क्‍या है पाकिस्‍तान के लिए तालिबान के उभार के मायने, जानकार कह रहे सबसे शातिर और माहिर खिलाड़ी

 

तालिबान के अफगानिस्‍तान में उभार के कई मायने हैं
तालिबान के अफगानिस्‍तान में उभार के कई मायने हैं। ये पाकिस्‍तान के लिए मन की मुराद पूरी होना जैसा ही है। इसके जरिए पाकिस्‍तान ने कुछ और ही मंसूबे बनाए हुए हैं। तालिबान के पीछे उसका बड़ा रोल रहा है।

नई दिल्‍ली। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन और देश छोड़ चुके अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी की हाल ही में एक बातचीत सार्वजनिक हुई थी, जिसमें गनी गुहार लगा रहे हैं कि तालिबान तेजी से उन्हें घेर रहा है। पाकिस्तान से 15 हजार आतंकी यहां आकर तालिबान की मदद कर रहे हैं। इस बातचीत का लब्बोलुआब यह है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान को अस्थिर करने में अपनी रणनीतिक बढ़त मानता है जो उसने कर दिखाया। तभी बदली परिस्थितियों में तमाम सुरक्षा और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस भू रणनीतिक बदलाव का पाकिस्तान सबसे माहिर खिलाड़ी बनकर उभरा है। आइए, जानते हैं कि इस परिकल्पना की असलियत क्या है?

पेश है एक नजर

विशिष्ट नाता पाकिस्तान का अफगानिस्तान से खास नाता रहा है। दोनों देश एक दूसरे से 2750 किमी (1600 मील) की सीमा साझा करते हैं। दोनों अच्छे खासे कारोबारी देश हैं। उनके बीच कई तरीके के धार्मिक, सांस्कृतिक और जातीय समीकरण हैं। तभी तो पूर्व अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने एक बार कहा था कि दोनों देश 'न अलग किए जा सकने वाले सहोदर' हैं।

अमेरिका पर 9/11 हमले की योजना अफगानिस्तान में बनाई गई। इस हमले का बदला लेने के लिए जब अमेरिका ने आतंक के खिलाफ युद्ध का अभियान छेड़ा तो पाकिस्तान को भी उसका एक हिस्सा बनना पड़ा। लेकिन उसी दौरान पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसियां अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान जैसे आतंकी संगठनों की मदद करते रहे। विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान से पाकिस्तान संबंध ठीक रखना चाहता था, खासकर भारत समर्थित सरकारों के समय। तब वह ऐसा करते दिखता था कि वह तालिबान का विरोधी है।

दिखता है असली चेहरा

बीस साल पहले जब तालिबान सत्ता थे तो दुनिया में कुछ देशों के साथ पाकिस्तान भी उनमें शुमार था जिन्होंने उनकी सरकार को मान्यता दी थी। पिछले महीने जब काबुल पर तालिबान ने कब्जा किया तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने गर्वित होकर बयान दिया कि तालिबान ने दासता की बेडि़यां तोड़ी है।

पाकिस्तान का असली डर

चूंकि पाकिस्तान का तालिबान से बहुत पुराना याराना नहीं रहा है, इसका मतलब है कि काबुल पर तालिबान के काबिज होने के बावजूद पाकिस्तान निश्चिंत नहीं रह सकता है। लंबे अर्से से अफगानिस्तान की सीमा से हो रहे आतंकी हमलों से पाकिस्तान झुलस रहा है। लिहाजा तालिबान के नेतृत्व में काबुल में स्थायी सरकार के गठन में उसका बड़ा हित छिपा है। ऐसा करके वह अलकायदा और आइएसआइएस खुरासान पर शिकंजा कसने का मंसूबा रखता है।

शरणार्थी समस्या

शरणार्थियों की समस्या पाकिस्तान की दूसरी बड़ी चिंता है। इस देश में पहले से ही तीस लाख अफगान शरणार्थी हैं। बद से बदतर होती अपनी अर्थव्यवस्था के साथ यह और बोझ सहने की स्थिति में नहीं दिखता है।

पश्चिमी देशों से ताल्लुकात

पाकिस्तान के अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के साथ संबंध ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाइडन ने राष्ट्रपति बनने के बाद से अब तक पाकिस्तानी पीएम इमरान खान से बात करने की जरूरत नहीं समझी। पश्चिमी देशों की रणनीति पर बारीक नजर रखने वाली विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर पाकिस्तान आतंकी समूहों को अपना प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन देना बंद नहीं किया तो वे उसे परित्यक्त देश भी घोषित कर सकते हैं। हालांकि पश्चिमी देश इस बात से भी पशोपेश में हैं कि पाकिस्तान को ठंडे बस्ते में डालने के भी अपने खतरे हैं। उसकी चीन से गलबहियां को और मजबूती मिलेगी।

नेताओं की नीयत

अफगानिस्तान में जो तालिबान सरकार बनने जा रही है, मुल्ला अब्दुल गनी बरादर सहित उसके कई प्रमुख नेता पाकिस्तान की जेलों में कैद रहे हैं। बदले हालात में पाकिस्तान के प्रति उनका रुख-रवैया कैसा रहेगा, यह भविष्य की गर्त में छिपा है। लेकिन एक बात तो तय है कि तालिबान किसी का भी सगा नहीं है।