुंचने लगते हैं। अभी मांग के अनुरूप हम उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन लगातार यहां के किसान इसे अपनाते हुए खेती का दायरा बढ़ाते जा रहे हैं।

इस खेती के कई फायदे हैं। अन्य फसलों में हमें देखना होता है कि कहीं जानवर फसल चर न जाएं। एलोवेरा को न जानवर खाते हैं, न ही नुकसान पहुंचाते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें एक पौधे से कई पौधे तैयार किए जा सकते हैं। ऐसे में नए पौधे लगाने के लिए कोई लागत नहीं आती। एलोवेरा की खेती से उत्साहित किसान अब यहां एलोवेरा जूस और एलोवेरा जेल गांव में ही बनाने के लिए प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की मांग कर रहे हैं।

बीएयू की मदद से शुरू हुआ प्रोजेक्ट

मुखिया मंजू कच्छप कहती हैं कि देवरी की पहचान एलोवेरा विलेज के रूप में होना हमलोगों के लिए गौरव की बात है। वर्ष 2018 में इसकी शुरुआत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के ट्राइबल सब प्लान (टीएसपी) के तहत हुई थी। बीएयू के वाणिकी विभाग के डा. कौशल कुमार ने गांव वालों के साथ मिलाकर एलोवेरा विलेज प्रोजेक्ट शुरू किया था। किसानों को एलोवेरा की खेती के लिए प्रशिक्षण भी दिया गया और पौधे भी उपलब्ध कराए गए थे। एक साल के अंदर यहां व्यवसायिक उत्पादन शुरू हो गया। पूर्व मुखिया बिरसा उरांव कहते हैं रांची के मोरहाबादी, धुर्वा, बोड़ेया, खेलगांव से लगातार व्यापारी एलोवेरा खरीदने देवरी आते हैं। हर महीने यहां कई टन एलोवेरा का उत्पादन हो रहा है। राजस्थान, गुजरात के व्यापारियों ने भी एलोवेरा के लिए संपर्क किया है।

एक बार पौधे लगाकर तीन साल के लिए निश्चिंत

मंजू बताती हैं कि एक बार खेत में फसल लगा देने के बाद किसान तीन साल के लिए निश्चिंत हो जाते हैं। इस बीच कई बार एलोवेरा के पत्तों की कटाई कर उन्हेंं बेचा जाता है। किसानों को 35 से 40 रुपये प्रतिकिलो की दर से आमदनी हो जाती है। तीन महीने बाद से ही पत्ते बेचे जाने लायक हो जाते हैं। पत्तों की कटाई होने के बाद नए पत्ते निकलते रहते हैं, जो अगली बार काम आते हैं। हर तीन महीने में पत्तों की एक नई खेप बेचे जाने के लिए तैयार हो जाती है। एलोवेरा की बहुत देखरेख की जरूरत नहीं पड़ती। थोड़ा बहुत खर-पतवार हटाना पड़ता है। गांव के ही सुनील कच्छप कहते हैं एलोवेरा के जो पौधे लगाए गए हैं, उसमें एक पौधे के तीन बड़े पत्ते एक किलो तक हो जाते हैं। अगर गोबर के खाद का इस्तेमाल किया जाए तो उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। ग्रामीण व पारा शिक्षक भाग्यमणि तिर्की बताती हैं कि पौधे की क्वालिटी महत्वपूर्ण है।

कोरोना के दौर में बढ़ी मांग

गांव की सुकृता कच्छप, चेरिया देवी और मंगरा उरांव कहते हैं कि कोरोना काल में एलोवेरा की मांग बहुत बढ़ी है। अच्छी कीमत देकर लोग एलोवेरा जूस बनाने के लिए लोग पत्ते ले जाते हैं। खेती की शुरुआत करते समय असमंजस में थे कि फायदा होगा या नहीं, लेकिन अब अच्छी कमाई होती देख गांव के बहुत लोग इस खेती से जुड़े हैं। अब तो यहां किसान दूसरे औषधीय पौधे भी लगा रहे हैं। कई खेतों में तुलसी, एस्टीविया और गिलोय के पौधे भी लगाए गए हैं।

राज्य में औषधीय पौधों की उपज के लिए अनुकूल मौसम, वातावरण और जलवायु और मिट्टी है। यहां एलोवेरा, अश्वगंधा, सर्पगंधा, गिलोय, तुलसी, वन तुलसी नीम, हर्र आदि का व्यवसायिक उत्पादन संभव है। नगड़ी में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा एलोवेरा विलेज बनाने का प्रयोग कारगर साबित हो रहा है। इसका असर अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। राज्य सरकार की मदद से औषधीय पौधों के प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाना जरूरी हो गया है।