डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व यानि हिंदुत्व को बदनाम करने का उपक्रम

 

इसकी एक वेबसाइट बना दी जाती है जिस पर तीन दिन के आनलाइन सम्मेलन की घोषणा की जाती है।

कुछ दिनों से अकादमिक जगत में एक सम्मेलन की बहुत चर्चा हो रही है जिसका नाम है डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व। इस तरह के लोग माहौल बनाने में भी माहिर होते हैं। पहले कोरोना प्रबंधन को लेकर विदेशी अखबारों में छपनेवाले लेखों को देखें तो ये गठजोड़ और स्पष्ट होगा।

नई दिल्ली । कुछ दिनों से अकादमिक जगत में एक सम्मेलन की बहुत चर्चा हो रही है, जिसका नाम है डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व। इस तथाकथित सम्मेलन के आयोजकों का अता-पता नहीं है। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इसकी घोषणा होती है। इसकी एक वेबसाइट बना दी जाती है जिस पर तीन दिन के आनलाइन सम्मेलन की घोषणा की जाती है। उसपर अमेरिकी विश्वविद्लायों के नाम जुड़ते और हटते रहते हैं। ट्वीटर पर एक हैंडल बनाया जाता है और उससे इस सम्मेलन की गतिविधियां पोस्ट की जाने लगती हैं। दावा किया जाता है कि अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों के विभागों का समर्थन इस सम्मेलन को प्राप्त है। तीन दिन के सम्मेलन में घिसे पिटे विषयों को लेकर आनलाइन चर्चा सत्र आयोजित है। इन सत्रों में वही घिसे पिटे वक्ता हैं जिन्होंने अपने देश में अपनी प्रासंगिकता खो दी है।

असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी के प्रपंच में भी इनमें से कइयों का नाम सामने आया था। तब भी वो सब भारतीय जनता पार्टि की सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सामने आए थे। अब एक बार फिर से इस नए शिगूफे से वो अपनी प्रासंगिकता साबित करने की जुगत में लग गए हैं। ऐसे लोगों का नाम लेकर उनको महत्व देने का कोई अर्थ नहीं है। डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व सम्मेलन को लेकर हमारे देश के भी कुछ विश्वविद्यालय शिक्षक और कार्यकर्ता उत्साहित नजर आ रहे हैं। ये वही शिक्षक हैं जो मानसिक तौर पर गुलाम हैं और उनको हर चीज में व अमेरिका या अन्य देशों में हो रही गतिविधियां पसंद हैं। अपनी परंपरा या अपने पौराणिक ग्रंथों को पढ़ने में शर्म महसूस होती है। ये खुद को वामपंथी विचारधारा की तरफ खड़े दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था में उनको ज्यादा यकीन है।

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व के गुमनाम आयोजकों को न तो हिंदुत्व का ज्ञान है और न ही इसकी व्याप्ति और उदारता का अंदाज। हिंदुत्व के ध्वंस की कई असफल कोशिशें कई स्तर पर कई बार हो चुकी हैं। पिछले दिनों गांधी दर्शन के अध्येता मनोज राय से बात हो रही थी तो उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों की ओर ध्यान दिलाया। गांधी ने विस्तार से इस विषय पर लिखा है जो गांधी वांगमय के खंड 64 में संकलित है। महात्मा गांधी ने काल्पनिक स्थिति पर लिखा है कि ‘यदि सारे उपनिषद् और हमारे सारे धर्मग्रंथ अचानक नष्ट हो जाएं और ईशोपवनिषद् का पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति मे रहे तो भी हिंदू धर्म सदा जीवित रहेगा।‘ गांधी ने संस्कृत में उस श्लोक को उद्धृत करते हुए उसका अर्थ भी बताया है। श्लोक के पहले हिस्से का अर्थ ये है कि ‘विश्व में हम जो कुछ देखते हैं, सबमें ईश्वर की सत्ता व्याप्त है।‘

दूसरे हिस्से के बारे में गांधी कहते हैं कि ‘इसका त्याग करो और इसका भोग करो।‘ और अंतिम हिस्से का अनुवाद इस तरह से है कि ‘किसी की संपत्ति को लोभ की दृष्टि से मत देखो।‘ गांधी के अनुसार ‘इस उपनिषद के शेष सभी मंत्र इस पहले मंत्र के भाष्य हैं या ये भी कहा जा सकता है कि उनमें इसी का पूरा अर्थ उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है।‘ गांधी यहीं नहीं रुकते हैं और उससे आगे जाकर कहते हैं कि ‘जब मैं इस मंत्र को ध्यान में रखककर गीता का पाठ करता हूं तो मुझे लगता है कि गीता भी इसका ही भाष्य है।‘ और अंत में वो एक बेहद महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि ‘यह मंत्र समाजवादियों, साम्यवादियों, तत्वचिंतकों और अर्थशास्त्रियों सबका समाधान कर देता है। जो लोग हिंदू धर्म के अनुयायी नहीं हैं उनसे मैं ये कहने की धृष्टता करता हूं कि यह उन सबका भी समाधान करता है।‘ डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व में अपने देश के कई वक्ता हैं उनको गांधी जी की इस उक्ति को पढ़ लेना चाहिए तब हिंदुत्व के ध्वंस की बात करनी चाहिए थी।

हिंदुत्व या हिंदू धर्म कोई भौतिक वस्तु नहीं है कि इसको किसी सम्मेलन से, चंद विश्वविद्यालयों के हिंदू विरोधी मानसिकता वाले शिक्षकों की मदद से या इंटरनेट मीडिया पर अभियान चलाकर ध्वस्त किया जा सके। ये एक ऐसा शब्द है जिसका हमारे जीवन से हर पल वास्ता पड़ता रहता है। इस शब्द पर विचार करें तो ऋगवेद से लेकर हजारों वर्ष के लंबे कालखंड में इसके अर्थ का दायरा इतना व्यापक हुआ है कि उसको डिसमेंटल करने की सोचने वाले की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। वेदव्यास इसको नियम से जोड़ते हैं तो वाल्मीकि इसको चरित्र से जोड़कर व्याख्यित करते हैं। स्वामी विवेकानंद इसको सहिष्णुता से जोड़कर अपना दर्शन देते हैं। हिंदुत्व एक ऐसी अवधारणा है जो अपने धर्म से अपने धर्मगुरुओं से या अपने भगवान को भी प्रश्नों के घेरे में खड़ा करता है और फिर उन प्रश्नों के आधार पर स्वस्थ संवाद करता है।

हिंदुत्व के उथले ज्ञान वाले कुछ लोग इसकी गहराई में न जाकर इसकी व्याख्या करने लग जाते हैं। एक विदेशी विद्वान महाभारत की व्याख्या करते हुए कृष्ण को हिंसा के लिए उकसाने का दोषी करार देते हैं और कहते हैं कि अगर वो न होते तो महाभारत का युद्ध टल सकता था। अब इनको कौन समझाए कि महाभारत को और कृष्ण को समझने के लिए समग्र दृष्टि का होना आवश्यक है। अगर अर्जुन युद्ध के लिए तैयार नहीं होते और कौरवों का शासन कायम होता तब क्या होता। कृष्ण को हिंसा के जिम्मेदार ठहरानेवालों को महाभारत के युद्ध का परिणाम भी देखना चाहिए था। लेकिन अच्छी अंग्रेजी में आधे अधूरे ज्ञान के आधार पर भारतीय पौराणिक ग्रंथों की व्याख्या करने से न तो हिंदुत्व की व्याप्ति कम होगी और न ही हिंदुत्व का चरित्र बदलेगा। हिंदुत्व के अंदर ही खुद को सुधार करने की व्यवस्था है। यहां जब भी कुरीतियां बढ़ी हैं तो इसी समाज के अंदर से कोई न कोई सुधारक सामने आया है और उसने कुरीतियों के खिलाफ जंग लड़ी है।

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व का जो सम्मेलन है उसको हिंदुत्व से कोई लेना देना नहीं है बल्कि अगर सूक्षम्ता से विश्लेषण करें और उनकी वेबसाइट का अध्ययन करें तो ये स्पष्ट होता है कि उनके निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम ठीक से नहीं लिख पानेवाले लोग इस संगठन का फैक्टशीट पेश कर रहे हैं। एक के बाद एक लेख में एक ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों को बदनाम किया जा सके। इनको ये नहीं मालूम कि कोई भी संगठन अपने कार्यक्रमों की वजह से, अपने सिद्धांतों की वजह से समाज में स्वीकार्यता हासिल करता है किसी फैक्टशीट से नहीं। दरअसल इस तरह के सम्मेलनों के आयोजन और कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों के समर्थन से ये संकेत मिलता है कि अलग अलग शक्तियां भारत के खिलाफ एकजुट होने को बेचैन हैं।

इस तरह के लोग माहौल बनाने में भी माहिर होते हैं। इस सम्मेलन के पहले कोरोना प्रबंधन को लेकर विदेशी अखबारों में छपनेवाले लेखों को देखें तो ये गठजोड़ और स्पष्ट होगा। हिंदुत्व की आड़ में भारत को भारतीयता को और वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव को कम करने के इस उपक्रम के बारे में अब सबको पता है। इस तरह की प्रविधि आज से कुछ सालों पहले तक कामयाब हो जाती थी लेकिन अब देश की जनता जागरूक ही नहीं सक्रिय भी हो गई है। उनको इस तरह के सम्मेलनों से बरगलाना संभव नहीं है। हां अंतराष्ट्रीय मंचों पर और देश के कुछ वामपंथी रुझान वाले संगठनों को इस तरह के सम्मेलनों से कुछ आस जग सकती है लेकिन जनता की समझदारी से ये आस स्वप्न भर रह जाएगी।