जातीय जनगणना, पिछड़ी जातियों के समग्र विकास के लिए उनकी सही संख्या का पता होना आवश्यक

 

पिछड़ी जातियों के समग्र विकास के लिए उनकी सही संख्या का पता होना आवश्यक है। प्रतीकात्मक

सामान्य जनगणना के साथ देश में जातीय जनगणना कराने की भी पिछड़े वर्ग के लोगों की मांग इसलिए है ताकि इससे संबंधित तमाम शंकाओं का निवारण हो सके। जातीय जनगणना से पिछड़ी जातियों के विकास के लिए विशेष योजनाओं का खाका तैयार होगा।

 आजादी के बाद केंद्र सरकार ने समाज के पिछड़े वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन राष्ट्रपति के आदेश से 29 जनवरी 1953 को किया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 30 मार्च 1955 को सरकार को सौंपी। लेकिन पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए गठित आयोग में भी जातीय कुंठा अपने भरपूर कुतर्को के साथ मौजूद थी। आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर का रुख गोलमोल था। हालांकि इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में संवैधानिक बाध्यता के चलते पेश तो किया गया, लेकिन उस पर कभी चर्चा नहीं हो पाई।

वर्ष 1977 में जनता पार्टी के शासन में आने के बाद पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिए जाने की कवायद एक बार फिर तेज हुई। 20 दिसंबर 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बीपी मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के फैसले की घोषणा की। आयोग अपना काम पूरा करता, उसके पहले ही मोरारजी सरकार गिर गई। हालांकि आयोग का काम जारी रहा।

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मंडल आयोग की सिफारिश बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने स्वीकार की। वर्ष 1989 में लोकसभा चुनाव में जनता दल ने आयोग की सिफारिशों को लागू करने के वादे को चुनाव घोषणापत्र में शामिल किया था। सात अगस्त 1990 को वीपी सिंह ने रिपोर्ट लागू करने की घोषणा की। 13 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई। 17 जनवरी 1991 को केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्गो की सूची तैयार की।

वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने भी मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वैध ठहराया। साथ ही, आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत रखने और पिछड़ी जातियों के उच्च तबके को इस सुविधा से अलग रखने का निर्देश दिया। यानी उच्चतम न्यायालय ने पिछड़े वर्ग के क्रीमी लेयर को आरक्षण देने से मना कर दिया। न्यायालय के इस फैसले के बाद आठ सितंबर 1993 को केंद्र सरकार ने नौकरियों में पिछड़े वर्गो को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की अधिसूचना जारी की। यह आंशिक रूप से ही लागू हुआ था।

10 अप्रैल 2008 को दिए गए फैसले में उच्चतम न्यायालय ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गो के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को वैध ठहराया, लेकिन संपन्न लोगों को यानी क्रीमी लेयर के इस दायरे से बाहर रखा। अर्थात सवर्ण वर्ग जो अक्सर कहता है कि आरक्षण का लाभ पिछड़ी जातियों के संपन्न लोग ले रहे हैं, उन्हें ये मालूम होना चाहिए कि ओबीसी के लिए जो आरक्षण मिल रहा है, वह सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को मिलता है, जो आर्थिक रूप से भी संपन्न न हो। इस 1993 में ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण और 2008 में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रविधान किया गया।

मंडल कमीशन की सिफारिश लागू हुए 28 साल पूरा होने वाला है, लेकिन इस दौरान पिछड़ा वर्ग अपनी मेहनत एवं कौशल से सफलता की ओर अग्रसर है। अब चाहे सिविल सेवा की परीक्षा हो या मेडिकल अथवा इंजीनियरिंग की, सभी में ओबीसी छात्र कीर्तिमान रच रहे हैं। अब सवाल उठता है कि वर्तमान में पिछड़ी जातियां एवं पिछड़ों की राजनीति करने वाली पार्टियां जातीय जनगणना कराने की मांग पर क्यों अड़ी हैं? बदलते समय के साथ ही पिछड़ी जातियां अपने अधिकारों को लेकर काफी जागरूक होती जा रही हैं। इस समाज से आने वाले प्रबुद्ध वर्ग एवं सामाजिक संगठन अपने नेताओं पर दबाव डाल रहे हैं।

तीन साल पहले आई पुस्तक ‘मंडल कमीशन, राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहल’ के अनुसार 1993 से ओबीसी आरक्षण लागू है, लेकिन केंद्रीय मंत्रलयों में महज 5.4 प्रतिशत ओबीसी अधिकारी हैं। ये आंकड़े कह रहे हैं कि संवैधानिक प्रविधानों के बावजूद ओबीसी तबका उन पदों पर नहीं पहुंच पाया, जहां से नीति नियंत्रण होता है या जहां से बौद्धिक कसरत होती है। इस पुस्तक के अनुसार, ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद तो सरकारी नौकरियों का खात्मा ही शुरू कर दिया गया। वर्ष 1992-93 में जब भारत की आबादी 83.9 करोड़ थी तब सरकारी नौकरियों की संख्या लगभग 1.95 करोड़ थी। यानी हर 43 आदमी में से एक व्यक्ति सरकारी नौकरी करता था। उसके बाद से सरकारों ने इसे बढ़ाने के बजाय घटा दिया। वर्ष 2017 में भारत की आबादी करीब 130 करोड़ थी, जबकि सरकारी नौकरियों की संख्या घटकर 1.76 करोड़ रह गई। यानी इस समय 74 व्यक्ति में से एक आदमी सरकारी नौकरी पर निर्भर है।

पिछले सालसिविल सेवा परीक्षा के परिणाम में ओबीसी के सफल अभ्यर्थियों ने गरीब सवर्ण अभ्यर्थियों से ज्यादा अंक लाकर सफलता हासिल की। इसके अलावा, अन्य कई नौकरियों में ओबीसी अभ्यर्थियों का ‘कट आफ मार्क्‍स’ जनरल से ज्यादा आ रहा है। बावजूद इसके ओबीसी अभ्यर्थियों का चयन सामान्य श्रेणी के तहत न करके उनके मूल कोटे में किया जा रहा है।

देश में 1931 के बाद से अब तक जातीय जनगणना नहीं हुई। पिछड़ी जातियों के प्रबुद्ध वर्ग एवं सामाजिक संगठनों का मानना है कि जातीय जनगणना कराने से सही मायने में मालूम होगा कि किस जाति की कितनी आबादी है और उसकी सामाजिक एवं आíथक स्थिति कैसी है। जातीय जनगणना से पिछड़ी जातियों के विकास के लिए विशेष योजनाओं का खाका तैयार होगा।