देश के तकनीकी उच्चतर शिक्षण संस्थानों में प्रासंगिक व सामयिक बदलावों पर दिया जाए जोर

 

तकनीकी शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता सुधार पर जोर। फाइल

बीते दिनों राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी होने की पहली सालगिरह पर बोलते हुए PM मोदी ने समाज और देश को बदलने की बात जोर-शोर से कही है। ऐसे में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव से हम नए लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर पाएंगे।

 नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर अनेक राज्य धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं और इसे लागू करने में जुटे हैं। देखा जाए तो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति युवाओं को यह विश्वास दिलाती है कि देश पूरी तरह से उनके और उनके हौसलों के साथ है। जिस एआइ यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रोग्राम को अभी लांच किया गया है, वह भी हमारे युवाओं के भविष्य निर्माण में मददगार साबित होगा।

हम सभी ने दशकों से ऐसा माहौल देखा है जब समझा जाता था कि अच्छी पढ़ाई करने के लिए विदेश ही जाना होगा। लेकिन अच्छी पढ़ाई के लिए विदेशों से छात्र भारत आएं, दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों का रुख भारत की ओर हो, ये सब अब हम देखने जा रहे हैं। कई राज्य और तकनीकी संस्थाएं हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में अध्ययन की शुरूआत करने जा रहे हैं। अब यह माना जा रहा है कि आइआइटी की पढ़ाई भी हिंदी और अन्य भाषाओं में संभव होगी। ऐसा होना ही एक युग परिवर्तन के समान है।

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प्रतिस्पर्धी दुनिया : नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) की पहली वर्षगांठ पर एक बात तो निश्चित हो गई है कि इस नीति के प्रभाव ने ‘शिक्षा’ शब्द को देखने के नजरिये को पूरी तरह से बदल दिया है। भारतीय शिक्षा प्रणाली के मूल सिद्धांतों में लंबे समय से बदलाव लंबित थे। पिछले करीब तीन दशकों से शिक्षा प्रणाली को संचालित करने वाली धारणा में बदलाव के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने द्वार खोल दिए हैं।

दुनिया बदल रही है और भारत को इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में स्वयं में सुधार करने की जरूरत है। नई शिक्षा नीति इसके लिए सही दिशा में पहला कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आवश्यक परिवर्तन के सही दिशा में कार्यान्वयन के लिए उचित समय पर किया है। भारत सरकार इस नीति को लागू करने और इसके लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध करवाने के लिए उचित कदम उठा रही है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारत और भारतीयों को अपनी भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ फिर से जोड़ने का एक तरीका है।jagran

यह नीति वास्तव में भारत में शिक्षा के इतिहास में एक मील का पत्थर है। एनईपी-2020 में प्रस्तावित आगामी परिवर्तनों में सुधार और आविष्कार के साथ-साथ अनुकूलन और समायोजन के लिए देश तैयार है। यह नीति उच्चतर शिक्षा में एक नई लहर के सही मूल्य को महसूस करते हुए बदलाव की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। कई विश्वविद्यालय अधिक समग्र और बहु-विषयक शिक्षा को लागू करने के प्रयास कर रहे हैं। इस परिवर्तन ने विद्याíथयों के लिए ऐसी स्वतंत्र और रचनात्मक सोच की संभावनाएं पैदा की हैं, जो उन्होंने पहले कभी सोची भी नहीं थी। बेहतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास के मामले में यह परिवर्तन न केवल विद्यार्थियों के लिए, बल्कि संस्थान के लिए भी फायदेमंद है।

पाठ्यक्रम में लचीलेपन को लागू करके विद्यार्थियों को विकल्पों की अधिक संख्या प्रदान करना सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन है जिससे विद्यार्थी चुने हुए विकल्पों में प्रमुख और मामूली विशेषज्ञता हासिल कर सकेंगे। उदाहरण के तौर पर कंप्यूटर इंजीनियरिंग में मामूली विशेषज्ञता के साथ इलेक्टिकल इंजीनियरिंग में प्रमुख विशेषज्ञता हो सकती है या अर्थशास्त्र में मामूली विशेषज्ञता के साथ कंप्यूटर इंजीनियरिंग में प्रमुख विशेषज्ञता हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान और इंजीनियरिंग के उच्चतर शिक्षण संस्थानों द्वारा डाटा विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मेक्ट्रोनिक्स और रोबोटिक्स तथा स्नातक इंजीनियरिंग कार्यक्रमों में सामाजिक कार्य, कला और मानविकी, सामाजिक विज्ञान, रक्षा प्रौद्योगिकियां, साइबर सुरक्षा, स्मार्ट सिटी, नीति अनुसंधान और साइबर कानून सहित महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनेक नए कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।

करियर का चयन : स्कूली शिक्षा समाप्त होने के दौर में हमारे देश के अधिकांश परिवारों में करियर के चयन से लेकर विषय के चुनाव करने जैसे मामले पर विरोधाभास देखा जाता है। कभी माता-पिता का बच्चों पर इच्छित विषय लेने का अनावश्यक दबाव होता है तो कभी स्वयं विद्यार्थियों में ही असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। नई शिक्षा नीति में इससे उबारने का हल खोज लिया गया है जो सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का कारण बनेगा। बात केवल व्यक्ति विशेष की नहीं है, बल्कि पूरे समाज को बनाने और संवारने की आवश्यकता है, तभी जाकर हमारा राष्ट्र समग्रता में आगे बढ़ेगा।

एनईपी-2020 के तहत स्नातक पाठ्यक्रमों के एक हिस्से के रूप में योग, संगीत, थियेटर, खेल, भाषा (विदेशी और स्थानीय), साहित्य आदि मौलिक और वैकल्पिक पाठ्यक्रमों को शामिल करने पर जोर दिया गया है। यह छात्रों को एक लचीला फ्रेमवर्क उपलब्ध कराता है जो पढ़ाई के विभिन्न आयामों से संबंधित संयोजनों की सुविधा प्रदान करेगा। इसमें शिक्षा व्यवस्था के तहत बनाए गए क्रेडिट के प्रविधान को भी रेखांकित किया गया है। लिहाजा विद्यार्थियों के पास क्रेडिट के त्वरित संग्रहण के लिए विकल्प होगा।

हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस (एचईआइ) यानी उच्चतर शिक्षण संस्थान स्थानीय/ वैश्विक व्यवसायों, उद्योगों, कलाकारों, शिल्पकारों के साथ इंटर्नशिप करने और अंतर्देशीय/ विदेशी उच्चतर शिक्षण संस्थान/ अनुसंधान संस्थानों के शोधकर्ताओं के साथ कहीं भी काम करने के अवसर दें। इसके अलावा, उभरती प्रौद्योगिकियों के प्रमुख क्षेत्रों में बहु-विषयक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उच्चतर शिक्षण संस्थान चिकित्सा शिक्षा (एमबीबीएस, एमडी) में स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रम शुरू करें। इसके साथ ही उच्चतर शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों को दूसरे वर्ष को पूरी तरह से शोध के लिए समर्पित करने का विकल्प पेश करके दो साल के स्नातकोत्तर कार्यक्रम में लचीलापन लाने का प्रयास करें। साथ ही, उच्चतर शिक्षण संस्थान एक सतत मूल्यांकन प्रणाली विकसित करें जिसमें मूल्यांकन के हिस्से के रूप में असाइनमेंट, क्विज, क्लास टेस्ट, ओपन बुक टेस्ट, इनोवेटिव प्रोजेक्ट्स और वास्तविक घटनाओं पर आधारित केस स्टडी आदि शामिल हों।

ये सब विद्यार्थियों के समग्र मूल्यांकन में संकाय को अकादमिक स्वतंत्रता प्रदान करेगा और संकाय को अपने शिक्षण विषयों तथा विधियों के लिए पेशेवर निर्णय को प्रयोग में लाने में सहायता प्रदान करेगा। साहित्यिक, सांस्कृतिक, खेल, बाहरी गतिविधियों, अनुसंधान प्रोत्साहन, सामाजिक मुद्दों, सामाजिक उद्यमिता आदि के लिए समíपत क्लबों और सोसाइटियों की स्थापना व रट्टा पद्धति के स्थान पर हमें सीखने के लिए कनसीव-डिजाइन-इंप्लीमेंट-ओपरेट पद्धति की शुरूआत द्वारा उदाहरण/ परियोजना-आधारित शिक्षा को एकीकृत करना होगा।

गुणवत्ता पर आधारित होती है उच्चतर शिक्षण संस्थान की सफलता : किसी भी उच्चतर शिक्षण संस्थान की सफलता उसके संकाय की गुणवत्ता पर निर्भर करती है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सक्षम संकाय सदस्यों का निर्माण किसी भी उच्चतर शिक्षण संस्थान की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसलिए एचईआइ संकाय सदस्यों (शिक्षकों) को प्रेरित करने के लिए वार्षकि अनुसंधान और शिक्षण पुरस्कारों का गठन करके शिक्षण को प्रोत्साहन प्रदान करें। ये पुरस्कार उन सभी शोधकर्ताओं और शिक्षकों को दिए जाने चाहिए जो इसके लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हों। ये पुरस्कार प्रथम या द्वितीय स्थान तक सीमित न हों। योग्यता मानदंड की प्रणाली सहयोग, समन्वय और सामूहिक अनुसंधान को बढ़ावा देती है। साथ ही यह व्यक्तिवाद, ईष्र्या की भावना और पेशेवर प्रतिद्वंद्विता को हतोत्साहित करती है। शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता के लिहाज से यह बेहतर पहल हो सकती है।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी भी प्रणाली में पर्याप्त और अपेक्षित सुधार के लिए बेहतर, सामयिक और प्रासंगिक नीतियों का होना आवश्यक है। लेकिन यह भी सही है कि केवल बेहतरीन नीतियां भी अगर ठीक से लागू नहीं हुईं तो परिणाम ढाक के तीन पात की तरह ही सामने आते हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा व्यवस्था में समग्र परिवर्तन की बात की गई है, लेकिन उसकी शर्त यह है कि क्रियान्वयन भी उसी मिजाज से हो जिस ढंग से बनाया गया है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में होने वाली नियुक्तियों में परीक्षा पद्धति को दुरुस्त करना भी एक आवश्यक शर्त है। इसके सुचारु तरीके से कार्य करने के लिए शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। इसलिए विभिन्न स्तरों (सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर) की भर्ती के लिए स्पष्ट रूप से परिभाषित और पारदर्शी तंत्र तैयार करके लागू किया जाए। इस तंत्र में अनुसंधान और अकादमिक योगदान के प्रभाव को पहचानने के लिए कई मानदंड शामिल होने चाहिए। शिक्षण/ अनुसंधान/ औद्योगिक अनुभव, अनुसंधान प्रकाशन, अनुसंधान प्रोजेक्ट्स, पेटेंट, अनुसंधान मार्गदर्शन सहित शैक्षणिक रिकार्ड, अनुभव और अनुसंधान प्रदर्शन की गणना के लिए तंत्र में मापदंडों को सही तरीके से परिभाषित करना चाहिए।

पीएचडी कोर्स के भाग के रूप में लेखन, व्यक्तित्व विकास, पारस्परिक कौशल विकास आदि पर भी पाठ्यक्रम शुरू होने चाहिए। पीएचडी कोर्स वर्क के एक भाग के रूप में डिजाइनिंग पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणाली एवं संचार के लिए व्यावहारिक उन्मुख पाठ्यक्रम शामिल किया जाना चाहिए। शिक्षा के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट व उत्साही नेतृत्व की आवश्यकता है जो उत्कृष्टता व नवाचार को बढ़ावा देते हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान और सेवा सुनिश्चित करने के लिए सही नेतृत्व जरूरी है। नेतृत्व के पास प्रशासनिक कौशल, उत्कृष्ट शिक्षण व अनुसंधान उपलब्धियों का ट्रैक रिकार्ड होना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षा क्षेत्र में व्यवस्थागत बदलाव आ रहा है।

एनईपी-2020 के तहत जो परिदृश्य सामने आया वह वास्तविक है। इसके लिए जरूरी है कि लोग बेहतर और नवीन शिक्षा के महत्व को पहचानें। कहा भी जाता है कि शब्दों से अधिक काम बोलते हैं। एनईपी-2020 का पहला वर्ष बहुत सारे बदलाव लेकर आया है, लेकिन यात्र अभी आरंभ हुई है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि भर्ती का पैटर्न, शिक्षकों का प्रशिक्षण, लचीला पाठ्यक्रम, नवाचार और अनुसंधान के लिए वित्त पोषण, अंतरराष्ट्रीय संकाय के प्रविधान, छात्रवृत्ति योजनाएं, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का एकीकरण व राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में उल्लिखित ऐसे अन्य सभी प्रविधान सही तरीके से लागू किए जाएं। यदि हम एनईपी 2020 के ये प्रविधान सही तरीके से लागू करने में विफल रहते हैं तो आगामी पीढ़ियां हमारी सुस्ती, ढिलाई, लापरवाही व आत्मसंतुष्ट रवैये, खराब रणनीतियों और भ्रमित राष्ट्रीय दृष्टिकोण के लिए हमें कभी माफ नहीं करेंगी।