अध्यापक और विद्यार्थियों ने स्‍वीकारी आनलाइन टीचिंग की चुनौती, कुशल मार्गदर्शन से मिली सफलता

 

कोरोना काल की चुनौती स्वीकार कर आगे बढ़े अध्यापक और विद्यार्थी।
कोरोना के कारण शिक्षा का स्वरूप बदला। विद्यालय की पढ़ाई मोबाइल और कंप्यूटर में सिमट गई। यह अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए ही पहला अनुभव रहा। इस चुनौती को दोनों ने ही स्वीकार किया और सफल भी हुए।

लखनऊ। कोरोना के कारण शिक्षा का स्वरूप बदला। विद्यालय की पढ़ाई मोबाइल और कंप्यूटर में सिमट गई। यह अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए ही पहला अनुभव रहा। इस चुनौती को दोनों ने ही स्वीकार किया और सफल भी हुए। शिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में विद्यार्थियों की पढ़ाई चलती रही। शिक्षक दिवस के मौके पर दैनिक जागरण ने बदली शिक्षण प्रणाली की चुनौतियों और अपेक्षाओं को लेकर अध्यापकों और विद्यार्थियों से बात की।

गहन अध्ययन के लिए विद्यार्थियों को करना होगा प्रेरित: कोरोना के कारण स्कूली शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव आया है। वहीं, देश में 34 साल बाद नई शिक्षा नीति के घोषित होने के बाद भी शिक्षण जगत में तमाम तरीके के बदलाव आए हैं। कक्षा नौ से 12वीं तक पढ़ाई बोर्ड आधारित होगी, जिसके तहत साल में दो बार बोर्ड की परीक्षा ली जाएगी, इससे बच्चे चीजों को रटने की बजाए सीखने और आकलन पर जोर देंगे। इसके अनुसार कक्षा एक से पांचवीं या संभवत: आठवीं तक विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में परीक्षा दे सकेंगे। इस संबंध में चुनौती यह है कि क्या अपनी मातृभाषा में आठवीं तक पढ़कर बच्चा आगे हिंदी या अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करने में पूर्ण सक्षम होंगे? इसके लिए आवश्यक है कि स्थानीय भाषाओं में पर्याप्त और गुणवत्तापरक सामग्री उपलब्ध हो। इसके अलावा कोरोनाजन्य बदली परिस्थितियों में विद्याथिर्यों को गहन अध्ययन के लिए प्रेरित करना भी एक बड़ी चुनौती है। बहुविकल्पीय परीक्षा पद्धति के लिए विद्यार्थियों को शुरू से ही तैयार करने की जरूरत है।

डा रीता शर्मा, नवयुग रेडियंस सीनियर सेकेंडरी स्कूल, राजेंद्र नगर

बहुविकल्पीय प्रश्नों की परीक्षा पद्धति में सतत् अभ्यास की जरूरत: हम नई राष्ट्ीय शिक्षा नीति के क्रियांवयन के लिए स्वयं को तैयार कर रहे। यह हमारे दृष्टिकोण को और अधिक व्यापक, व्यवहारोपयोगी, समाजोपयोगी और रचनात्मक बनाने में सहयोगी सिद्ध होंगे। आज बहुविकल्पीय प्रश्नों पर विशेष जोर है। बहुविकल्पीय प्रश्नों के संदर्भ में सतत् अभ्यास की महती आवश्यकता होती है, क्योंकि इसमें कम समय में अधिकाधिक प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं। बहुविकल्पीय प्रश्नों में आंशिक अंकों की प्राप्ति का कोई विकल्प नहीं होता है। सही उत्तर पर पूर्णांक और गलत उत्तर पर शून्य अंक प्राप्त होता है। बहुविकल्पीय प्रश्नों की परीक्षा पद्धति में हम विद्यार्थियों से अपेक्षा करते हैं कि वे संबंधित विषय की पाठ्य पुस्तक का विस्तृत एवं गहन अध्ययन करें, जिससे किसी भी अध्याय से संबंधित कोई भी प्रश्न उनसे न छूटें। बहुविकल्पीय प्रश्नों की परीक्षा पद्धति में सतत् अभ्यास के द्वारा ही पूर्णांक प्राप्ति की विद्यार्थियों से अपेक्षा करते हैं।

हरिनाम सिंह, प्रिंसिपल, शक्ति मांटेसरी हाई स्कूल, कृष्णा नगर

अतिरिक्त दबाव में भी बेहतर काम कर रहे शिक्षक: कोरोना काल के बाद विद्यालयों में पुनःशिक्षण कार्य शुरू हो गया है, परंतु विद्यालय प्रबंधन के सामने नई चुनौतियां भी आ गई हैं। एक तरफ शिक्षण कार्य सुचारू रूप से करवाना, वहीं दूसरी तरफ बच्चों और शिक्षकों के स्वास्थ्य हेतु विशेष व्यवस्था करना। दो पालियो में विद्यालय संचालन साथ ही आनलाइन-आफलाइन शिक्षण करवाने में शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव रहता है। वहीं, प्रतिदिन विद्यालय का सैनिटाइजेशन करवाना साफ-सफाई सोशल दूरी बनाए रखने की जिम्मेदारी है। प्राइमरी के बच्चों को लेकर अत्यधिक सतर्कता बरतनी पड़ती है, क्योंकि छोटे बच्चे कोविड के खतरों से अनभिज्ञ होते हैं, इसलिए प्राइमरी के बच्चों के साथ हमेशा टीचर की ड्यूटी रहती है। साथ ही विद्यार्थियों से भी विद्यालय अपेक्षा करता है कि मास्क पहनें, सैनिटाइजर का प्रयोग करें, साथ ही कोविड के सभी दिशा-निर्देशों का पालन करें। आनलाइन-आफलाइन सिर्फ माध्यम बदला है, विद्यार्थी और शिक्षक के संबंध में कोई बदलाव नहीं आया है।

सहर सुल्तान, प्रधानाचार्या, इरम पब्लिक कॉलेज, इंदिरा नगर

भौतिक कक्षा का स्थान टेक्नोलॉजी कभी नहीं ले सकती: कोरोना ने शिक्षा का स्वरूप ही बदल दिया। अध्यापक के तरीकों में खासा बदलाव आया। भौतिक कक्षा का स्थान कंप्यूटर और मोबाइल ने ले लिया। शुरू में जब भौतिक शिक्षण कार्य बाधित हुआ और टेक्नाेलॉजी के सहारे शिक्षण कार्य को आगे बढ़ाना पड़ा, तब शुरुआत में कठिनाई का सामना करना पड़ा परंतु हम शिक्षकों ने उस चुनौती को सकारात्मक संभावनाओं में बदलने का प्रयास किया और शिक्षा को तकनीकी माध्यम प्रदान किया। अब हम शिक्षक इस कठिनाई से भी ऊबर गए। हालांकि, मैं यह अवश्य कहना चाहूंगी की भौतिक कक्षा का स्थान टेक्नोलॉजी कभी नहीं ले सकती। विद्यार्थियों के

रचनात्मक कार्यों, नवीन कौशलों में बाधा आई है। विद्यार्थी की पाठ में रुचि उस स्तर पर नहीं पाई जा रही है जो भौतिक कक्षा के दौरान पाई जाती थी। मुख्यतया लेखन कला क्षमता पर इसका अत्यधिक प्रभाव देखने को मिला। विद्यार्थियों के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ा है। विद्यार्थियों से यही अपेक्षा है कि वह टेक्नोलॉजी का प्रयोग तो अवश्य करें परंतु उस पर आश्रित ना हो जाएं।

विनीता सिंह, शिक्षिका, पायनियर मांटेसरी स्कूल

विद्यार्थी की जिज्ञासा को दें सही दिशा: कोरोना के कारण विश्व भर के शिक्षा तंत्र में तकनीकी को जिस प्रकार से जोड़ा गया है, वह अभूतपूर्व है । ऑनलाइन शिक्षा के लिए मोबाइल या कंप्यूटर, इंटरनेट और तमाम सर्च इंजन इस बात के गवाह हैं कि अध्ययन- अध्यापन का तरीका बदल रहा है। इन सबके बीच में चुनौती है ग्राम्य परिवेश में तकनीकी के संसाधनों का अभाव, संसाधनों के शैक्षिक दृष्टि से प्रयोग में अरुचि, विपन्नता तथा कुछ नया करने की ललक में कमी । ऐसे में विद्यार्थियों से अपेक्षा है कि वह अपनी जिज्ञासा को सही दिशा दें और तकनीकी ज्ञान को अर्जित करने के लिए अपने शिक्षकों से सतत संवाद बनाए रखें । यथासंभव स्वयं प्रयास करें और जहां पर कोई चुनौती है वहां पर समाधान बनकर खड़े हों न कि विरोधी बनकर । समाज को परिवर्तित करने और प्रगति के पथ पर ले जाने का इस दौर में यही एकमात्र तरीका दिखाई देता है।

क्षमा सिंह, शिक्षिका, परिषदीय विद्यालय

शिक्षकों की मेहनत से पढ़ाई नहीं हो सकी बाधित: अध्यापक अपने विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक होता है। विद्यार्थी अपने शिक्षक को आदर्श की तरह देखता है। वह हमें भविष्य के लिए तैयार करता है। कोरोना के कारण हमारी शिक्षा का तरीका बदला, पर शिक्षकों के साथ ने इसे आसान किया। मैं अपने शिक्षकों की कड़ी मेहनत का सदा आभारी रहूंगा, जिनके कारण हमारी पढ़ाई बाधित नहीं हो सकी।

सर्वार्थ श्रीवास्तव, कक्षा सात, जयपुरिया, गोमती नगर

विद्यार्थी की अच्छाई और बुराई दोनों समझें: कोरोना में शिक्षा का एक बदलता हुआ स्वरूप सामने आया है। हमको जहां शिक्षा के लिए विद्यालय जाना पड़ता था, वहीं आज मोबाइल या लैपटॉप पर हमारी पढ़ाई हो जा रही। हालांकि, अब धीरे-धीरे आफलाइन पढ़ाई भी जोर पकड़ने लगी है। पढ़ाई में रटने की जगह अगर हम उसे प्रैक्टिकल के रूप में समझें तो आसानी होती है। जब पढ़ाई के कोर्स को किसी न किसी एक्टिविटी से जोड़ कर पढ़ाया जाता है तो वह लंबे समय तक याद रह जाता है। हमारी अपेक्षा यही है कि शिक्षक पढ़ाई के इसी तरीके को अपनाएं। शिक्षकों को बच्चों के दिल से जुड़ने की जरूरत है, उनकी कमियां और अच्छी आदतों दोनों को समझना होगा। जब तक शिक्षक को अपने विद्यार्थी के बारे में नहीं पता तो वह उसे अच्छा विद्यार्थी नहीं बना सकेंगे।

हर्षित मिश्रा, कक्षा 11, स्टेला मैरिस इंटर कॉलेज।

विद्यार्थी हित में शिक्षकों ने किया चुनौतियों का सामना: शिक्षक बच्चों के लिए वरदान जैसे हैं। कोरोना की विकट परिस्थिति में भी शिक्षकों ने आनलाइन मोड पर हम बच्चों को भरपूर समय दिया। यह विद्यार्थी और शिक्षकों दोनों के लिए ही नया अनुभव था। शिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में हम पढ़ाई के इस नये तरीके को समझ पाए। इसमें कई चुनौतियां भी आईं, वह थीं- हर बच्चे तक इंटरनेट की सुविधा की उपलब्धता को सुनिश्चित करना, विद्यार्थियों को दिए होमवर्क का पूरा होने को सुनिश्चित करना आदि। हमने विद्यार्थी हित में शिक्षकों को इन सब चुनौतियों से जूझते देखा है, अध्यापकों के लिए आदर और बढ़ गया है।

रिद्धि सिंह, कक्षा आठ, सीएमएस, कानपुर रोड

समान भाव रखें शिक्षक: कोरोना ने हम सबके सामने एक सवाल खड़ा किया कि क्या स्कूल, कालेज जाए बगैर बच्चों से असली पढ़ाई कराई जा सकती है? यह चुनौती सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि शिक्षकों के लिए भी रही। हर बच्चा चाहता है? कि वह शिक्षक का प्रिय बने। शिक्षकों से बस यही अपेक्षा है?

कि वह हर बच्चे को समान भाव से देखें और उनका मार्गदर्शन करें। विद्यार्थियों की हर शंका का समान भाव से निराकरण करें।